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Full text of "Nritya Ratna Kosha I Kumbha Karna"

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प्रधान संपादक ~ पुरातत्वाचाये, जिनविजय मुनि 
| सम्मान्य सचालक, राजस्थान पुरातच्वान्बेषण मन्दिर, जयपुर |] 
न 


चित्रकरूटाधिपति-कुम्भकणे-नृपतिप्रणीत ` 


नृत्यरलकोद 


( प्रथम भाग) 
र 


11.11.121. प क रा व्र 1.1.111. 


राजस्थान राज्य संस्थापित 


राजस्थान पुरातचान्वेषणमन्दिर 


जयपुर (राजखान) ५ न° प° 


२; 0 ५ 4 । 





राजस्थान राज्य संस्थापित 


च पि ह १ 


राजस्थान पुरात्वान्वेषण मन्दिर 
( राजश्थान ओरिएन्टल रिसर्च इन्स्टीय्यूट ) 
हारा प्रकारित 





* रास्थान पगातने गन्प्रमाला|* 


प्रधान सपादक 
पुराताचाये, मुनि जिनविजय 
[ सम्मान्य संचालक ~ राजख्ान पुरातत्त्वान्वेषण मन्द्र |] 
$ 
प्रकारानकती 
संचारुक - राजस्थान पुरातचखान्वेषण मन्दिर 
जयपुर (राजस्थान) 





राजस्थान पुरातत््वन्वेषण मन्द्र 


नैः 
राजयान सरकार दारा प्रापित 
राजसखानमें प्राचीन सादहिलयके संग्रह, संरक्षण, संरोधन 
ओर प्रकारान कार्यका महत्‌ प्रतिष्ठान 


राजस्थानक्रा एविशाल प्रदेश, अनेकानेक राताब्दियासे भारतक्रा एकर हृदयखरूप स्थान बना हुआ 
दोनेसे विभिन्न जनपदीय संस्कृतियोका यह एक केन्द्रीय एवं समन्वय भूमि सा संस्थान बनां हुआ है । 
प्राचीनतम आदिक्राटीन वनवासी भिष्टादि जातियोकरे साथ, इतिहसयुगीन आयं जातिके भिन्न भिन्न 
जनसमृहोँ क्रा यह प्रिय प्रदेश बना हआ हे । वैदिक, जन, बौद, दव, भागवत एवं शाक्त आदि नाना प्रकारके 
धार्मिक तथा दाशेनिकर संप्रदायोके अनुयायी जनां प्न यहं खस्थ ओर सहिष्णुतापूणै सन्निवेश हुआ हे । 
कालक्रमानुसार मौय, शक, क्षत्रप, गुप्त, द्रण, प्रतिटार, गुहिटोत, परमार, चाटक्य, चादमान, राष्टकृट 
आदि भिन्न भिन्न राजवंशोँकी राज्यसत्ताएं इस प्रदेशमे स्थापित होती गई ओर उनके गासनक।लमें यदहाकी 
जनसंस्कृति ओर रट म्पत्ति यथेष्ट रूपमे विकसित ओर समुन्नत बनती रही । लोरगोकी सख-समृद्धिके 
साथ विदावानोंकी विदोपासना भी वैसी ही प्रगतिज्ञील बनी रही, जिकरे परिणामे, समयानुसार, 
संत, प्राकृत, अपभ्रंश ओर देद्य भाषाओंमें असंख्य प्रन्थोंकी रचनारूपर साहियिक समृद्धि भी इस! 
प्रदरा विपुल प्रमाणम निर्मित होती गर । 


इस प्रदेशमे रहनेवाठी जनताका सास्छृतिक ओर आध्यात्मिक अनुराग अद्‌भुत रहा है, ओर 
इसके कारण राजस्थानके गांव-गावमं आज भी नाना प्रकरारके पुरातन देवस्थानों ओर धर्मस्थानोंक 
गौरबोट्यादक अस्तित्व हम दृष्टिगोचर हो रहा हे । राजस्थानीय जनताके इस प्रकारके उत्तम सांस्कृतिक - 
आध्यात्मिक अनुरागके कारण विद्योपासक वभ॑द्रार। स्थान-स्थान पर विथाम्ों, उपाश्र्यो, आश्रमो ओर 
देवभन्दिरोमें वाङ्यात्मक साहिव्यके संग्रहरूप ज्ञानभण्डार-सरस्रतीभण्डार मी यथे परिमाणमें स्थापित 
ये । एतिहासिक उेोके आधारसे ज्ञात होता दहै क्रि राजस्थानके अनेकानेक प्राचीन नगर -जैसे 
आघाट, भिन्नमाल, जावा्िपुर, सलयपुर, सीरोही, बाह डमेर, नागौर, मेडता, जैसलमेर, सोजत, पाटी 
फलो री, जोधपुर, बीकानेर, खुजानगढ, भरिं डा, रण्थमोर, मांडल, चितौड, अजमेर, नराना, आमेर, 
सांगानेर, क्रिसनगढ, चूरू, फतेदपुर, सीकर आदि सको स्थानो, अच्छे अच्छे म्रन्थभण्डारं वियमान 
थे । इन भण्डारामें संस्कत, प्राक्त, अप्रं ओर देदय भाषाओंमें रचे गये हजारों ग्रन्थोँकी दस्तटिखित 
मूल्यवान्‌ पोधथियां संग्रहीत थीं । इनमें से अव केवल जेसलमेर जेसे कु-एक स्थानोके ग्रन्थभण्डार ही 
किसी प्रकार सुरक्षित रह पाये हँ । मुसलमानों ओर इपरेजों जैसे विदेशीय राज्यरोटपोके संहारात्मक 
अक्रमणांके कारण, हमारी वह प्राचीन सादहिल्य-म्पर्ति बहुत कुछ नष्ट हो गई । जो कुछ बची-खुची 
थी वद्‌ मी पिष्टे १००-१५० वर्पोके अन्दर, राजग्थानसे बहार ~ काशी, कलकत्ता, बम्बर, मद्रास, 
वंगलोर, पूना, बडोदा, अहमदाबाद आदि स्थाने स्थापित नूतन साहिलिक संस्थाओकि संम्रहोमिं बडी 
तादादभमै जाती रहीदहे। ओर तदृपरान्त युरोप एवं अमेरिकाके भिन्न भिन्न ग्रन्थालये मी दजासें 
थ राजस्थानसे पहं चते रहे हँ । इस प्रकार यद्यपि राजस्थानका प्राचीन साहिय भण्डार एक प्रकारसे 
अब खाली हो गया हे; तथापि, खोज करने पर, अब मी हजारों ग्रन्थ यत्रतत्र उपलन्ध हो रहे हैँ जो 
राजस्थानकरे लिये नितान्त अमूल्य निधि खरूप हो कर अयन्त ही सुरक्षणीय एवं संग्रहणीय हैँ । 


२] | 











हषै ओर सन्तोषका विषय है करि राजस्थान सरकारने हमारी विनम्र प्रेरणासे प्रेरित हो कर, इस 
राजस्थान पुरातखान्तेषण मन्दिर ( राजस्थान ओरिएन्टल रिसर्च इ्स्टीटयूट ) की स्थापना की 
हे ओर इसके द्वारा राजस्थानकरे अवरिष्ट प्राचीन ज्ञानभण्डारकी स॒रक्षा करनेका समुचित कायं प्रारेभ किया 
है । इस कायालय द्वारा राजस्थानके गाव-गावमें ज्ञात होने वले प्र्थोफी खोज की जा रही है ओर जहां 
करहीसे एवं जिष करिसीके पास उपयोगी ग्रन्थ उपलन्धर होते हैँ उनको खरीद कर सरक्षित रखनेका प्रबन्ध 
करिया जा रहा है। सन १९५० मेँ इस प्रतिष्टानकी प्रायोगिक स्थापना की गई थी, ओर अब पिले 
वषै, १९५६ के प्रारेभसे, सरकारने इसको स्थायी रूप दे दिया है ओर इका कायत भी कुछ विस्तृत 
बनाया गया हे । अत्र तक्के प्रायोगिक कये परिणाममे भी इस प्रतिष्ठानं प्रायः १०००० जितने 
पुरातन दस्तलिखित ग्रन्थो का एक अच्छा मूल्यवान्‌ संग्रह संचित हो चुका हे । आशा हे किं भविष्यरमे यद्‌ 
काय ओर भी अधिक वेग धारण करता जायगा ओर दिन-प्रति-दिन अधिकाधिक उन्नति करता जायगा । 


नै 


जिस प्रकार उक्त रूपते इस प्रतिष्ठानके प्रस्थापित करने का एक उदय राजस्थानकी श्राचीन साहि- 
यि क़ संपत्तिका संरक्षण करनेका है व्रैसा ही अन्य उदेश्य इष साहिलयनिधिके बहुमूल्य रलखहूप प्रन्थोको 
प्रकाम लानेका भी है । राजस्थान उक्त रूपमे जो प्राचीन ग्रन्थ उपलब्ध होते हँ, उनमें संकडां ग्रन्थ 
तो पसे हैँ जो अभी तक प्रकाशमें नदीं अवे टै; ओर सें्डोंहीरेसे हें जिनके नाम तक्र भी अभी तक 
विद्धानोंकरो ज्ञात नहीं है । यह सब कोई जानते हें क्रि इन ग्रन्थिं हमारे राटरके प्राचीन साँस्कृतिक 
इतिह।सकी विपुल साधन-सामग्री छिपी पडी है । हमारे पूर्वज हजारो वर्पो तृक जो ज्ञानाजेन करते रहे 
उसक्रा निष्कर्षं ओर नवनीत नीका नीकाल कर, वे अपनी भावी सन्ततिके उपयोगके लिये इन ग्रन्था- 
तक कृतिर्योमिं संचित करते गमे । व्याकरण, कोष, कान्य, नाटक, अलं मर, छन्द, ज्योतिष्‌, वैयक, 
कामविज्ञान, अर्थशाख्र, शिल्पकला आदि खौकिक वियाओकि ज्ञानके साथ श्रुति, स्मरति, पुराण, धर्मसूत्र, न्याय, 
वैरोषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, जैन, बौद, शाक्त, त॑त्र, मंत्र आदि धार्मिक, दाशेनिक एवं आध्यात्मिक 
विद्याओंके रहस्य भी इन ग्रन्थोमिं नाना खरूपोमें प्रथित क्य हुए हँ । इसी प्रकार, युग युगे होने वाले 
अनेक शूरवीर, दानी-ज्ञानी, सन्त-महन्त, लयागी-वैरागी, भक्त-विरक्त आदि गुण-विरिष्ट नर-नारी जनोँके 
जीवन ओर कार्येकि विविध वणेन - चित्रण भी इन्दं भ्रन्थोम अन्तर्निहित है । अथात्‌ हमारे राषटकी से 
परकारकी गौरव-गरिमाविषयक कथा-गाथाकी रक्षा करने वाला हमारा यही एकमात्र प्राचीन साहिलयसंग्रह 
है । इसीके प्रकाशसे संतारमें भारतका गुरुपद ज्ञत हुआ ओर स्थापित हुआ हे । यद्यपि आज तक इनर्मेसे 
हजारों ही प्राचीन ग्रन्थ, प्रकारे आ चुके हैँ, फिर भी हजारो ही एेसे ग्रन्थ ओर बाकी हँ जो अन्ध- 
कारके तलधरमें दटे पडे हँ । इनका उद्धार करना ओर इन्दं प्रकाशम रखना यह अब इस नूतन जीवन 
प्रप्त नव्य भारतके प्रयेक व्यक्ति ओर संस्थाका परम कर्तव्य हे । इसी कर्तव्यको लक्ष्य कर, इस संस्था 
दवारा राज्ञस्थान पुरातन ्रन्थमाला' के प्रकाशनका आयोजन भी क्रिया गया हे । इसके द्वारा 
संस्कृत, प्राकृत, अपश्रेश ओर देद्य भाषाओं निबद्ध विविध विषर्योके प्राचीन प्रन्थ, तज्ज्ञ एवं सुयोग्य 
विद्वानोसे संशोधित ओर संपादित हो कर प्रकारित क्रिये जा रहे हँ । अब तक्र कोई छोटे बडे २० ग्रन्थ 
प्रकाशित हो चके हँ ओर प्रायः ३० से अधिक ग्रन्थ प्रेसोँम चप रहे हैँ । राजस्थान सरकार वर्तमानम, 
इस कारके लिये प्रतिवषे २०००० स्परे खर्च कर्‌ रही हे -पर हमारी कामना हे कर भविष्यं यद रकम 
बदाई जाय ओर तदनु्तार अधिक संप्रा इन प्राचीन ग्रन्थों का सपुद्धार ओर प्रकाशन काय क्रिया जाय । 


सादिलयका प्रकाश्च ही प्रजाके अज्ञानान्धकारको न कर, उसे दिव्यताका दशन कराता है । 


माघ शद्धा १४, वि° सं° २०१३. | 
( जीवनके ७० वे वैका प्रथम दिन ) मुनि जिनविजय 


[३ 





प 
र 


क का क क क शः क क क का) 


प्रकाशित ग्रन्थ 
संरक्त 

१ प्रमाण मञ्जरी - तार्किक चूडामणि सवेदेवा- 

चार्य प्रणीत। तीन व्याख्याओंसे समर्करृत । 
२ यन्रराज्ञरचना - जयपुर नरेश महाराज 

सवाई जयसिंह समारचित । 

३ महर्षिकर्वेभवम्‌ - वियावाचस्पति ख° 

ध्रीमधुस्‌दन ओश्चाविरचित । 
४ त्संग्र द-फक्तिका - प° क्षमाकल्याणङ्ृत । 
५ कार कसंबन्धोयोत - प॑ ° रभसनन्दिकृत । 
६ चृत्तिदीपिका - पं मौलिकृष्णभदर कृत । 
७ हाब्दरल्ञप्रदीप - संक्षिप्त संस्कृत शब्दकोष । 
८ छृष्णगीति - कवि सोमनाधकृत गीतिकाव्य । 
९ द्यंगारहारावलि ~ दपैकवि विरचित । 


१० चक्रपाणिविजयमहाकाव्य - प° लक्ष्मी 


धरभट्र रचित । 
११ राजविनोद काय - कवि उदयराज रचित । 


१२ चृत्तसंग्रह ~ नाय्यविषयक पठनीय ग्रन्थ |. 
१३ न्रलयर्लकोरा ~ महाराणा कुम्भकर्ण प्रणीत । 


१४ उक्तिरल्ञाकर - पण्डित साधुखुन्दरगणी कृत । 
१५ कविदपेण - प्राकृत छन्दोर चनात्मक ग्रन्थ । 
१६' चत्तजातिस मुच्य ~ विरदाङ्क कवि कृत । 
१७ इईश्वरविटास महाकाव्य - प कष्णमः- 
“ कृविक्रृत । 
राजस्थानी भाषा ग्रन्थ 
१ कान्हड दे प्रबन्ध - कवि पद्यनाभ रचित । 
२ क्यामखां रासा - सुरिलिम कवि जानक्ृत । 
३ छखावारयासा ~ चारणकविया गोपालद्‌ानकरत । 
क १५ 1. ५ रहे 
प्रसाम छप रह मन्थ 
(क ) संसृत ग्रन्थ 
१ ज्रिषुराभारती - च्घुपंडित 
२ हाकुनश्रदीप - लावण्य शमो 





रातन प्रन्थमाल्के कु 


र 


३ करुणामरृतधरपा - करर सोमेश्वर | 
४ बाटरिक्षात्य(करण -ठकरुर संग्रामसिंह - 
५ पदार्थरलमक्ञषा - प॑° कृष्णमिश्र 
६ काव्यप्रकाश, संकेत - भट सोमेश्वर 
° वसन्तविखास - फागु काव्य | 
८ च्रुल्यरल्लकोश्च - राजाधिराज कुंभकर्णं देव 
९ नन्दोपाख्यान - संस्कृत ओर राजस्थानी 
१० रज्लकोदा ~ विविधवस्तुसंग्रह विचारात्मक 
११ चान्द्रव्याकरणम्‌ - आचाये चन्द्रगोमि 
१२ स्वयभू छद - स्वयम्‌ कवि 
१३ प्राङृतानन्द - कवि रघुनाथ 
१४ मुग्धाववोध आदि ओक्तिक संग्रह 
१५ कविकोस्तुभ -पं° रघुनाथ मनोहर 
१६ दुगा पुष्पांजछि - पं° दुगोप्रसादजी 


| १७ द राकण्डववम्‌- 1, 


१८ कणेकुतूहल नाटक 
१९ कृष्ण ठीखाम्रत काव्य 


राज्यस्थानी भाषाग्रन्थ 

१ वांकीदासरी बातां ~ चारणकवि बांकीदास 

२ महता नेणसीरी ख्यात - जोधपुरके 
मुंहता नेणसी ठिखित 

३ गोरा बादल-पदमिणी चडउपहै - जेन . 
यति कवि हेमरतन कृत | 

४ राटोड वंदरारी विगत - राटोडोके 
रतिदहासशी कथापं । 

राजस्थानी साहित्य संग्रह ~ राजस्थानी 
भाषा मं ठिखित विविध वृत्तान्त । 

६ दाढाखा एकर गिडरी वात - राजस्थानी 
भाषाकी एक सरस प्रहसनात्मक रचना । 

७ खुजान संवत - कवि उदयराम रचित 

८ चन्द्र वंरावलि ~ कवि मतिराम कृत 


` ° राजस्थानी दृहा संग्रह 


रन प्रन्थोके अतिरक्त अनेकानेक संस्कृत, पराकरत, अपररा, प्राचीन राजस्थानी - हिन्दी 
माषामेँ रचे गये म्न्थोका संरोधन - संपादन आदि कार्य किया जा रहा हे । 


हसी तरह राष्ट - माषा हिन्दीमें मी उच्च कोटिक अन्धके भकारानका आयोजन चल रहा है । 
~ 








भ त भि भिति भिति 0 पिति भिति भि 0 भ (0 भ 0 १ # + + + 0 


प्रधान संपादक ~ पुरातत्वाचायं, जिनविजय मुनि 
[ सम्मान्य संचारक, राजस्थान पुरात्त्वान्वेषण मन्दिर, जयपुर ] 
मै 


चित्रकरूटाधिपति-कुम्भकण-नृपतिप्रणीत 


नृत्यरललकोश 


( प्रथम भाग) 
र 


राजस्थान राज्य संस्थापित 


राजस्थान पुरातच्वान्वेषणमन्दिर 
जयपुर (राजखान) 





राजस्थान पुरातन अ्रन्थमाख 


राजस्थान राज्यद्रारा प्रकारित 
सामान्यतः अखिरुभारतीय तथा विरोषतः राजस्थानदेसीय पुरातन कालीन 
संस्कृत, प्राकृत, अपश्रदा, राजस्थानी, हिन्दी आदि भाषानिबद्ध 
विविधवाड््रयग्रकारिनी विरिष्ट मन्थावछि 


नैः 





प्रधान संपादक 
पुरातत्चवाचायं, जिनविजय मुनि 
[ ओनिरारि मंबर ओफि जर्मन ओरिदन्टल सोसाहरी, जर्मनी ] 


सम्मान्य सदस्य 
भाण्डारकर प्राच्यविद्या संशोधन मन्दिर, पूना; गुजरात साहित्य सभा, अहमदाबाद 
विश्चश्वरानन्द्‌ वेदिक शोधप्रतिष्टान होसियारपुर; निवत्त सम्मान्य नियामक 
( ओनररि ईयरेक्टर ) ~ भ।रतीय विद्याभवन, बेबह 


जि ~= 0 2८८८ ~= ~" कम 


33.3.33 3 2| न्यथा ङ्‌ क ९४ #॥--4- + - + - 3 
मेदपारदेशीय चि्रकूटाधिपति कुम्भकणै नरपति प्रणीत 


नृत्यरलकोश 


| प्रथम भाग | 


---=->५ ५.२2. 





प्रकारक 
राजस्थान राज्यान्ञाचुसार 


संचारखुक, राजस्थान पुरातत्वान्वेषण मन्दिर 
जयपुर (राजस्थान) 


नैः 


माघ ९ ९३ फरवरी 
राज्यनियमानुसार ~ सवाोधिकार सर्र 
विकरमाब्द्‌ २०१३ | नियम नुसार ~ सवाोधिकार ख क्षत 1 सिला $ ५७ 





राजस्थानान्तगंत - मेदपाटदेशीय - चिच्रकूट दुर्गाधिपति 
त्र पति कुम्भकणेदेव प्रणीत 


> 
नृत्यरलकोश 
[ विविधपाठभेदादि समलङ्कृत - प्रथमवार प्रकादरित ] 
( प्रथम भाग ~ पूवौधं ) 
. 
संपादक 
घ्रा. रसिकखार छोटाखार परीख 
( अध्यक्च - गुजरातविद्यासभाऽन्तगेत - भो. जे. उच्चाध्ययन - 
संशोधन विद्यामन्दिर, अहमदावाद ) 
तथा 
डा, भ्रियवाखा दाहा, एम्‌. ए. पीणच्‌. डी. ( वंबई ) 
डी. छिद्‌. ( पारीस ) 


( प्रा. प्राचीन भारतीय इतिहास तथा संस्छृति विभाग, 
रामानन्द महाविद्यारखय, अहमदाबाद ) 


+ 


प्रकारानकता 
राजस्थान राज्याज्ञायुसार 


संचाटक, राजस्थान पुरातच्वान्वेषण मन्द्र 
जयपुर (राजस्थान) 


र 
विक्रमाब्द २०१३ | | [ खिस्ताब्द १९५७ 


का चाथा मीम मी) किमी मौ भीभीम पीय अ थ षि तिनि 


मद्रक - छक्ष्मीवाई नारायण चौधरी, निणयसागर प्रेस, 
२६ - २८ कोरुभाट स्टीट, वब २. 


तृलयरलकोश - अनुक्रम 


१ प्रथमोष्छासे ~ प्रथममङ्गपरीक्षणम्‌ 


2 दवितीय प्रयङ्खपरीक्षणम्‌ 

३ + तृतीयुपाङ्गपरीक्षणम्‌ 

४ + चतुर्थं आहायाभिनयपरीक्षणम्‌ 

५ द्वितीयोह्ासे प्रथमं स्थानकपरीक्षणम्‌ 

री दवितीयं शद्धचारीपरीक्षणम्‌ 

क ~ तृतीय देशीचारी परीक्षणम्‌ 
)# कलानिधिग्रन्थोदुतदेशी- 

चायादिरक्षणम्‌ 
थ चतुथं मण्डललक्षणम्‌ 


~>) 


९ ७9० 
७०-८ २ 
८२१०२ 
१०२-१०६ 
१०७-११८ 
१९९९१ 
१२६-१३२ 


१३२-१३८ 
१२८-१४४ 





। 
। 


[0 ` ट प" १ क, $ हृ ५१ क-9 


प्रधानसपादकीय किंचित्‌ प्रास्ताविक 
५ 

विशार राजस्थानान्तगेत मेदपाट (मेषाड ) देशकी महत्ता भारतविश्रुत है । इस 
मेवाडके मस्तकस्थानीय चित्रकूट ८ चित्तौड ) का - जिसको कविर्योनि प्रथ्वीके मुककटकी 
उपमा दी हे - एतिहासिक गौरव, भारतके भूत कारम अपना अनन्य सान रखता 
हे । अतः आधुनिक भारतका प्रयेक राष्टूमक्तं इस पुण्यभूमि चित्तौडकी यात्रा करना 
अपना परम कर्तव्य समञ्चता है । इसी चित्तौडके दुगैरूप मुकुटमे करगीके समान, वह 
जगतप्रसिद्ध कीर्तिस्तंभ विराजमान हे, जिसके चित्र भारतके प्रचीन सपय विषयक प्रयेक 
म्न्थमे ओर इतिहास विषयक प्रयेक पुस्तकमं रष्टिगोचर होते रहते हँ । चित्तौडके यात्रीको, 
बहुत दृर्से, सवसे प्रथम ददन, इसी कीर्तनरूप कीर्तिस्तंभके होते हँ । चित्रकूटके सबसे वडे 
वीर ओर विद्वान्‌ नृपति महाराणा ऊुभकर्णने ८ जिनका अधिक लोकप्रिय नाम संक्षेपमें 
कुमा प्रसिद्ध हे ) यह कीर्तिस्तंभ बनवाया था । स्थापय कलाकी दृष्टस महाराणा कुंमाकी 
यह कृति अपने ठंगकी अनुपम है । सरे भारतवर्षम इस प्रकारका अन्य को 
कीर्तिस्तंम विद्यमान नहीं हे । 

महाराणा कंभा, जैसे वीरशिरोमणि रृपति थे वेसे ही वे कटा ओर विद्याके 
विषयमे भी अद्भुत प्रतिभासंपन्न ओर निमीण-काय-कुरा व्यक्ति थे । उनके अद्भुतकला- 
परमके द्योतक, चित्तोडके कीर्तिस्तंभके अतिरिक्त, आरावली पर्वतमारूके सबसे सुन्दरतम 
शिखर प्र सुशोभित कुंभलमेर नाभक दुग ओर उसके अनेकानेक स्थान विद्यमान हैँ । 
उन्दीके कलाप्रमसे प्रोत्साहित हो कर, आवृप्रदेश निवासी धन्ना नामक पोरबाड जाति 
ज्ेन वणिक्रूने आरावलीकी उपलयकामें राणकपुरका वह अदधत जैन मन्द्र बनवाया जो 
अपनी विरारता एवं कलामयताकी दृष्टस, न केवर भारतम ही अपितु सारे एशिया 
खण्डमे, एक दशेनीय स्थान वना हुआ है । महाराणा कुंभाके संरक्षणमे उस मन्दिरका 
निमोण हुआ अतः उस सानका नाम ही राणकपुरके रूपमे सुप्रसिद्ध हआ । 


इन्दी महाराणा ऊुम्भकर्णका बनाया हुआ साहियिक कीर्तिस्तभस्वरूप संगीतराज' 
नामक संस्कृत भाषाका महान्‌ भ्रन्थ उपकन्ध होता है जिसका एक भाग, प्रस्तुत रूपमे, 
विद्भानोंके करकमख्मे उप्त दै । यदह संगीतराज भ्रन्थ बहुत बडा है । सोखह हजार 
रोको जितना इसका परिमाण है । १६-१६ अक्षरोकी एक पंक्तिके हिसावसे 
३२००० पंक्तिर्योमें यह अन्थ पूर्ण हुआ दै । प्रन्थके नामसे ही ज्ञात होता है कि 
भारतीय संगीत काके विषयमे इस म्रन्थमें स्वाङ्ग परिपूर्णं विवेचन किया गया हे । 
हमारे देशकी प्राचीन परपरानुसार संगीतके अन्तरत, उससे संबद्ध नृय ओर वादय 
कलाका भी समावेश दहो जाता है । अतः इस प्रन्थमें गीत, वाद्य ओर नृय इन तीनों 
विषयक बहुत ही विस्ठृत ओर वैविध्यपूर्णं विवेचन किया गया है । 








धाद ~ ~ ~ ~ _ ~ क य व ायातक्य्ववकन्यकन्कन्कषवव्कचककनकयाणस ४ -- 9 


[क 


~= ~ = न 9 


६ न्रलयरलकोदा 


राजस्थानके एक महान्‌ नृपतिकी असुपम साहियिक कृति होनेके कारण, इस 
ग्रनथराजके प्रकारनका मत्‌ काये (राजस्थान पुरातन प्रन्थमांछा' द्वारा करनेका हमने 
आयोजन किया है । इस प्रन्थका प्रारंभिक अंशात्मक कुछ भाग पाद्य रलकोक्चके 
नामसे बीकानेरके सुभरसिद्ध अनूप पुस्तकाखयके तत्वावधानमें प्रकट किया गया था- 
पर साधनाभावसे अगेका काम गित कर दिया गया । 


प्रस्तुत (्ृखरलकोशष'की एक प्राचीन पोथी बडोदाके “गायकवाड प्राच्य विदा- 
मन्दिरिके भ्रन्थ सं्रहमे, प्राध्यापक श्री रसिकलखाटजी परीखके देखनेमे आई जिसके 
वारेमे उनने मुञ्चसे जिक्र किया । सुश्री ड० प्रियवाखा शादा, जो उन दिनों प्राध्यापक 
परीखजीके समीप नयकला विषयक साहिलयका विदोष अवटखोकन एवं अनुसन्धान 
कायै कर रही थीं, बडोदा जा कर वह पोथी ठे आईं ओर सुश्च दिखाई । पोथीका 
दशीनमात्र करते ही मुञ्चे भ्न्थकी विरिष्टता प्रतीत हो गई ओर तुरन्त मेने श्री परीखजी तथा 


सुश्री प्रियवाखाको इसका संपादन काये करनेकी प्रेरणा दी ओर राजस्थान पुरातन 


ग्रन्थमाला दवारा इसको प्रकाशित करनेकी योजना की । खोज करने पर ज्ञात हुआ 
किं इस भन्थकी दो अन्य प्राचीन पतियां बीकानेरके अनूप पुस्तकालये सुरक्षित हँ । 
पर बह पुस्तकारख्य, बीकानेर मदहाराजके निजी अधिकारमे होनेसे उनकी प्राप्रिकी 
समस्या हमारे सम्मुख उपथत हई । प्रसंगवश खगेवासी भारतीय खोकसभा-अध्यक्ष 
माननीय श्री मावलकरजीसे जिक्र किया, तो उनने बीकानेर महाराजको अपना निजी 
पत्र भेज कर, हमारे किये उक्त मल्यवान्‌ पोधिर्योकी प्रापि सुखभ कर दी । 

इन पोथि्योके आधारसे, प्रेस कोपी तयार होने पर अदमदाबादके ही एक प्रसमं 
सुद्रणकाये प्रारंभ कराया गया । कुछ समय बाद्‌ सुश्री ङ. प्रियवाला, अपने अध्ययनमें 
विशेष प्रगति करनेकी दृष्टस, परान्समे पारिस-युनिवर्सिदीमें प्रविष्ट होने चली गद । प्रा 
श्री परीखजी भी, गुजरात विद्या समा अन्तगत उच्च अध्ययन एवं संशोधन कायेकारी 
भो० जे० विद्या मन्दिरकी नाना प्रकारकी प्रवत्तिर्योमे अलयधिक व्यस्त रहनेके कारण, 
इस प्रन्थका मुद्रणकायं प्रायः % वषं तक खगितसा ही रहा । सुश्री ड० प्रियबालाके 
विदेशसे वापस आने पर, मुद्रणका कायै फिर हाथमे छिया गया । पर अहमदाबाद्के 
जिस प्रसमें प्रथम यह काय प्रारंभ करिया गया था उसका काम संतोष जनक न होनेसे 
एवं प्रेसकी सिति भी अन्याधीन हो जानेसे, बबदके सुप्रसिद्ध निर्णय सागर प्रेसमें 
इसके मुद्रणका प्रबन्ध किया गया । ० | 

ग्रन्थका वण्यं विषय एक प्रकारसे सर्वथा पारिभाषास्मक हो कर गीत-नरलयादि 
कटा विरोषज्ञके सु-अभ्यस्त तथा खानुभवप्राप्र ज्ञानसे विशिष्ट संबन्ध रखता दहै । अतः 
इसका संपादन कायं वही विद्वान्‌ समुचित रूपसे कर॒ सकता दै जिसका साहियिक 
अध्ययन एवं प्रायोगिक अनुभव-दोनों ही यथेष्ट प्रमाणें हो । प्रस्तुत अन्धके संपादक 








¶ 
। 
। 
। 
। 
५ 


च 


किञ्चित्‌ प्रास्ताविक ७ 


दय इस विषयके उत्तम विरोषन्ञ टै । श्री परीखजी गुजरातके ख्यातिप्राप्र नाछ्यकार- 
एवं नास्यकलाविदोके अग्र दिग्दरेक ह । संगीतरज महाम्रन्थका प्रस्तुत चय रल- 
कोर" प्रकरण ¢ उल्लासो विभक्त दै । इनमे से प्रथम दो उदास, प्रथम भागके रूपमे, 
प्रकट कयि जा रहे है । अवशिष्ट २ उल्लास, द्वितीय भागमे अगे, जो प्रसमं छप 
रहा है । संपादकोकी छिखी गई विस्तृत प्रस्तावना आदि विवेचना, उसी द्वितीय भागमें 
दी जायगी; तथा म्रन्थकी प्राचीन प्रतियां एवं उनके बरिभें जानने योग्य अन्यान्य 
सब वातोका विवरण भी उसीमें दिया जायगा । 


इस संगीतराज् भ्न्थके भिन्न भिन्न खण्डोकी जो प्राचीन पोथियां प्राप्नो रही 
ह, उनमें, परस्पर, प्रन्थकततीविषयक प्ररस्यात्मक विशिष्ट उदेखोमे विचित्र पाठ 
मेद मिक्ता टै । एक प्रति महाराणा कुंभकर्णकी जगद, किसी महाराज कासेन ओर 
उसकी कीर्तिकथ।सूचक वण्यै प्रशसि दी हृद मिरती है । बीकानेरसे प्रकाशित "पाठ्य 
रलकोश्च'की प्रस्तावनामे, उसके संपादक विद्वान्‌ डं० कुन्द नराजाने इस विषयको 
ले कर बडे तर्क-वितर्क क्ये द ओर प्रन्थकर्तीके वारेभे, वे एक प्रकारसे, वड़े भ्रममें पड 
गये टै । हमको इस भ्रमके निराकरणके जये उन पोथियों ही से प्रयक्ष सामग्री प्राप्र 
हे अतः इसका वर्णन भी उसी अगले भागमें दिया जायगा । 


वंबरे - भारतीय विधा भवन 
दिनांक ~ २७, जनवरी. १९५७ | मुनि जिनविजय 














मेदपाट्देशाधीश्चर-श्रीकुम्भकणैनृपति-विरचितः 


नृत्रलकोशः। 


प्रथमोह्छासे प्रथमं परीक्षणम्‌ । 
[ मङ्गलम्‌ । | | 
।उन्ैनाथ सखजाङ्हाररचनां सद्धस्तकोह्छासिनीं 5 
खान्येवं करणानि योजय पदे मा संभ्रम प्रापय । | 
कौचे चांरचयाशयालगतिकाञ्चारीः* छ भे मण्डले | 
संप्रोत्तोऽद्रिजयेति सौरतरसे ऋल्यन्‌ शिवः पातु वः ॥ १ 
एतत्‌ किं जलमाद्गिकं ननु खषा किं वाचिकं तन्यते 
नो मिथ्या सदर तदेवमधुनाऽऽदायं विभो युज्यते । 10 
मुग्धे साल्तिकमेतदचत्र विदितं किं नेति ते तत्वतो 
गङ्ख मृद्धनि गोपतो विजयते राम्भोर्गिरां विभ्रमः॥ २ . 
दिरोदेरो' [ चन्द्रं ?] रुचिरकर पद्यऽक्षवलयं 
वरे वक्षःपीटे प्रथुश्जगहारोहवलमणिम्‌ । 
दिवां पार्श्वे कस्यां एणिमणिगणारञ्धरदानां 15 
पदाञ्जे बिभ्राणः कटकमदिजं बोऽवतु रिवः ॥ ३ 


[ नाट्यशाखस्य निष्पत्तिः । ] 
पाव्या( नाद्या ? )देरुपयोगार्थमथ चलं प्रपञ्च्यते । 


तद मावे यतः स्व निजी वमिव भासते ॥ ४20 
न चयन समं किञिद्‌ दय अव्य च विद्यते । 
चतुर्वगैफलावाधिचैव्यादेव यतः स्म्रता ॥ ५ 
केचिद्‌ ब्रह्मादिभिधर्मः कैिदर्थोऽप्युपाजितः। | 
केथित्‌ कामफल पां कैधिन्मोक्चोऽपि वयतः ॥ ६ 
प्रागल्भ्यमप्रगल्भानां सौभाग्य च तदधथिंनाम्‌। 6 
उत्साहो हीनमनसां कीर्तिरोदायेरालिनाम्‌॥ = - ` ७ 





{ ^+ ७९108 : -श्रीगणेराय नमः; ५ द° ॥ भरीगो पीजनवल्लभाय नमः ॥ 
1 480 द्वार । 2 480 श्यी । : 80 द्वियते । 4 480 देद्ोरुचि? । 5 ^86 °अरणि । 
6.89. शाः । 7 80 “चि जह्याः । । - ¦ [नु 


4 न° र० को० उल्लास १, परीक्षण १ [ नात्यराखपारस्पयैम्‌ 


ईश्वराणां त्रिलासश् स्मयं चश्चल्चेतसाम्‌ । ~ 
| दुःखिनां घैयेकरणमिन्द्रियाणां तु कार्मणम्‌ ॥ ८ 
| यूनां यङ्गारसर्वखं मानो मानवतामिदम्‌ । 
| एतद्‌ धन्यतम रोके खर्भेऽप्येतत्‌ प्रास्यते ॥ ९ 
| 5 भ्वूपानामभिषेचने पुरगरहपवेरिके कर्मणि 
| | प्रष्ठानामपि सङ्गमे खुतजनौ पर्वखभीष्टाधिषु । 
यात्रायां विजयोत्सवे सुरगमे वैवाहिके भङ्गछे 
| मङ्गल्येषु च सर्वकर्मसु तथा थज्ञादिपूर्तंष्वपि ॥ १० 


| [ नास्वशाखस्य पारस्पर्यम्‌ । 1 
10 मङ्गल्य जनतापियं नरपतिपरषठं विरोषादिदं 
| रोभाव्यं परमेतदेव जगतां लयं प्रमोदास्पदम्‌ । 
इन्द्राभ्यर्थनया पुरेदमखिलं साङ्गं विधाताऽभ्यधात्‌ 
| सोऽपीदं भरताय साङ्गमदिशात्‌ तत्पार्थनाभ्यर्थितः ॥ ११ 
| नाव्यादितितयं ततः स तु सुतैः साक रातेनाप्से- 
1 रन्वैश्चापि रिवामग्रतोऽग्यमहिम पायुङ्न्त तत्‌ प्रीतिबिद्‌ । 
एवं प्रीतिपरम्परापरवरोऽप्यस्मै तदादीदरात्‌ 
| राम्शुस्ताण्डवसुद्धताङ्रचनं खोपक्रमं तण्डना ॥ १२ 
त मणितिुकर्िपशेयःं ` 
| छस्यं चास्य पुरः पुरा ख भणितैरङद्िपञैयुतं 
| पावतयाः' समदीददात्‌ स भगवान्‌ सर्वज्ञचूडामणिः । 
| %  नन्वेतद्‌ विदितं परोन्नतिश्रलोऽन्योत्कर्षसर्वैकषाः 
| पयेणैव परोन्नतिं धृतिश्ृतः के वा सहन्ते बुधाः॥ १३ 
| एवं ते भरतात्मजा गणवरात्तण्डोरविंदित्वाऽवदन्‌ 
-मर्वयभ्यः किर ताण्डवं गिरिसुता बाणात्मजां तासुषाम्‌ । 
लास्यं साङ्गमबीभणत्‌ पुनरुषा गोपीगणं पीतित- 
% स्तन प्रप्य ततः समग्रखदितं सौराष्ट्योषाग्रतः॥ १४ 
` नानदेहाससुद्धवाश्च लल्नास्ताभिस्ततः रिशक्षिता- 
स्ताभ्योऽप्यच्र परम्परागतमिदं लोके परतिष्ठामगात्‌ | 
पाथोयेतदुपादिरात्‌ पुनरिदं गन्धर्वलोकाधिषः 
श्रीमान्‌ चिच्ररथस्तदेतदखिटं मागोभिधं तत्वतः ॥ १५ 


1 ^50 इन्द्रोभ्य । 2 4४0 शत्या समु° । 3 ७0 मतभ्यः । ` 4 4४0 श्ना तामि । : 




















श्ाख्संग्रहः | त्र र० को०~उद्लास ९, परीक्चण १ द 


तेनेदं च विराटराजदुहिता संरिश्षिताऽत्रोत्तरा 

तस्योच्छत्तिर भृदिहापि कियता कालेन तद्‌ वै पुनः । 
आराध्याखिलोकरोकरामनं शाम्भु दपः साकल- 

स्तस्मात्‌ साङ्गमवाप्य मलयेनिवहा'योपादिदाद्‌ विस्तरात्‌ ॥ १६ 
कालेनाथ पुनविंलीनमिव तद्‌ दृष्टा गणस्रामणीः 5 

रम्यः कुम्भद्पोपधिः प्रयतते वक्तुं बिदामग्रणीः। 


किति भि 0 


'नाव्यादित्िविधोपपत्तिकलनोपेतस्य तस्याधुना 





नाना्थाभिनयप्रपश्चरचनारम्यः कमो वण्यते ॥ १७ 
| चाख्रसंग्रहः । ] 

निष्पत्तिनोव्यराखरस्य तत्पारम्पयकीर्तनम्‌ । 10 
निर्भितिनोद्वरालाया निवेरोऽथ सभापतेः॥ ` १८ 
संनिवेदाः सभायाश्च सर्वरङ्ार्थकीर्तनम्‌ । 
कीर्तनं पूर्वरङ्गाङ्प्रतयाहदारादिलक्ष्मणः ॥ १९ 
[आदो ?] सम्यङ नान्दीलक्ष्म धरुवा सोपोहना ततः । 
पाच्रस्याथ प्रवेदाश्च तथेवाङ्निरूपणम्‌ ॥ २०15 
प्र्यङ्लक्ष्मोपाङ्गानां लक्ष्माभिनयलक्षणम्‌ । 
हस्तस्य करण हस्तक्षे्रस्यापि च लक्षणम्‌ ॥ २१ 
प्रचारो हस्तयोस्तद्रद्धस्तकमोण्यनुकमात्‌ । 
स्थानकानि तथा चार्यो द्वििधा मण्डलान्यपि ॥ २२ 
द्विविधानि तथा उत्तकरणानि तथेव च । । 20 
तानि चोल्छरुतिपूवोणि कलासाश्च सरेचका; ॥ २३ 
करणेरभिनिच्रेत्ता अङ्हारा द्विधा ततः । 
वृत्तयश्च तथा न्यायाथातुर्विंध्यसुपाभिताः ॥ र्थे 
देचाचत्तविधिद्रंधा तथा परिवडिर्मता । 
चत्त पेरणिनस्तस्य लक्षणं पाच्रलक्ष्म च ॥ २८५ % 
लास्याङ्गानां तथा लक्ष्मोपाध्यायाचार्ययोस्तथा । 
नटनर्तकयोस्तद्रह्यक्ष्म वैतालिकस्य च ॥ २६ 
लक्षणं रेचकस्याथ देरीचत्तभिदां तथा । 
लक्षणं रासकादीनां लक्ष्म कोह्ाण्टिकस्य तु ॥ २७ 


1 480 ध्योगादि । 2 50 नस्यादि । 3 ^ श्नादी । 


| | ४ न° र० को०-उल्लास १, परीक्षण १ [ नान््यशाानिमौणाम्‌ 


| खत्तश्चमविषिस्तद्रत्‌ संप्रदायस्य लक्षणम्‌ । 
| तद्रताश्च गुणा दोषाः क्रमेणैतत्‌ प्रकादयते ॥ २८ 


| | [ नाव्वशारानिमाणम्‌ । | 
| निष्पत्तिनाव्यराखरस्य तत्पारम्पर्यकीर्तनम्‌ । 








| 5 उभयं पूर्वमेवोक्तमथ निमोणसुच्यते ॥ २९ 
| नाद्यदालागतं त्र परीक्षेत खुवं पुरः । 
| नाव्ववेदरमगतः कुयोद्‌ वास्तु लक्षणलक्षितम्‌ ॥ ३० 
| दोषेरदूषिता भूमिः समा गौरी स्थिरा दढा । 
| अनृषरा भूमिदोषैः कीटकाथेरदूषिता ॥ ३१ 
| 0 खाङ्कलोष्टिखिता रास्ता तच्रक्षीणि समासतः । 
हस्तपुष्यानुराधान्यसौम्यचिच्रोत्तरासर च ॥ ३२ 
द्विदेवये दिने रस्ते बिष्टथाधैरपरिषठते । 
पुण्याहवाचनायेन नाव्यवेदहम समारभेत्‌ ॥ ३३ 
समां कृत्वा सुवं तच्र सितं सुच्रै प्यत्रतः । 
15 कपांसादयन्यतरजं ददं नूनं प्रसारयेत्‌ ॥ ` ३४ 
यदाकरूष्टं बलात्‌ पुम्िने जुख्यति कदाचन । 
मध्य-त्रिभाग-तुयारो चुटिते कमतो भवेत्‌ ॥ ३५ 
| विखु-राष्ट्‌-पयोक्तृणां फलं दोषावह तथा । 
| . हस्तात्‌ परसार्थमाणेऽस्मिन्‌ भ्रेऽप्यपचयो भवेत्‌ ॥ ३६ 
ॐ ततः सूत्र ददं काये नाव्यवेदमविनिर्भितो । 
तत्‌ त्रिधा गदितं वेदम निकृष्टं चतुरस्रकम्‌ ॥ ३७ 
| त्यसखरं चेति पुनर्मध्यं दीधे सममिति द्विधा । 
| तत्राद्यं देवतागारमतिदीधेमनुत्तमम्‌ ॥ ३८ 
| चतुरस च यद्‌ दीधे श्रूपतीनां तदीरितम्‌ । 
| ॐ  ब्राह्मणादेगेहं पोक्तं चतुरस्रं समं बुधैः ॥ ३९ 
| शाद्रादिहीनवणानां वेदम त्यसरमिहोदितम्‌ । 
| प्क्षागरहाणां निमोणे प्रमाणं विश्वकर्मणा ॥ ° 
| निर्दिष्ट" तत्‌ प्रबोद्धन्यमणुश्चैव रजस्तथा । 
| वालो लिक्षा च यक्ता च यवाश्चैवाङ्गरं तथा ॥ ४१ 





190 इट । £ ^90 ताहि । 





नाच्यशाखानिमाणम्‌ ] च० र० को० उल्लास २, परीक्षण १ 


एकेकोत्तरघ्रद्धया च कमादष्टगुणं त्विदम्‌ । 
हस्ताङ्कलानां विंराया चतुरन्वितया मितः ॥ 
चतुदंस्तो भवेद्‌ दण्डो नाव्यवेदमभमिती' सदा । 
तच्र स्यान्नाकिनां वेदम `सप्रविरातिदण्डकम्‌ ॥ 
दे ष्य बिस्तरतस्तत्‌ स्यात्‌ तदर्धेन मितं पुनः । 
णां षोडराभिदैण्डैर्मितमायामलो मतम्‌ ॥ 
श्रिरष्टभिस्तु विस्तारे तच्र सूत्र प्रसारयेत्‌ । 
नाद्यवेदम न कर्तव्यमत ऊध्व कदाचन ॥ 
व्ेक्षागरहाणां सर्वेषां मध्यमं मानमिष्यते। 
यतस्तस्मिन्‌ कृतं पाच्यं गेयं च अ्रव्यतां बजेत्‌ ॥ 
संसाध्या भूभिरायामे पूर्वपञिमयोर्दिंरोः । 
दक्षिणोत्तरविस्तारो प्रतीच्या विभजेच ताम्‌ ॥ 
दण्डेशञचतुभिद्रोभ्यां च द्वाभ्यामष्राभिरेव च । 
चत्वारः स्युः कमाद्‌ भागास्तेषु पिमतो भवेत्‌ ॥ 
नेपथ्यस्य गृहीतस्य पुरतो रङ्खीषे भूः । 

तदग्रतो रङ्गपीठं तत्‌ पुरस्तात्‌ स भास्पदम्‌ ॥ 
ुवभित्थं विभज्याथ बलि द्याल्लिरासुखे । 
ब्राह्मणांस्तपेयित्वा च नानारन्ैरलङ्कतान्‌ ॥ 
गरदङ्गपटवायेश्च राङ्कढुन्दुभिगोखखेः । 
सर्वातोद्यैः प्रणुदितैरुटलध्वनिपेचालः ॥ 
काषायवसनादीनां पाषण्ड्याश्रभिणां तथा । 
उत्सारणमनिषटानां कृत्वा दिक्षु दरखपि । 
पुष्पाक्षतादिभिरर्मच्रेस्तदिद्धैः शुचिमानसः ॥ 
यादृशां दिरि यस्यां स्याद्‌ दैवतं निगमोदितम्‌। 
तादरास्तच्र दातव्यो बलिर्मच्रपुरस्क्रतः ॥ 
सितरक्तनीलक्रष्णपीतधूम्रारूणामलम्‌ । 
प्रागादिदिक्पतिभ्योऽन्नं कल्पयेत्‌ प्रयतात्मवान्‌ ॥ 





1 480 शदमनितौ । > ^0 °सप्ता्वि?। 3 ^ तिरः । 


ठैर 


ठरे 


ठट 


2५ 


छेद 10 


५५१ 20 


। | 


६ न° ₹० को०-उल्लास १, परीश्चण १ [ नाख्यरालानिमाणम्‌ 


मुदूर्तनानक्ूटेन मूटेन रवणेन वा । के ` 
रोहिण्यां 'वोपोषितः सल्खुपाध्यायः' समाहितः ॥ ५७५ 
स्तम्मानां स्थापनं कयाद्टमे सद्ग्रहवीक्षिते। ` 
सुशिल्पिघटिताः स्थाप्याः कुभ्भिकाः पूर्वमेव ताः ॥ ५६ 
| 5 अन्तवेहिमोनसूत्रादर्धेन स्युः स्थिरं सिताः । 
| अभिकोणं पुरस्क्रलय स्तस्मा; स्युत्राह्मणादयः ॥ क - 49 
| खर्णताश्ररूप्यलोहस्तनमूखेऽनकमात्‌ क्षिपेत्‌ | 
स्तम्भान्‌. संपूजयेत्‌ पश्चाद्‌ वख्नमाल्यानुदेपनैः ॥ ` ५८ 
| पीत रक्तस्तथा अेतैनीलिश्चैव यथाक्रमम्‌ । 
| 10. पायसं गुडोदनं च कृतान्नं कृदारां तथा ॥ ५९ 
| | दिजेभ्यो भोजनं दद्यात्‌ स्तम्भावुक्रमतः सुधीः । 
| तावुत्थाप्य शाने विद्वांश्च -कम्पविवर्जितान्‌ ॥ ६० 
| स्थापयेत्‌ कुम्भिकारीषं रान्तिपाठ्पुरस्सरम्‌। ` 
| यतस्तचलने राष्टेऽनाव्रष्टि; कम्पने तथा ॥ द१ 
| 15 परचक्रभयं तस्मात्‌ तत्र थल्नो विधीयते । 
| स्तम्भस्थापनमन्ोऽयं प्रणवादिनमोन्तकः ॥ २ 
यथाचखो गिरि्भेरर्हिंमवांथ महाचलः । ॑ 
जयावहो नरेन्द्रस्य तथात्वमच[खो भव] ॥ ~ ह 
अनेन स्थापितान्‌ स्तम्भान्‌ पदयेद्‌ दक्षिणतो नगान्‌ । 
%  विप्रराजन्ययोर्मध्ये युवा खाक्रान्तया सह ॥ देथ 
सौम्ये सप्रापरांस्तद्रन्मध्यतो वैरयश्चद्रयोः । 
एवमष्टादरहोते स्युः स्तम्भाः साषटकरान्तराः ॥ ` ` ६५. 
सुवा खाक्रान्तया साकं दक्षिणेतरपाश्वयोः । | 
ूर्वपशचिमयोस्तद्रद्वस्तबोडराकान्तरौ ॥ ५ 
% द्धौ द्वौ स्तम्भौ समारोप्यौ खार्धाक्रान्तुवौ थक । 
तयोर्मध्ये तथा स्तम्भौ सा्टहस्तान्तरो पथक्‌ ॥ ` ६७ 
खाधाक्रान्तखुवो स्थाप्यौ द्वौ द्रौ पथिम पूर्वयोः । 
एवं स्युवंसवस्तम्माश्चाथ' मध्यञुवि कमात्‌ ॥ “ = 





| 1 80 वापा । 2 +50 %ध्याय स^ । 3 40 स्तंभास्युः । 4 490 गअ । 
| । 5 480 °च ॥ । 6 5 "पर्वैः | 7 ^ अवथ° | | 





लौन्राखानिमाणम्‌ ] ० र० कौ०-उलास ९, परीक्चषण १ 


स्थितस्तम्भानसारेण सप्र सप्रापरान्‌ सुधीः । 
विन्यसेत्‌ सूत्रमास्पफास्य चतशूष्वपि पड्किषु ॥ 
पश्चहस्तमितायामान्‌ विस्तारे दस्तमाच्रकान्‌ । 
चतुःपश्चाराद्दितान्‌ सह पृवैर्मनोरमान्‌ ॥ 
यत्पङ्किद्वितयं पार्श्वे पड्कियो मध्यतः स्थिता । 
तासु को्ठा्टकं काथ समन्तादष्टहस्तकम्‌ ॥ 
मध्यपड्स्तु ये पड्की पाश्वेतः समवसिते । 
तन्मध्ये तु सिते पड्की ये तेपूर्वेऽष्टकोष्ठकैः ॥ 
दैर्ध्येऽष्टदस्तकैव्यांसे चतुदेस्तवि भूषितैः । 
विस्तारायामयोयद्रा तां भूमि विभजेद्‌ बुधः ॥ 
दराच्रिराता तथा दस्तेखतुःष्या यथाविधिः । 
दरा्निरादेवं कोषाः स्युञतुरखा मनोहराः ॥ 
आयामे परिणाहे च करैः षोडराभिर्भितम्‌ । 
मध्यकोष्टचतुष्कं तु रङ्गपीठं प्रकल्पयेत्‌ ॥ 
ूर्ववद्रङ्गपीटस्य वदहिकोणादिकोणगान्‌ । 
ब्राह्मणाद्युपधिस्तम्भान्‌ स्थापयेत्‌ शिलस्पिसत्तमः ॥ 
करैः षोडकाभिः सम्यगन्तराटवि भूषितान्‌ । 
चतुस्िदात्‌ पुनः स्तम्भानन्यान्‌ बेधविवर्जितान्‌ ॥ 
साष्टहस्तान्तरान्‌ विद्धान्‌ यथाभागमवस्थितान्‌ । 
स्थापयेदेवमेतस्मिन्नष्टतिरान्मनो दरान्‌ ॥ 

, यद्रा द्राचिरदाता दस्तेरायामपरिणादयोः। 

`: चतुरस्रां सुवं करत्वा स चतुःषष्टिकोष्ठकम्‌ ॥ 
मध्ये कोष्टचतुष्केऽस्यां रङ्गपीठं प्रकल्पयेत्‌ । 
रङ्गपीठात्‌ पृष्ठ भागे रङ्गकीषे प्रकल्पयेत्‌ ॥ 
 तत्पूर्वमागे नेपथ्यभवनं साधु कारयेत । 
` अभ्रिकोणादिषु ततः कमेण स्तस्मवेरानम्‌ ॥ 





६९ 


.9.9 
७८ 20 
७९ 
८9 


28 
८९ 


1 580 शसुघ्लीं । > 6 चंतुदैस्तविभरषिते वषटया यथाविधिः "11116 10६1 


4. 088 116 82116 ८624110 16 1188 {16860 पाद्यः इ ग ९161100 





क्क स 


च्° २० को०~उद्धास ९, परीक्षण र 


ब्राह्यणाद्युपधिच्छन्न ` पीठनेपथ्यवेरमनोः । 
खाधाकान्तं सुवा साकं चतुेस्तान्तराखतः ॥ 
प्रतिकोण यथा कोणस्तस्भाभ्यां ` सह सर्वतः । 
तथा षोडका संस्थाप्याः स्तम्भाः सु्ानुरोधतः ॥ 
आयामे तेऽहस्ताः स्युविस्तारे स्युञतुःकराः 
चतसखष्वपि काछठासु रङ्पीरस्य कोष्टकाः ॥ 

[ते] जयल्लयोऽसं भूय स्युञतुःषष्िसंख्यकाः । 
स्तम्भा एकोनपश्वारान्नाव्यवेदमनि कोकाः ॥ 
मूर्धि तेषां विचिच्राणि काष्ठानि परिकल्पयेत्‌ । 
भरणाख्येषु काटेषु विचित्राः रार भञ्जिका; ॥ 
कायो मृद्धेसु "तेषां स्युधेरिण्यः शिल्पिसंस्करृताः 
ताखथ स्थापनीयं स्यात्‌ तियेग दारुचय दटम्‌ ॥ 
पररपरं संहताः स्युः पदिकास्तत्र दारुजाः । 
सुशिष्टसंधिकं रन्ध निखेक्तं स्याद्‌ यथा तथा ॥ 
छादनीय प्रयतनेन काछठानामन्तरारकम्‌ । 
छादनकममाभिलय षरं लोहाजुसारतः ॥ 

तथा सुधा निधेयाऽत्र यथा चन्द्रकराः परम्‌ । 
तच्रालुबिम्बमासादयय चन्द्रकोटिभ्रमावहाः ॥ 
स्युरेव भित्तिक्माथो रिल्पिवयेः पयोजयेत्‌ । 
स्तम्भं वा नागदन्तं वा वातायनमथापि वा॥ 
कोण वासपतिद्रारं द्वारं विद्धं न कारयेत्‌ । 
दृढमूला समा भित्तिः पक्वेष्टकचिता दढा ॥ 
यथोचितद्वारदेरास्तम्भाद्रंच्छादनोचिता । 
चन्द्रविम्बप्रतीकारा खुधारेपवि भूषिता ॥ 
विचिच्रचिच्र'संयुक्ता वात्स्यायनविनिर्भितेः। 
रतप्रबन्धरुचिरा नानानाटकचिचिता ॥ 
नापिक्ानायको चेतनानारूपविचितिता । 
रताराङ्कलिकापिण्डीमेदवन्धविनि्मितैः ॥ 


+ 11 


| ५५ 


८२ 


९३ 
९ 


९५ 


1 0 पीठे ने° । 2 «56 स्वस्वाक्रान्तं । 3 8५ स्तम्भास्यसह०° । 4 ४५ केषाः । 





माच्यशारीनिमौणम्‌ ] चच० र० को०-उल्ास १, परीक्षण १ 





शीकुम्मकणसङ्गीत्‌-गीतगोविन्दरूपकैः । 
कर्तव्या चिच्रिता भित्तिर्विचिच्रा चिच्रकर्मठेः ॥ ९ 
नेपथ्यवेहमनस्तच्र द्वारं पथ्िमतः स्तम्‌ । | 
एकमन्यद्‌ रङ्गपीटगप्रवेराय प्रयोजयेत्‌ ॥ „ ९ 
पूर्वतो द्रारमेवं स्यात्‌ तत्र इारद्रयं छुभम्‌ । + 
नेपथ्यमन्दिरे तत्र रङ्गदीषं प्रकस्पयेत्‌ ॥ र - 
षडदारुकयुतं तस्य विधिरच्र प्रपञ्च्यते । 
ूर्वद्रारस्य पाश्वेस्थं कर्तव्यं स्तम्भयुगमकम्‌ ॥ ९९ 
तदधश्चो्ध्वतश्चापि दासदरन्द्रं मनोहरम्‌ । 
विचित्ररचनं कायेमेतत्‌ षड्दारुकं भवेत्‌ ॥ १०० 10 
ब्राह्मणादिचतुःस्तस्भाभ्यन्तराटे यदीरितम्‌ । 
रङ्गपीठं च तत्‌ कायं नात्यु्चं नातिनिश्नकम्‌ ॥ १०१ 
समन्तादष्टहस्तं तदादरोतलसंनि भम्‌ । 
` सिग्धं समतलं खच्छं तत्र स्यान्मत्तवारणी ॥ १०२ 
दक्षिणोत्तरपाश्वंस्थस्तम्मयुग्मसमाश्चया । 15 
साधारकाष्ठरुचिरा व्णकैरुपभूषिता ॥ १०३ 
` ` . रत्नानि चाच्र देयानि वनं पूर्वदिरि स्यतम्‌ । | 
वैदूय दक्षिणे पार्श्वे पिमे स्फटिकं तथा ॥ १०४ 
उत्तरे तु प्रवालं स्याद्‌ मध्ये कनकमीरितम्‌ । 
एवमेतस्य विदुषा कर्तेव्योपरि भूमिका ॥ १०५४ 
चतुस्स्तम्भसमायुक्ता खुवर्णकलशोज्वला । | 
यथा दौलगुहाकारो जायते नाव्यमण्डपः ॥ १०६ 
„ ; , गम्मीरशाब्दवान्‌ मन्दवातायन परिष्करतः । | 
 निर्बातोऽतिप्रयन्नेन ` यस्मादेवं कृते सति ॥ ~. १०७. 
कुतपस्य प्रजायेत गम्भीरध्वनितोचिता । 98 
पुरतो रङ्पीठस्य मध्यपङ्कः सुकोष्ठके ॥ : १०८ 
^ ` ` पश्चमे वाथ षष्ठे वा स्थानं कायं स भापतेः। "न 
निानार्थयुत्तधेनाधहस्त तु तत्‌ स्तम्‌ ॥ .. १०९ 


चर र० को०-उल्लास १, परीक्षण १९ [ सभापतिलक्षणम्‌ 


सखधाधवलितं शुभ्रं नानाभङ्गिमनोहरम्‌ । 
अन्येष्वपि च कोष्ठेषु यथायोग्योन्नतानि तु ॥ ११० 
आसनानि परकल्प्यानि विविधानि ज्युभानि च। 
 नेपथ्यभित्तितो भित्ति दराहस्तान्तरां दडाम्‌ ॥ १११ 
5 चश्चहस्तोन्नतां क्यात्‌ परितोऽन्यां सनिगेमाम्‌ । 
| तत्र रक्षिजनाः स्थाप्या अप्रमत्ताः समन्ततः ॥ ११२ 
| एवंबिधानसंयुक्तं नाव्यवेरम खुवो विसु । 
| जयायुःकीर्तिजननमन्यथा न छु भावहम्‌ ॥ ११३ 
॥ इति नेपथ्यग्रहरुश्षणम्‌ ॥ 


| | ॥ 
10 | सभापतिरशक्षणम्‌ । ] 


रामायुत्तमनायकप्रतिनिधिः खस्थः कुलीनो युवा 
पाच्रापाच्रविदोषवित्‌ स्थिरतमप्रेमा कलाकोविद्‌ः । 
| गीतज्ञः सकलागमार्थनिपुणो ` विद्रुत्परियः सत्यवाक्‌ 
| खाधीनाखिरसेवको बहुधनोऽभीष्टार्थदानोदधुरः ॥ ११४ 
| 15 रूपखी परवचित्तविद्‌ गुणगणमग्राही कृतज्ञो गणी 
| धर्मिष्ठो रस भावविज्ञनमनोहारी सुवेष; सखी । 
|| श््गारी बहृदोऽनपेक्ष्यवि भवः कीतिंप्रियः कासुकः 
प्रा्तौचित्यविरोषविच्छवचिमनाः परोक्तः सभाधीश्वरः ॥ ११५ 
॥ इति सभापतिरश्चषणम्‌ ॥ 





| %0 , [ सभासन्िवेशः । ] 
पीठस्यास्य पुरः स भास्तरणयुकसद्रेदिकायां विु- 
हैमं खस्थविचिच्ररलखवितं सिंदासन भाखरम्‌ । 
अध्यासीत तदग्रदेरामहितो म्री ततो दक्षिणे 
नानाराख्कलाविरोषकुरालाः काव्यार्थनिष्ठामिताः ॥ ११६ 
% ` बिश्वार्थाभिनयप्रपश्चचतुरास्तौयंचिकन्ञा रसा- 
४ वेदाभिज्ञ'नवीनवुद्धिवि भवाः खखाभिचेतोविदः । 
| जवज्ञाः कवयो विरोषविदुषः सत्पण्डिताश्चाज्न ये 
| वेद्या उ्योतिषराख्ननिधिषणा ये भूपतर्वह्भाः ॥ ११७ 


|: ` 1 480 बिद्धिव्मिः । .2 ५26 °मिज्ञनन° । 3 ^20 नष्ठ° । 








सभासन्निवेदाः ] न° र० को०-उल्लासर, परीक्षण ९ ११ 


ते स्युदेक्षिणतो बिभोनवनवखखोचितान्यासना- 
न्यध्यास्य प्रतिभाविरोषविजितेन्द्रेञयाः' सभापण्डिताः। 
वामेनास्य पुनः सता नरपतेरनैपुण्य भाजो जना 
ये चान्येऽभिनयप्रवीणमतयो चयेष्वभिज्ञाः पुनः ॥ ११८ 
पृष्ठे चास्य वराङ्गना नरपतेः स्युवारनार्यो लसत्‌- 5 
 तारुण्याकर भूमयो वसतयो लावण्यलीटाथियाम्‌ । 
चित्रालङ्कति भूषिताः सिततरैर्नचाश्चटैः कामिनां 
यूनां चित्तविवेकवै भवमलं" संच्छादयन्त्यो निज्ञैः॥ ११९ 
चश्चद्रत्रमयोसनुपुररणत्कारिविंलासोह्छसद्‌ 
भावैमोनससं भवं निजनिजैरुदोधयन्त्योऽन्वहम्‌ । 10 
संसिज्ञत्करचारुचामरमरुत्संबीजयन्यः स्मित- 
` ज्योत्लाद्युभ्नितदिङ्खुखाः ;परवरी कारिकसत्कर्मणा ॥ १२० 
अग्रे वेच्रधरा चपेङ्ितिविदो मान्येतरज्ञानिनो 
दक्षा रक्षणकमंणि प्रतिपदं संप्राप्तसेवेदकाः । 
प्रोदश्चज्ञयजीवमङ्गलदरिरःसेवा'विदग्धाः सदा . 18 
तिष्ठेयुः परितः; समीरितदशो निं खृपस्याग्रतः॥ १२१ ` 
शाश्वद्राजकुलोद्वाः सुनिपुणा निलयानुरक्ता चपे 
नो भिन्ना न च संहता परिगतान्योन्यानुरागस्प्रहाः । 
स्पधोबन्धमनोहरा परिगतानेकाख विव्योदधरा- 
¦ परितोऽस्य रक्षणविधावुदयत्समस्तायुधाः ॥ १२२१ 
 नानादेराविचारचारुमतयो नाव्यागमे पारगा 
वैदग्ध्याश्रतवाहिनीजकधयश्चाश्ल्यखेदोज्द्िताः । 
द्रष्टारो विबिधक्षितीश्वरस भास्थानस्य मानेष्सवो 
वर्तेयुः परितोऽस्य बन्दिनिवहास्तत्कर्मसंदासिनः॥ १२३ 


॥ इति सभासन्निवेश्यः ॥ 25 


[ पूवेङ्गः । ] 
एवं तत्र समग्रलक्षणपरीवारे सभानायकेः 1, 
ऽध्यासीने रुचिरोखमौक्तिकमणिप्रायं खुसिंहासनम्‌ । 


1 80 नन्दरस्याः। 2 ^ मलः । 3 20 सेवादि० । 








१२ नू० र० को०-उदल्ास १, परीक्षण १ [ पृरवैरङ्गः 
नाव्वाचाये उपेत्य तत्तदुचितप्रावीण्यविद्धिः सम 








` बग्यैः संबिदधाति रूपकबिधेस्तं पूर्वरङ्ग खुधीः ॥ १२ 
अभिनेयार्थतादात्म्यपडुः स्फुटतरो नटः । | 
:  पदाथाभिनयाचिच्र व्यञ्जयन्‌ स्यात्‌ तदग्रतः ॥ १२८५ 
> रसाभिधायकं नाव्यराब्दे नाय्येऽपि वृत्तितः । ट 
लक्षणाया वर्तमानखु भयं दरोयन्‌ रफुटम्‌ ॥ १२द 
तथा च चलयराब्दार्थसुभयालुग्रहं वदन्‌ । 
>. , चये चाभिनये साक्षाद्‌ वक्ति लक्षणयान्वयम्‌ ॥ १२७ 
नाव्येनाभिनय रलयराब्देन च रसं पुनः। 
10 व्रत्या लक्षणया साक्षादुभयं दरोयन्‌ पदम्‌ ॥ १२८ 
करणाङ्हारनिचयेकेत्तमनच्नोपदरायन्‌ । ` 
°“ ¦ रसः सभ्ये नटे वास्य विकलस्य जिहीर्षया ॥ १२९ 
खात्मानं तन्मयं कुर्वन्निव रङ्गखुपाश्रयेत्‌ । ॑ 
ततः कुतपबिन्यासायङ्प्रचयपेरालम्‌ ॥ १३० 
15 स्रधारः पूर्वरङ प्रयुङ्क्ते नास्यतत्वगम्‌ । 
` . यतो रसात्मकस्यास्य प्रयोगे प्रयुयुक्षिते ॥ १३१ 
रज्यते वै सहृदयः पूर्वरङ्स्ततः स्मरतः । 
सपाद भागः सकलः परिवत्तैः समन्वितः ॥ १३२ 
` प्रयोगोऽयं यतो रङ्े पूर्वमेव प्रयुज्यते । द. 
; ` ˆ तेनोक्ता भरताचायथरखुखैः पूर्वरङ्ता ॥ ` ` १६३ 
रङ्दाब्देन तत्‌ कर्मोच्यते तौयेत्रिकाथितम्‌। 
तत्पूर्वं भागो विद्रद्धिः पूर्वरङ्ग उदीरितः ॥ १३ 
सोपोहनास्तद्विना वा धरुवा उत्थापनीसुखाः । 
` सखत्रधारपवेराथो यतोऽस्मिन्‌ पूर्वमेव हि । 
% प्रयुज्यते ततः पूर्वरङ्गता वास्य संमता ॥ १३५ 
चतुरख-ज्यस्र भेदाद्‌ द्विविधः स पुनर्द्विधा । 
छ्युद्धचिच्रविभेदेन पथगेवं चतुर्विधः ॥ १३६ 
करणाङ्गहाररादिव्यं शद्धता चित्रता पुनः । 


1 न तत्सद्धावोऽथ विच्रामीने भिनधुवायुतः॥ = १३७ 
| नन 





पूरवैरज्गा्गसंग्रहः] 





र ° र० को०~उद्ास ९, परीक्षण २ 


चतुरस्रस्तथा च्यखः षड्विधः कैधिदिष्यते। 
केषांचन मते मिश्रो द्रय संमिभ्रणान्मिथः॥ 


[पू्ाङ्गसं्रहः । ] 
अथाभिधास्यते सम्यक्‌ पूर्वरङ्ाङ्गसंग्रहम्‌ । 
प्रयाहारोऽवतरणमाश्रवणारम्भवक्त्रपाणी च । 
परिघटटनाथ संघोटनाथ मागोसारितं च [?]॥ 
आसारितोत्थापिन्यौ नान्दी शुष्का च कृष्टाहा । 
रङ्द्वारं चारी सैव महत्परूविंका त्रिगतम्‌ ॥ 
प्रस्तावनेति कथितान्येतान्यङ्ानि भारते पूर्वैः । 


, .. अद्गैरेभि'रिदाङ्गी "निष्पन्नः पूर्वरज्ञो 
तेभ्यो नैवाभिन्नो भिन्नोऽपि पेक्ष्यते कचित्‌ सद्धिः ॥ ` 


[ प्रयाहारः । ] 
उत्थापनीप्रयोगे [ च ] घाधान्येनोपकल्पिते । 
प्रयाहाराद्ययं याता प्रच्योदीच्यां गतामच्र ॥ 


` . अत्राश्रावणिकाद्यं यदङ्षट्कं कमेणोक्तम्‌ । 
देवस्तवार्थमपदं पदबद्ध वा द्विधा तदुदिष्टम्‌ । 


` . अपदं तच्र तु गीतं निर्गतं कीतिंतं तच ॥ 


यत्‌ पदबद्धं गीतं तदेवप्रीतिदं बहिर्गीतम्‌ । 


` . तस्मात्‌ पदैर्निवद्धं प्रयोज्यमाश्रावणादीह ॥ 


प्रायेण तु बहिर्गतमन्तजवनिकागतेः । 

तन्त्री भाण्डकृतं तज्ज्ञः प्रयोक्तव्यमतन्द्रितैः ॥ 

ततो जवनिकां हित्वा समस्तकुतचैः सह । 
-पाव्यक्रतानि स्युः परवेरङ्गाङ्कानि तु ॥ 


` ततः पुनः प्रयोक्तात्र मन्द्रकादेस्तु मध्यतः । 


प्रयोज्य किशिदेकं तु वद्धेमानमथापि वा ॥ 


पूर्वरङ्ग प्रयुञ्जीत ततोऽन्याङ्गससुचयम्‌ । 
अथामीषां क्रमाद्‌ वक्ष्ये लक्षणानि समासतः ॥ 


` .. : ज्ञेयः कुतपविन्यासः प्रल्याहारः स चेदा; । 


1 480 अङ्खेरिभि० । 2 ^ निष्पनः। 8 ^ वक्षे । 


१२ 


१३८ 


१३९ 
९४० 


10 


१४१ 


10 


15 


2 


30 


१४ 


----- 





न° र० को०~उद्टास ९, परीक्षण ९ [ अवतरणादीनि 


प्ाङ्घुखः स्यान्मादेरिको रङ्ध प्रयगवस्थितः। 
गान्धवोचाथकौ याम्ये रङ्गभूमावुदङ्खुखो ॥ 
तस्य दक्षे मोखरिको वैणिको वामदेरागः। 
निवेरानं गायकानाम्‌- 

॥ इति प्रत्याहारः ॥ 


[ अवतरणम्‌ । ] 

- तथावतरणं स्खतम्‌ ॥ 
तच रङ्गोत्तरस्यां स्याद्‌ याम्यदिग्सुखगोचरम्‌ । 
पश्चषेर्विस्तृता दस्तैस्तथा *वसुकरायता ॥ 
रारचन्द्रपतीकाराऽथवा बालाकसंनिभा । 
नानावणोऽथवा रतनिकरेः खचिता नवा ॥ 
कोणेषु परितश्चापि सुक्ताजाल परिष्कृता । 
विहितां दैवतैस्तत्तत्स्थान भागनिवेरितैः ॥ 
मध्ये महेश्वरः पाश्वे चतुखखचतुशुजौ । 
सूयोचन्द्रमसौ तेषां सव्यदक्षिणपाश्वयोः ॥ 
तारकाः स्युस्तत्परितो देव्यस्तत्कोणगाः स्म्रताः। ` 
वायौ सरखती बहौ तारकान्वीराकोणगा ॥ 

"ज्ैरवी नकते कामगामिनी दक्षिणे पुनः। 
गोरक्षः सिद्धनाथस्तु पिमे पूर्वदिग्गतः ॥ 
मीननाथ उत्तरस्यां चतुरङ्गः कमादिमाः । 
देवताः पूजयेत्‌ पूव स्थानेपूक्तेषु मच्रवित्‌' ॥ 


॥ इति अवतरणम्‌ ॥ 
नः 
| आश्रावणा । ] 
तत आश्रावणापाणिच्रयः क्मवदरोन यत्‌ । 
खल्पमादौ श्रूयमाणं शवङ्गायस्य माज्मनम्‌ । 
तस्मात्‌ तद्छक्षणं पूवे मया सम्यगुदीरितम्‌ ॥ 
॥ इति आश्रावणा ॥ 
नैः 


 [ आरम्भः । ] 


` ततः खल्पेष्ववहितेष्वङ्गमारम्भसंज्ञकम्‌ । ` 


तद्‌ यत्र गायकाः साक्षात्‌ सप्तखर परिग्रहम्‌ ॥ 


९४९ 


१५० 
९५६ 
१५२ 
९५३ 
१५ 
९५५ 
९५द्‌ 


१५७ 


१५८ 


रह 5 १५९ 
1 80 विणिको । 2 ^20 वस्तु । 3 ^90 नैतौ । 4 49 °्रवत्‌ । 





धक्कपाण्यादीनि † ° र० को०-उल्लास ९, परीक्षण र १५ 


कृत्वा कुरयुस्तालयुक्तं गीतं तच्र ध्रुवाः पुनः । 

सप्रखरोद्धवास्ताः' स्युः सृगतिश्च सुगन्धिनी ॥ १६० 
रौद्री पाश्चादनी तद्रत्‌ पाश्चाटिन्यथ दैवती । 

अश्विनीति कमादाभिग्रेहणं स्यात्‌ प्रसादनम्‌ ॥ १६१ 
चतुरखरभिदास्तिख्रस्तिस्रोऽप्याद्यासु तत्पराः । 5 
तिस्रर्यस्रभिदाखेवं दैतिनीवदि हाश्विनी ॥ १६२ 


एतद्भाथाभिरा'तोद्यवादनं राजरिष्यया । 
॥ इत्यारम्भः ॥ 


[ वक्रपाणिः |] 
तथा पाणिविभागार्थं वक्रपाणिर्विधीयते ॥ १६६10 
अच्र वक्राङ्गान्तमाह्ुः दुष्करं पाणिरुच्यते । 


गाथालक्षितपूवोला पाभिरातोदयवादनम्‌ ॥ देवे 
॥ इति वक्रपाणिः ॥ 
प. 


[ परिषट्ना } 1 
“तद्योजःकरणाधं च भवेच्च परिघटना । 15 


 एतद्भाथाभिरातोद्यं वादयेद्‌ वादकोत्तमः ॥ १६३५ 
॥ इति परिघटना ॥ 


[ संघोटना 1] 
वादयच्रत्तिवि भागां भवेत्‌ संधोटनाविधिः। 
अङ्गघठाभ्यां च तजेन्या तच्रीवादनतो भवेत्‌ । 


गाथाभिरुक्तपूवौभिरिहातोयं प्रवादयेत्‌ ॥ १६६ 
| ॥ इति संघोटना ॥ 


[ मागासारितम्‌ । 1 
तच्नीमाण्डसमायोगाद्‌' मागासारितमिष्यते । 
चिच्रादि त्रिषु मार्गेषु करणेधोतुभिः समम्‌ ॥ १६७. 
५ ॥ इति मागोखारितम्‌ ॥ 


नैः 


~ ~~~ - ~ -- ~ 








20 


[ आसारितम्‌ | 
तालो खदङ्गस्तच्री च कचिदेकैकदाः कचित्‌ । ` 
युग्मी भूय प्रधानं स्याद्‌ गुणः सर्वव्यपेक्षया । ` 
षड्‌ ध्रुवाः कमतोऽर स्युः 'प्राधान्ये त्रितयस्य तु ॥ 
अथासारितमच्र स्यान्मागौसारितपूर्वकम्‌ । 
आपूर्वात्‌ सरतेधीतो रूपे पाताः पुरोदिताः ॥ 
आसायन्त इति पक्ता वुधैरासारिताभिधाः । 
एतस्योदाहृतिः पूर्वसुक्ता लक्षणपूविंका ॥ 

॥ इत्यासारितम्‌ ॥ 


न 


[ पाठबृद्धियुक्तियुक्तमासारितम्‌ । | ५; 


'यान्यवोचमहं पूर्वं गीतकानि चतुदश । 
व्मानादिकं चैव सर्वमन्रैव योजयेत्‌ ॥ 
उपक्रमे गीतकानां प्रयोगसूचनादिभिः। 
उपोद्यन्ते खरा यस्मात्‌ तस्मादुक्तसुपोहनम्‌ ॥ 
तदुक्त पूर्वमस्माभिश्चतसखरः कण्डिका अपि । 
विरालासंगते तत्र कनिष्टासारितोद्धवे ॥ 
मध्यमासारिताज्ञाता विराला संगता तथा । 
सखुनन्देति च तिस्रोऽपि ज्येष्ठासारितं भवाः ॥ 
सुसुखी च सुनन्दा च संगता च विरालिका । 
उक्तपाते कमैरेतैरासारितविधिक्रमात्‌ ॥ 
पिण्डीबन्धाः प्रदद्यन्ते वधेमानक्रमेण च । ` 
ते चे्ट^देवतारूपा इष्टचिचाभिता अथ ॥ 
विलभम्बितल्येऽभीष्टमान आसारितस्य तु । 
कलाकलापसंयुक्तोपोहनस्यार्थ भागिका ॥ 
समाशतस्रश्चतुरा नतेक्यः पुष्पपाणयः। 
अन्तधीनमपाकरूलयालङ्कये रङ्ग भूमिकाम्‌ ॥ . 
पुष्पाणि नमस्कुयु; कमेण ताः । 


इन्द्रादिकोकपालेभ्यः परिवत्त्ये चतुर्दिंदाम्‌ ॥ 


5 20 चुष्पेपुष्पपाणयः । 


न° ₹० को०~उ्टास १, परीक्षण ९  [ आसोरितादीनिः ` 


१९८ 


१६९ 


१.७० 


१७२ 


१७२ 


१७ 


, १७५ 


| १.७द 


१५.५७ 


१७९ 


~~ 
`. 1.42 श्रघान्ये । - 2 ५४० आचायैन्त । -3 ^ यान्येव । 4 ४९ -देकता 


4 1 2: 
क = + भ ऋः भ" 





पठाब्द्धिय॒क्तमासारितम्‌ ] ० र० को०-उल्ास ९, परीक्षण १ १७ 


` वन्दनानि प्रकुर्वन्ति पुनश्च परिवर्तनात्‌ | 
उपोहनाथोभिनयमङगहारेः प्रयुज्य ताः ॥ १८० 
पिण्डं बध्नन्ति तत्रस्थाः कनिष्ठासारिताश्रयम्‌ । 

` उपोहनं पश्चकलं सूचया भावयन्ति ताः ॥ १८१ 
वैराखरेचितेनासामेका भूत्वा पृथक्‌ ततः। ¢ 
अभिनीयोपोहनाथ दरखीयेच्च तदेतराः ॥ १८२ 
पयस्तका्यङ्गहारैः प्रखलेयुस्ततस्तु ताः । 

पिण्डीबन्धं समास्थाय भावयन्त्यङ्करेण तु ॥ १८३ 
प्रथमोपोहनस्याथं परिवलत्यं पुनश्च ताः । 

वैदाखरेचितं करत्वा करणं रङ्पीटके ॥ १८४ 10 
विकीयं पुष्पनिचयं 'कुयुरवस्तुवि भावनम्‌ । 

ताभ्य एका विनिधिलय परथमं वस्तु भावयेत्‌ ॥ १८५ 
तदेव चारु चातुयोद्‌ दचोयेन्नयतः पुनः । 

ततः पिण्डीगताः सवः पिण्डीबन्धस्पागताः ॥ १८६ 
सूचया षट्कल" कुयुरद्वितीयोपोहनं पुनः । | 15 
तस्यैवं करणं ज्ञेयं तदर्थस्य विभावनम्‌ ॥ १८७ 
अपखल्य द्वितीयाथ ताभ्यो वस्तु द्वितीयकम्‌ । 

"चश्चत्पुटेन ताखेनाभिनयेत्‌ प्रथमा तदा ॥ १८८ 
प्रचयेदङ्कहारेण चतस्रो भिलिताः पुनः । 

विधाय यूङ्कलाबन्धं द्वितीयस्याच्र वस्तुनः ॥ १८९ 20 
अङ्करेण पुनः कुयुरुपोहनमथैकिका । 

ताभ्यो निःखल्याभिनयेद्‌ द्वितीयं वस्तु तत्परम्‌ ॥ १९० 
प्रदरोयन्लयङ्क'हरिस्तदथं मिलिता अथ । 

पिण्डीबन्धं समास्थाय समं कुयुरुपोदनम्‌ ॥ १९१ 
एवे तृतीयाऽभिनये तृतीयं वस्तु रङ्गा । 25 
षट्‌ पितापुत्रकेण द्वे कुयौतामङ्हारतः ॥ १९२ 
 नतेक्यो मिलिताः पञाह्तावन्धसुपाभिताः। 

 अङ्करेण पुनः कयुरुपोहनमथ स्फुटम्‌ ॥ १९३ 





14 कुयुङ्खेयु ! 2480 एक ! 3 480 षद्फठे । 4 4.४0 चचत्‌० । 
8 ^80 *“यल्यङ्ग । 6 450 मिमिखः । > 
३ न> रज्ञम 











९३१ 


29 


अन्योन्यं मिलिताः प्राग्वत्‌ तृतीया प्रथमान्विताः। 


` तृतीयं वस्त्वभिनयेन्रुलं कुयोदू द्वितीयिका ॥ 


ततः सङ्कल्य पिण्डीस्थाः कुयैस्तुयेखपोहनम्‌ । 
सूचयाष्टकरं पश्चादपखल्य चतुर्थिका ॥ 

चतुर्थं वस्त्वभिनयेदङ्गहारं ततः परा । 
कुर्वीरन्‌ मिलितास्तिख्तस्रोऽपि ततः परम्‌ ॥ 
अङ्करेण चतुर्थस्य वस्तुनो भेयकाभिधम्‌ । 
बन्धमास्थाय कुर्वीरन्चपोहनमतः परम्‌ ॥ 
विश्छिष्यान्योन्यमाद्याभ्यां द्वाभ्यां साक्तं तृतीयया । 
अङ्गहारिरभिनयेचतुर्भौ वस्तु तुयकम्‌ ॥ 

अथ स्वसु नर्तक्यः पिण्डीबन्धखुपाभिताः। 
चतुर्थोपोहने कुथुरपख्त्य तृतीयिका ॥ 

तृतीयं वस्त्वभिनयेत्‌ तिखरो चत्यन्ति तत्पराः । 
लताबन्धमथास्थाय कुयुः पूर्वसुपोहनम्‌ ॥ 
प्रथमं वस्त्वभिनयेत्‌ प्रथमाऽपथिता ततः । 
तदेतराः प्रदल्यन्ति मिलिताः पुनरेव ताः ॥ 
कुःसमाञ्जलिमाकीयै चतस्रोऽपि तदा समम्‌ । 
अङ्गहारिः प्रदलयाथो भवन्यपश्चितास्तु ताः ॥ 
पिण्डी शङ्कलिका चेव रताबन्धोऽथ मेयकः। 
पिण्डीबन्धश्चतुर्थऽपि तहुक्षणमथोच्यते ॥ 

स चेष्टदेवता'रूपोऽनुकारेण स्तो वुधेः । 


तस्य देहानुकारेण विधेया च' विपश्चिता ॥ 


पिण्डाकारेण विज्ञेयः पिण्डीवन्धस्तदा पुनः। 
शङ्कलात्मा भवेद्‌ गुल्मो लता जालखरूपिणी ॥ 
'संदंरो मेद्यको रूपं चतुर्थमिदमीरितम्‌ । 

सुचा स्यात्‌ पिण्डिकाबन्धादङ्करेः शङ्कलादिभिः ॥ 


उभयं स्षतमारोहेऽवरोहेऽङ्कर ईरितः । 


यस्मिन्नासारिते पूरवैयदीरितखुपोहनम्‌ ॥ 


1 420 °तारूजकारेण | 2 +90 चा । 3 5 संददो । 





० र० को०-उल्ास १, परीश्चण १ [ पाठबृद्धियुक्तमासारितम्‌ 


१९४ 


१९५ 
१९९ 


१९. 


१९९. 
२०० 
२०९१ 
२०२ 
२०२ 
रज्य 
२०५ 
२०द 


२०७ 





 इस्थापना ] ` न° र० को०-उलास १, परीश्चण १ १९ 


प्रतिवस्तु तदाघ्रत्तिरिति केचन मन्वते । 
स्फुरं रक्त विभक्तं च सम शुद्धप्रहारजम्‌ ॥ २०८ 
बत्यानगं वधेमाने वाद्यवादनमिष्यते । 
कनिष्टासारितस्यायं विधिरुक्तः सविस्तरः ॥ २०९ 
अन्येष्वासारितेष्वेष विज्ञातव्यो विधिवुधेः। $ 
सर्वेष्वासारितेष्वच्र नर्तकीनां प्रवेरानम्‌ । | 
वैराखरेचितेन स्यादिति राजेन्द्रसंमतम्‌ ॥ २१० 
नर्तक्यः षोडदौवं सुकुसुमनिचयं रङ्गभूमौ विकीये 
प्रीये शाम्भोः प्रदलयन्यसक्रूदभिनयैरर्थजातं परदरयं । 
एतद्‌ वै पाच्रवद्धिप्रभवमविकटे वधेमानं प्रयोज्यं 10 
हाम्भोरग्ेऽथ सर्वक्ितिपतिपुरतो नाल्पभ्रभतैरप्रे ॥ २११ ` 
यस्मात्‌ सर्वक्षितीराः खयमिह भगवानित्थमावेदितं प्राग- 
अन्यच्चैकं सुगीतं विधिवदलुभवाद्‌ देराकालानरोधात्‌ । 
योज्यं गीतप्रवीणरभिमतसरताप्रीतये युक्तियुक्तं 
क्षोणीखुश्रोणि भत्र निगदितमखिरं वुद्धिसंस्थं विधाय ॥ २१२1 
॥ इति पाडवरद्धियुक्तियुक्तमासारितम्‌ ॥ | 





[ उत्थापना | 
अतः परं प्रवक्ष्यामि धरुवासुत्थापनाभिधाम्‌ । 
सूत्रधारपवेराथं प्रयोगं नान्दिपाठकाः ॥ २१३ 
उत्थापयन्ति रङ्गेऽस्मिन्‌ प्रयोगं पूर्वमेव यत्‌ । % 
तस्मादुत्थापनं प्रोक्तं राजराजेन धीमता ॥ २१४ ` 
गौ लो ग्लौ लाख्रयो गश्च खौ ग एकादराक्षरेः । 
चतुर्भिश्चरणेः पोक्ता धरुवा प्रागक्ततालयुक ॥ २१५ 
यथा- 
गङ्गातरङ्परिधौतजटम्‌ ध 
गोरीकुचद्रयनिषिक्तकरम्‌ । | 
दवेन्द्रखुख्यसुरप्ूज्यपदम्‌ 
वन्दामहे रिवममेयपदम्‌ ॥ २१द्‌ 
रातौ दहिद्विकलौ सं चेककलं वरिकलस्तु सं । 
` प्रयेकं चरणेष्वत्र रखयत्रितयमेव च ॥ अ) 


1 ^80 नादि । 





२० न° र० को ०-उलास ९, परीक्षण १  [ उस्थापनां | 


| परिवतौस्तु चत्वारस्तेषामाव्यस्िते ख्ये । = 
|| दरा्चिराता कलानां स्यात्‌ ल्ये मध्ये द्वितीयकः॥ २१८ 
| सोऽपि तावत्‌ कलस्तावान्‌ तरतीयोऽपि कल्स्ततः। ` 
तावानेव चतुर्थस्तु परं ` तस्याद्धते ल्ये ॥ . २१९ 
5 ध्रुवेयं चतुरस्रा स्यादस्यां पाणिच्रथं भवेत्‌ । 
संनिपातैश्चतुभिः स्यात्‌ परिवतं इहैककः ॥ २२० 
प्रथमे वा द्वितीये वा ततीये संनिपातके । | 
पूर्वस्मिन्‌ परिवर्तेऽत्र वाद्य माण्डपरिग्रदः। 
| | सूच्रधारपवेरोऽच्र द्वितीये परिवर्तके ॥ २२१ 
|| 10 ` तत्पारिपाश्वकौ स्यातां सभ््खारकजज्रौ । | 
सपुष्पाञ्ञलयः छङ्कवसखनाः सखुमनससख्रयः। 


~ ~ ~ 


कृतमङ्कलसंस्कारा वैष्णवस्थानके स्थिताः ॥ २२२ 
| प्रविरोयुस्ततः सुज्ध।रः पञ्चपदीं जेत्‌ । 
| दक्षिणं चरणं पाश्वोक्रान्तचायो ससुरिक्षपेत्‌ ॥ २२३ 
| 16 ताटच्रयं ततः सूच्या वाम चरणसुरिक्षपेत्‌ । 
सद्यः सू्रधारोऽथ गत्वा पश्चपदीं ₹ानेः ॥ २२४ 
रङ्गमध्ये पुष्पमोश्चैः पूजयेत्‌ पद्मसंमवम्‌। 
नमस्कु यौत्‌ ततो देवं मनोवाक्ायकर्मभिः॥ = २२९. 
कलाभिः स्यात्‌ षोडदाभिः पश्चपद्यां प्रवेरानम्‌। 
% `  पुष्पाञ्जलिबिमोक्षे तु कटा्टकखदीरितम्‌ ॥ < 7 अष 
तावतैव तु काठेन द्वितीये परिवत्तैके। ` ह 
नमस्कायं देवतानां तृतीये परिवर्तक ॥ २२७ 
आक्रामेन्मण्डलं प्रणे दक्षिणं पादसुद्धरन्‌ । | 
सूच्या सव्येन दक्षं च विद्भदृश्चेण वामकम्‌ । 
% सुच्यैवेवं प्रु्वीत मण्डलस्य प्रदक्षिणम्‌ ॥ २२८ 


| | आचम्य प्रोक्ष्य कर्तव्यं जज्नरग्रहणं ततः । 
| | अन्योन्यं पादयोर्वेधश्चतुष्कल उदाहृतः । 
|| प्रदक्षिणं चाष्टकरमाचामे चिकटेन तु ॥ २२९, 





1 ^.986 सस्याद्धते । 2 ^ कटं । 





उत्थापना ] न° २० को०-उल्लास १, परीक्षण १ २१ 


जजेरग्रहणं काथं `कलयैकिकयेव तु । 
ततीये परिवर्तते च तच्र मच्रमिभं जपेत्‌ ॥ २३० 
नक्षत्रेऽभिजिति त्वं तु प्रसूतः राद्रकरौनः। 
जयं चाभ्युदयं चेव पाधथिवाय प्रयच्छ वे॥ २३१ ¦ 
चतुथं परिव्तेऽथ सुत्रश्रत्‌' कुतपोन्खुखः। 6 
विक्षेपवेधौ रचयन्‌ पदौ पञ्चपदीं व्रजेत्‌ ॥ २३२ 
चारातारा सन्निपातौ पातास्यखधुवागताः । 
दवादशत्तेद्वियणितैः परिवर्तद्रयं भवेत्‌ ॥ २३३ 
परिवर्तद्रयं चान्न कला दादाक भवेत्‌ । 
आदावन्तेऽष्टमे तुर्ये दच्ामे गाः परे चलाः ॥ २३४10 
इयसुत्थापनी त्यस्रापातास्ताटादिका इह । 
चतुरसखरात्‌ पादहीनाः- | 

[ परितिनी । ] | 

अथ स्यात्‌ परिवर्तिनी ॥ २३५. 

सूत्रभ्रत्प्रसुखा अस्यां परिवलयं चतुर्दिदाम्‌ । 16 
कुर्वन्ति लोकपालानां वन्दनानि यतस्ततः ॥ २३६ 
परिवर्तिनी धुवाऽस्यां त॒ सवं छा अन्तिमो गुरूः । 
चत्वारश्चरणा छन्दो जगती चातिपूर्विका ॥ २३७ 


यथा-जिनयनमभिनवख्ष भगति, अन पररदनवदनक्रलनम्‌ । 
मदनकदनकरनयनवरं भजत सुवन भयश्मनरिवम्‌ ॥ २३८ 2 
अस्यामादयाश्चतसखरः स्यु; कटा गुरुतया [च याः ]। 
चतुरः स्युः परा इत्थं कलाः षोडशा कीतिताः ॥ २३९ 
ताभिर्टौ संनिपाताः संनिपातद्रय तथा । 
भवेत्‌ प्रतिदिरा कुयोत्‌ दिङ्नायेभ्यो नमः ऋमात्‌ ॥ २४० 


विक्षेपवेधौ रचयन्‌ पूर्वोक्तः कमतः खुधीः । १ 
प्राङ्खुखः प्रणमेत्‌ पश्चपदीं गच्छन्‌ सुराधिपम्‌ ॥ २४१ 
उत्क्षिप्य दक्षिर्णं पादं वामवेधेन पूर्ववत्‌ । 

कुर्वन्‌ पञ्चपदीं तत्र निवर्तेत कलाद्रयात्‌ ॥ २४२ 
कटाद्रयेन गमनमियमच्र चतुष्कटी । 

एकैकाराधिनाथस्य नमस्करणकर्मणि ॥ २४३ :0 


1 ^80 कङाये० । 2 ४0 भूत्‌० । 8 ^80 पदो० । 4 ^50 गर्विकाम्‌ । 














| ५! न २० को०~उल्लास १, परीक्षण १ [ परिवर्विनी 
॥ एवं चतुर्दिगीकानां नमस्कारादनन्तरम्‌ । 
। ॥ 

| 





दिव-विष्णु-विरञ्िभ्यः प्राङ्सुखो रङ्गमध्यगः । 

















| पुंखीनपुंसकपदे नमस्कु योत्‌ क्रमेण तु ॥ रथेथे 
| | दूरखुत्क्षिप्तमन्र स्यात्‌ पुरुषं खीपदं पुनः । 

| | 8 किलिदुत्क्षप्तपरम समं क्षिपं नपुंसकम्‌ ॥ २४५ 
| पुमानित्थं दक्षपादं कृत्वा चधा नमस्कियाम्‌ । 

| कुयौन्नारी तु वामांहिमेवं करत्वा द्विधा चरेत्‌ । 

| । दक्षं न पुससंत्ञेयसखु भयोस्तुल्यलक्षणम्‌ ॥ रदे 
| खरी विष्णुः पुरुषः राम्भुः पदं ब्रह्मा नपुंसकम्‌ । 

| 10 एवं करते सू्रश्रता विधिना परिवर्तने ॥ २४७ 
| चतुर्वणीनि कुखुमान्यादायाञ्ञलिना नटी । 

| 


| प्रवित्‌ तत्प्रवेदो* च धवा भरावेराकी यथा ॥ २४८ 
| सत्पुस्तकोह्टसितपाणितलाखुयच्छचाङ्समकान्तिखुखाम्‌ । 
भक्ते्टदानकरपद्ययुगां वन्दामहे कमलसम्मवजाम्‌ ॥ २४९ 
15 ` सूत्रधाराञ्जलो पुष्पमोक्ष कृत्वा चरेन्नटी । 





दिक्पतीनां वन्दनानि सू्धारोक्तवर्त्मना ॥ २५० 
आतोदयवादनं तच्र विना गानेन वणितम्‌ । 
नानावणशच कुसुमेजेजेरातोयप्रूजनम्‌ ॥ २५१ 
. सृच्रभर्र्तकी तद्रत्‌ सूत्रधारस्य चाचेयेत्‌ । 
% तदाक्षिधिकिका ज्ञेया -वा सात्र यथा भवेत्‌॥ २५२ 


कुण्डलमण्डितगण्डयुगं भूधरकन्दरक्रतवसतिम्‌ । 
सुन्दरचन्द्रकलाकलित चाम्खमहं प्रणमामि विभुम्‌ ॥ २५३ 


| चतुभिश्चरणेरेवं भूषितामलमातभिः। 
| आक्षिधिका श्वुवा कायो व्यपकरष्टामह' चवे ॥ २५४ 
|| % चतुरख्राम्टकलां स्थायिवणां स्थिते ल्ये । ५ 
| | खद्भयं गद्भयं गो छो गावेवं चरणाङ्किता ॥ २५५ 
|| पङ्को षोडशामाच्राभिरपकरष्टा श्रवा यथा । 

1 450 पदैन० । ॐ 420 नमस्छयाम्‌ । 3 ^80 “पुनषं । 4 9० प्रते । 


58 ८6 “पहः । 





नान्दी ] च्च ° २० को०-उच्कास ९, परीक्षण १ 


हेटाबिदलितकामदारीरं लीखानिजिंतदान वराजम्‌ । 
देहाधीकृतभूधरसूनं बन्दे राम्सं त्रिभुवननाथम्‌ ॥ 
चारातातारासं द्विः समितिपाताः कटा्टके । 
धुवाभिश्चतखभिः स्यात्‌ परिवर्तोऽग्रिमः पुनः । 
रोषासख्नयस्तु तिखभिस्तच्राद्या परिकीर्तिता ॥ 
इहाभिदधिरे केचिद्‌ गणेस्तां भ्यादिभिः पृथक्‌ । 
धुवयोः परिवर्तिन्या कृता बरं पुरा यथा ॥ 
प्रथमे परिवत्ते तु ताभ्यो वक्रोद्धवस्तथा । 
बहुपादो वहिजश्चेल्यारी रेलयप्रपश्चनम्‌ ॥ 
परिवर्तेषु रोषेषु विदध्युर्विंधिनोदितम्‌ । 

॥ इति परिवतिंनी ॥ 


| नान्दी । | 

इमां गीत्वा पठेन्नान्वीं सूत्रधारः समाहितः । 

मध्यम खरमाभिलय देवद्विजमहीभ्रताम्‌ ॥ 

आदरीवोचनसंयुक्तं पदैरष्टभिरन्विताम्‌। 

दद्ाभिः केचिदिच्छन्ति पदैद्रीददाभिः परे ॥ 
देवेभ्योऽस्तु नमस्करतिरद्रिजकुं संव्धतां यसा 

पथ्वीराः प्रथिवीं प्ररास्तु सकलां भूरस्तु सस्योत्तरा । 
काटे वषतु पुण्यवारिजलदो नन्दन्तु गावश्िरं | 

देः क्षेमखभिक्षवान्‌ भवतु नो राजास्तु सद्धर्मवान्‌ ॥ 
राष्ट चास्तु निरामय च लभतां रङ्गः प्रतिष्ठां परां 

प्रक्षाकतुरिहास्तु धर्मवि भवो ब्रह्मद्विषो यान्त्वधः। 
कीति; काव्यकरतोऽस्तु भक्तिरचला भूयादुमेरो सदा 

तत्तद्‌ भूरिभिरन्वहं विलसताद्‌ घर्मस्य रक्ताकरः ॥ 

एवं द्वादराभियुक्ता पदैनान्दी निदिता । 

अन्यद्‌ मेदद्भयं चास्या ऊश्यतामनया दिका ॥ 

`नान्दीपदान्तरेष्वेवमेवं भ्रूयादितीरिणौ । 

उक्तार्थसप्रपञ्चन्ञौ भवेतां पारिपाश्वेकौ ॥ 


1 ^.86 नादी । 


२३ 


२५५९ 


२५.७० 
२५८ 


२५९ 


२द० 


२९९१ 


२९२20 











-- 
<> 


२७ न° ₹० को० -उल्ासं १ परीक्षण १ [ पूरवैरङ्धविधिः 


तत्‌ सप्रपश्चवाक्यादिनान्दीमेदससुचयम्‌ । 
"भरताद्‌ ज्ञेयमन्रोक्तरविस्तरः स्यान्महानिति ॥ ` २६६ 
॥ इति नान्दी ॥ | 


[ शुष्कापक्रृष्टा | ] 
यच्र शुष्कराक्षरेरेव दयपकरषा तु या धरुवा । 
यस्मादभिनयात्‌ "सञ्च प्रथम दयभिसायैते॥ ` २६७ 
तस्मात्‌ श्ुष्कापकृषटेय जजर्छोकदरिीका । 
॥ इति शुष्कापङ्ष्टाः ॥ 


[ पू्वेरङ्गविधिः । ] 
रङ्द्रारमतो ज्ञेयं वागङ्ाभिनयात्मकम्‌ ॥ | २६८ 
नेयं चारीप्रचारं सहत इह मही न क्षम वः* तीनां 
ब्राह्मं सद्य क चारापदमिदह भगर्व॑स्ते अुजोतक्षेपणानाम्‌ । 
ब्रह्माण्डाघात' भीतया परिहर विषमं ताण्डवाटोपमेवं 
खत्यारम्मे भवान्या भवतु जनसुदेऽभ्यथितश्चन्द्र चूडः ॥ २६९ 
वागङ्गाभिनयोपेतमिति पद्यसुदाहृतम्‌ । 


रोषं लक्षणमेतस्य भरतादवगम्यताम्‌ ॥ २७० 
ततश्चारीसंज्ञ समं चूङ्ारचरणाद्‌ भवेत्‌ । 

रोद्रपचरणाच्रापि [?दच्र ] महाचारीति कीर्तिता ॥ २५१ 
विदूषकः सुच्रधारस्तथा वै पारिपाश्वेकः । ्‌ 
यच्र कुर्वन्ति संजल्पं तदच्र त्रिगतं मतम्‌ ॥ २.७२ 
` भ्रक्रतस्यैव कायस्य सिद्धत्वस्यानुसुचकम्‌ । | 
उपायोपेयभवेन कायेसिद्धिव्यपाश्रयम्‌ ॥ २७३ 
कविनान्नालङ्कतं च वाक्यं यच्र प्रयुज्यते । 
सा स्यात्‌ प्ररोचना नाम वस्तुप्रस्तावनाभिधा ॥ २७ 
एभिरङ्खैः प्रयुक्तैः स्यात्‌ तत्तदैवतप्रूजनस्‌ । 
केषाचिद्छक्षणं पोक्तमिहोदाहरणेः सह ॥ २७५ 
प्रयोगस्य फलं शोषं लक्ष्मोदाहरणे तथा । 

भरतादवगन्तव्यं नेह विस्तरराङ्या ॥ ॥ २.७दे 

॥ इति पू्चैरङ्गबिधिः ॥ ` 





1 ५४० भरतान्‌ । 2 4.80 सञ्च ! 3 480 शुष्का च कृष्टा \ 4 80 संबो । 
5 ४0 ब्रह्माण्डघोत \ 6 ^80 °भ्याधित्‌ \ । क + 








अभिनयस्य, दास्ये च ] य° २० को०-उ्ासं १, परीक्षण १ २५ 


[ अभिनयच्रयम्‌ । | 


*निष्क्रान्ते सूत्रधारेऽथ पारिपाश्वेकसंयुते । 
प्रविरोन्नर्तकी तच्रायतस्थानकमाभिता ॥ २.७७ 
नत्वा देवानथ सक्िस्वा रङध पुष्पाञ्जलिं ततः । 
अभिनेतुं प्रक्रमतेऽभिनयान्‌ सा यथारसम्‌ । २७८ 
वक्ष्येऽतोऽभिनयानादावभिनेयार्थसाधनम्‌ । 
यस्मादुपेयधीनं स्याद्विनोपायधिया कचित्‌ ॥ २७९. 
ठयञ्जयन्ती रतिसखखान्‌ भावान्‌ या वासनामयान्‌ । 
रसावसानाऽभिनयो भवन्ती व्याप्रतिनेटे ॥ २८० 
चातुर्विध्यात्‌ खहेतोः स चतुधा गदितो वुधैः । 10 
आङ्किको वाचिकस्तद्रदाहा्यः साच्तिकः परः ॥ २८१ 
 तन्राह्धिकोऽङकरनि्ेत्तः दिरःप्रश्रतिभि भवेत्‌ । 

गाथागीतः परबन्धावययो वाचिकस्तद्धवत्वतः ॥ २८२ 
भूषणादिरिहाहा्थमाहायैस्तत्परकारितः। 
सीदलयस्मिन्‌ मनः सच्चं सात्त्िकस्तन भावितः ॥ २८३ 15 
एवं ठ्यवस्थिते राजा राख्रसागरपारगः। 
आङ़्िके सा्तिकाहायौन्तभोवाद्क्ति "तद्विदः ॥ २८४ 
नास्यमार्गो पाधिभिन्ने द्विधा चयसुदीरितम्‌ । 

..: : तेः क्तप्रत्यये रूपं देरीखत्तमिहोदितम्‌ ॥ २८५ 
नाद्यं मागे च देदीयसुत्तमं मध्यमं तथा । ~ 
अधम कमतो ज्ञेयं चत्यत्रितयसुत्तमैः ॥ २८६ 


 खास्यम्‌ । | 
लास्यताण्डवमेदेन च्रयमेतद्‌ द्विधा कृतम्‌ । 
 लखलनाललितैरङ्गरचनोपचितैः शुभैः ॥ २८७ 
` प्रयोगैः खुङमरिथत्‌ साधितं लास्यमनच्र तत्‌ । क 
लछासाः [खी] पंसयो भोवास्तच्रादौ येछदारथ) तु तद्धिते ॥ २८८ 
ˆ साधावर्थे लास्यराब्दः कामोष्टुसनदेतुकः । 
ह मृद्रङ्हारकरणे चारी "चरणकोंमटः ॥ | २८९ 








य-म = - ------*~ - - 


# \7 61868 277 {0 284 816 ए€]2९७५९५ 10 40 88 81. 0 88 ग #१€ ` 
19९06410 8९८1071. 1 ४५ चातुेधाः ^. चातुर्विध्याः । 2 ^80 तद्धिताम्‌ ; 

^ 80 तदधिदः | 3 450 छखखिते। 4 ^ र्चण । +» 1 

ॐ च्र°र०करोशे 














| ॥ 
| 


18 





20 


2 





36 . 


125० तमना । 


चर° र० को०-उटास ९, परीक्षण १ [ ताण्डव, सामान्याभिनथश्चं 


| ताण्डवम्‌ । ] 
ताण्डवं तद्रवेद्यत्तु प्राधान्येन प्रवर्तितम्‌ । 
करणरङ्हारेश्च प्रयोगे उद्धतैरिह ॥ 
तण्ड़ना निर्मिते चये प्राहर्भदच्रये परे । 
विषमं विकटं कष्विलयच्र तद्धिषमं मतम्‌ ॥ 
यदभ्यासवशाद्रज्ञभ्रमणादि प्रदह्येत । 
विरूपवेषावयवव्यापारं विषमं मतम्‌ ॥ 
करणैरश्रितादैयेत्‌ प्रयुक्तं तद्भवेद्यघ । 
सङ्गीणे तद्धवेन्नयं यदेतन्रयसंकरात्‌ ॥ 
सर्वेष्वभिनयेष्वच्र व्यापारैराङ्धिकैयतः । 
उत्पद्यन्ते लयमेदाः सप्रपश्चा अनेकाः ॥ 
अतः प्रयत्नतः सवान्‌ तानहं वच्मि यन्तः । 


 अच्राङ्ञाभिनयः साक्षादङ्विन्ञानप्र्वंकः ॥ 


तच्राङ्गानि रिरो दस्त वक्षः पार्श्वे कटीतटम्‌ । 
पादाविति षड्क्तानि भरताचायंसंमते ॥ 
यथा चाह भगवान्‌ भरताचायेः- 

[ सामान्याभिनयः । | 
सामान्याभिनयो नाम ज्ञेयो वागङ्खसत्त्वजः । 
तच्र कायः परयलनस्तु नाव्यं सत्त्वे घतिषठितम्‌ ॥ 
इह भावा रसाश्चैव दचयासेव परतिष्ठिताः । 
इच्या हि सूचितो भावः पश्चादङ्कैर्विभाव्यते ॥ 
न ह्यङ्गाभिनयात्‌ कथिद्‌ ऋते रागः प्रवर्तते । 
सर्वस्य सहजो रागः सर्वा दभिनयोऽ्थजः ॥ 
वाद्यानीह राल्राणि वाङ्किघछठानि तथैव च । 
तस्माद्वाचः परं नास्ति वाचः सर्व॑स्य कारणम्‌ ॥ 
एतेऽभिनयविरोषाः कर्तव्याः स्वं भावस्ंपन्नाः । 
अन्येऽपि लौकिका ये ते स्व लोकतः साध्याः ॥ 
नानाविधैयथा पुष्पमालां बध्नाति माल्यक्रत्‌ । 
अङ्ोपाद्गै रसे भोवैस्तथा नाव्यं पयोजयेत्‌ ॥ 

या यस्य लीला नियता गतिश्च 
रङ्धप्रव्रत्तस्य विधानयुक्ता । 


ये 6 क कः अ जका क कक्‌ 





२९० 


२९७ 
२९८ 
२९९ 
३०० 
३०१ 


३०२ 


साच्रास्याभिनयः] ० र० को०-उल्लास १, परीक्षण ९ २७ 


तामेव कुयौदवियुक्तसत्तवो 
यावत्तु रङ्गात्‌ प्रतिनिःखतः स्यात्‌ ॥ ३०३ 
` एवमेते मया पोक्ता भावा द्यभिनय प्रति । 

नोक्ता येऽपि तु तेऽप्यत्र लोकात्‌ ग्राद्यास्तु पण्डितैः ॥ ३०४ 
यानि वाच्येस्तु न ब्रूयात्‌ तानि गीतैरुदादरेत्‌ । 5 
न तैरेव हि वाक्यायैरथ प्राक्कवलास्रयः ॥ ३०५ 
श्रव्यं अ्रवणयोगेन इदयं दषिविचारणैः । 
आत्मस्थं वा परस्थं वा मध्यस्थं च विनिर्दिरोत्‌ ॥ ३०६ 
एवमन्येष्वपि तथा नानाकायौर्थद शनात्‌ । 
विनावाचा नु भावो वा विज्ञेयोऽर्थवरादुधैः ॥ ३०७10 
वैयेलीलाङहारः स्यात्‌ पुरुषाणां तु चे्ितम्‌ । 
दस्तपादाङ्गसश्चारः स स्रीणां रुलितो मवेत्‌ 
नराणां प्रमदानां च भावाभिनयनं पथक्‌ ॥ ३०८ 

वेदस्तथाध्यात्मं प्रमाणं चिविधं स्तम्‌ । 
लोकाध्यात्मषदार्थषु प्रायो नाय्यं व्यवस्थितम्‌ ॥ ३०९. 
देवतानाश्षीणां च राज्ञां लोकस्य चैव हि 
पूर्व्रत्तनुचरितं नाव्यमिलयभिधीयते ॥ नो. 
एवं लोकस्य या वात्ता नानावस्थान्तरात्मिका । 
सा "नाव्य संविधातव्या नाव्यहेतोः प्रयोक्तभिः ॥ ३११ 
यानि राख्राणि ये धमा यानि रिल्पानि याः क्रियाः । 20. 
लोकधर्मपरव्रत्तानि नाय्यमिलयभिधीयते ॥ ३१२ 
न च चाक्यं हि लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च । ्‌ 
चशाख्रेण नियमं कत नानचेष्टाविधिं प्रति ॥ ३१३ 
नानारीखाः प्रकृतयः शीखे नाव्यं पतितम्‌ । 
तस्माह्छोकप्रमाणं हि नाव्यं ज्ञेयं पथोक्तभिः ॥ ३१४ % 


नाद्यप्रकाराः कथिता मयैते 
विज्ञाय सम्यङ्‌ मनजैः प्रयोज्याः । 
नाद्यस्य तत्वानुगतः प्रयोगः 
'संमानमय्यं लभते हि रघ ॥ ३१५ 
॥ इति सामान्याभिनयः ॥ 30 
> 


1 48 वोचा? । > ^४० साच्नास्ये । 3 490 समान? । 








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न° र० को०~उल्टास ९, परीक्षण १ [ चित्र-आहार्याभिनयौ चृत्तयश्च 


[ चित्रामिनयः । ] 


अङ्गाययभिनयस्यैव यो विरोषः कचित्‌ कचित्‌ । 
अनुक्तसुच्यते चिन्नः स चिच्राभिनयः स्मरतः ॥ 
रम्मोर्वदी प्रतिभिरदिव्यं नाय्यं पवर्तितम्‌ । 
तथैव मानुषे रोके पार्थिवानां गृहेषु च ॥ 
सङ्गीतपरिङ्केरा निलयं प्रमदाजनस्य गुणहेतुः । 
यन्मधुरककेरात्वं मजते ना्यं प्रयोगेण ॥ 

॥ इति चि्राभिनयः ॥ 


[ आहायांमिनयः । ] 


यतोऽलंकायेरोषत्वमलङ्कारस्य वण्यते । 
आहायोभिनयस्यातो नाद्धिकात्‌ परथगर्थता ॥ 
रोषत्वाह्ूणतापत्तेने प्रधानत्वमिष्यते । 
गुणः प्रक्रलयङ्गमतोऽन्याङ्गता संमता "सताम्‌ ॥ 
अन्याङ्गमधरधानं स्यादतो न वसकः(? रसकः)खतः । 
अङ्केषु सुकुटादीनां खब्देषु यमकादिवत्‌ ॥ 
न संस्कार-विरोषत्वात्‌ पथक्त्वं कस्यचिन्मतम्‌ । 
सालङ्कारीर्वयोगुम्कैरङ भेषावि भूषितः ॥ 
वि भागादेरभिव्यक्त रसाभिव्यञ्ञकत्वतः। 
भूषणानां न भूष्येभ्यो गणना पथगीप्सिता ॥ 
` यथा घुतादिके मृधि क्रियामेदाद्धवेद्धिदा । 
एवं भूषाविभेदेन भेद इत्येव सखुन्दरम्‌ ॥ 
` उपाङ्गता वाऽमीषां स्यात्‌ परथग्बत्तरभावतः। 
तथा हि त्रितये ह्यस्मिन्‌ चतस्रो वरत्तयः स्ताः ॥ 


 [ भारयादिवृत्तयः । ] 
भारती सात्वती चेव कैशिक्यार भटीति च। 


: ` “वर्तन्तेऽभिनया यस्मादाखासां व्रत्तिता ततः ॥ 


भारत्यभ्य्दिता यच्र व्रत्ति;ः सा नारती मता । 


वृत्तिः सा कैरिकी या तु कैरयवत्‌ सौक्ष्म्यरालिनी ॥ 


२६९ 
२९७ 


२३१८ 


३१९ 
२२० 
३२१ 
३२२ 
रररे 
३२ 


३२७५ 


२२दे 


३२५ 


1 4४ °वसी; ० रंभावैसी । 2 5५ गताम्‌ । 3 ^80 बतैते । 4 6 चृत्ति । 








साच्तिकभावपरीक्ा ] ० र० को०-उल्टास ९, परीक्षण ध २९ 
अभिनेयपरां रोभां काचित्‌ संपादयन्त्यपि । 


आरं स्यात्‌ 'रचातदन्तस्य योगाद्योधा भटाः स्मरताः ॥ ३२८ 
तद्रत्तिरिव या च्रत्तिभेवेदारमदी तु सा । 
: ; : ऋग्यज्ञःसामवेदेभ्यो वेदाच्ाथवंणात्तथा ॥ ३९९ 
्रमाल्लताश्चतसखस्तु नानामेदोपव्रहिताः । 5 
: ; : भारलयां वाचिकाः सर्वे वर्तन्तेऽभिनया इह ॥ ३३० 
| तिखष्वन्यास वर्तन्तेऽभिनया आङ्किका पुनः । 
... : च्रृत्ति८१ त्य) मावादभिनयो नाहार्योऽचायेसंमतः ॥ ३३१ 
न 
[ साच्िकभावपरीक्षा । | #९ 
अतः कायमनोवाग्भिर्निमित्तैखि विधैरिद । 
` निर्मत्तत्वात्‌ चिते स्युरिति केचन मन्वते ॥ ३३२ 
विचारस्यासहत्वेन नैतद्यक्ततरं यतः । 
सात्त्विका आङ्खिकेष्वेव पथेवस्यन्ति तत्त्वतः ॥ ३३३ 
नरस्यातत्खरूपस्य किः तादात्म्यमतो न हि । 1 
` ` ` स्तम्भादीनां सात्त्िकत्वं केवलानामिदोदितम्‌ ॥ ३३य 
अथ प्रयत्ननिर्वेत्याः सास्विकाश्चेद्धवन्मते । 
. मतमेवं वचो भ्धिरङ्गीकारोचिता त्विह ॥ ३३५ 
एत एव प्रयत्नेन निचयाः स्वं एव वा । 
` स्तम्भावया उत रल्यादिस्थायिनो उयभिचारिणः ॥ ३३६ % 
तथा हि बिवदन्तेऽ् सत्वे प्रावादुका यथा । 
 विकाराद्रायुसंरोधनिर्भितात्‌ सात्त्िकाज्८१ ज्ञ): ॥ ३३७ 
मदोद्धटादयः “श्वासोचछ्ाखादेवोसनामयात्‌ । 
चिदंरो वायुसंरोधा'त्सिद्धसंबेवययलक्षणः ॥ ३३८ 
चिराचिरखरूपेण सतत्वमितयभिधीयते । म 
५ ^: हिक्षाभ्यासाचिरतरमङ्गाथनौद्यकर्मणि ॥ ` ३३९ 
वासनाभिनयैर्नेतद्भदलोलयटसंमते । 
` ` यथा तदानीं नो कतौ तादात्म्यं नैव किंचन ॥ ३४० 
भावः खसुखदु+खाभ्यां के मेदा वेराकश्चन(१) ॥ ३४१ 


~+] ब गा व्य ध 
` 180 जारदंतस्य; ^ शाखत्रदं तस्य । 2 ० नयाहार्योत्रायेसमंततः । 3 8० काम 
यतो । 4 ^8० स्वासोतस्वासो । 5 ^० “धा सिधा । 





३० न° र० को०-उ्टास १, परीक्षण २ [ साच्िकभावपरीश्ता 
ल्यतालावसानस्य विषयेष्ववधानतः । 


प्रणीतस्य प्रयोगत्वासंभवात्‌ लौकिकाः स्मरताः ॥ ३४२ 
स्तम्भादीनां तु बाह्यानां हेतवो नान्तराः कचित्‌ । 
अतः सविषयत्वं नो सहमाना इमे स्फुटम्‌ ॥ ३४३ 
5 रत्यादय इव खीयवलनेन खकागम्‌ । 
प्रयलायं 'विरुध्याथो रलयादि समनन्तरम्‌ ॥ ३४४ 
उद्भूतास्त इव ग्राह्यगुणशन्यतयाच्र तु । . 
उच्यन्ते सात्त्विका भ्रान्तचित्तघरत्तिविरोषिकाः॥ ३४५ 
वाद्यवस्तुविरोषाभिखुख्यापेक्लाविनाकरतम्‌ । 
19 रत्यादिरूपसापेश्षमन्तःकरणसुच्यते ॥ ३४ 
रद्ध सत्‌ तन्मते सत्त्वं केषाश्चन मते पुनः । 
बीजस्थानीयमव्यक्तरूपं सत्त्वसुदीरितम्‌ ॥ ३४७ 


मनसा सहितं "चास्य तत्त्वमेव कचिन्मते । 
सत्त्वराब्दाभिधेया(य)यतस्थानं तत्‌ सात्विकं मतम्‌ ॥ ३४८ 
15 वाद्यार्थविषयक्रोधादिकानां परिणामतः । 





तदीयपरिपाकस्य परिपोषखरूपतः ॥ ३४९ 
स्तम्भादि कारयन्ति ये रतिक्रोधादयो यतः । 
उद्धासन्ते सविषया अतस्तद्रथतिरेकिणः ॥ ३५० 
ग्लान्यालस्यञ्चमाद्याख (स्तु) विषया भावतो यदि । 

% . . यथा ये बाद्यहेतुकाः सन्तो वैवर्ण्येनोपलक्षिताः ॥ ३५१ 
सात्त्विकान्तःपातित्वेन गणिताः पूर्वसूरिभिः । 
अस्रादयो बाद्यधूमङीतादिकनिमित्तकाः ॥ ३५२ 
व्यजनग्रहणायेनाभिनयेनोपरुक्षिताः । 
असात्त्विकेऽपि तन्मध्ये गणिता भवभूतिना ॥ ३५३ 

% कथ वा रतिनिर्वेदादिकमच्राभिनीयते। | 
नटेन निरपेक्षेण मानसब्याप्तेरिह ॥ ३५४ 
इत्यादिकं तथा स्तम्भादिकं तस्मात्सभ मतम्‌ । 
नैवं ख भोजनादौ तु जनो व्यग्रमना अपि ॥ ` ३५५ 
सकृन्मनः प्रयुञ्यापि कुर्वन्‌ क । = 

ॐ दयतेऽन्यमना नैव स्तम्भादिजनने क्षमः ॥ ३५३ 


1.४ विरुध्यायो । 2 ५70 चास । 3 ` विरुध्यायो । 2 ५४० चास । 3 ४० नेव । 





साच्िकभावपरीक्षा ] नु० र० को०-उल्टास १, परीक्षण र्‌ ३९१ 


तस्मादनन्यमनसो जायन्ते ते न सात्विकाः । 
स्तम्भादीनां न चेवं स्यात्‌ समाधानं तु मानसम्‌ ॥ ३५७ 
हेतुः समानकालीनोऽष्टको' दयनिमित्ततः । 
तह्याष्पं जनयेयुये नटबुद्धयवसायकाः ॥ ३५८ 
ते स्युनैटगतानां तु बाद्यवाष्पादिदहेतवः। ? 
एवं ते साच्िकाः सत्वेनाहताः संसदि स्फुटम्‌ ॥ ३५९. 
वाक्यगाथादिभिम्या नैवमवघटेतहि। ` 
एवं ते दभिनीयेरन्नट टा) ने्जलादिभिः ॥ ३६० 
नैवं नटानामन्योन्यं प्रसिद्धा एव तेन तत्‌ 
यतोऽस्यैवं प्रसिद्धाभिधानेऽस्य कचित्‌ तत्कृतः ॥ ३६१ 10 
शिष्यानोपयिका तत्र कि फलं वद तत्त्ववित्‌ । 
नैवं तथाविधे बुद्धधवसायेऽष्टकस्य तु ॥ ३१२ 
मानसैकाग्यहेतत्वे यौगपद्योदयाितः। 
बाद्यवाष्पाष्टकस्यास्य योग पव्यादयोऽपि च । 
तन्न साभग्रयन्तरं चेत्‌ किमवान्तरकल्पनेः ॥ ३६३ 12 
सुल्यमनुसरामि स्थानकं खीकरोमि 
स्फुरितमनु भवामि स्थायिरूपं सलीलम्‌ । 
परमिह रचयामि प्रीतिदं च कान्ताम्‌ ¦ 
शुवसुपरि नयाम्युःफुलविर्फारतारम्‌ ॥ ३६४ 
हत्यादयोऽध्यवसाया गण्या नटगता न हि । 20 
अन्त भोवो न सर्वेषासुक्तेष्वेवावकल्पते ॥ ३६५ 
न चातिव्यग्रमनसा तारकाया विलोलनम्‌ । 
राक्यक्रियां(१ यं) न वा योग्याभ्यासरिक्षात्र कारणम्‌ ॥३६६ 
स्तम्भादावपि सा त॒ल्ययोगक्षेमाच्र दरयते । 


एकाग्रयबुद्धथवसायश्ान्ये नाव्य नटेन च ॥ ` ३६.७5 
किञिदष्यधुना कलतौमश्ाक्यं विद्यते कचित्‌ । 

नटस्याध्यवसायानां छोकिकेनानकारिणा ॥ ` ३६८ 
निर्वेदादि भाववभगणने कि फलं वद । 

बाद्योऽपि दरयते स्तम्मो भयहषादिकैरपि ॥ ३६९ 
उ्यजनग्रहणाचापि खेदाभिनयने कचित्‌ । 30 
मन्वसन्त्वे नटेऽक्षोदि तापात्‌ खेदः प्रतीयते ॥ ३७० 











20 


30 


` तामसत्वान्न नैर्मल्यसाधुतोपचितः परम्‌ ॥ 





नरं २० को०-उल्छंस १, परीश्चषण ९ [ सात्िकभावपरीश्चौ 


नेतदरिद्रगरहिणीविवाहोत्सवतुल्यताम्‌ । 
अवरयकरणीयत्वादारोहतीति भवद्रचः ॥ 
नैवमेवविधस्यापि नटना नोपपद्यते । 
तदान्यपाच्रमध्ये किं क्रियते व्यजनाग्रहः ॥ 
केनचित््वथवा काथः खयं सामाजिकेन किम्‌ । 
अन्येषु सात्त्विकेष्वेवमेव दूषणकट्पना ॥ 

तेषां महानुभावानां साच्िकानां हृदः स्फुटम्‌ । 
कलदृषीकरणाज्नातः शाङ्कशाङ्कासमागतः ॥ 
विङीर्णफटदानोक्तफलः फलतु कि फलः । 
सत्वाख्येन परयन्नेनाभिनीयन्ते तु तेऽत्रते॥ 


भावाः स्युः सात्त्विकास्तस्मात्‌ किं तथायेतथानदहि। 


बाष्पगद्भद मुख्याः स्युस्तथा `खेदोद्धमादयः ॥ 
प्रयत्ने नाभिनिर्वत््यं हेतुश्चेत्‌ सात्त्विके भवेत्‌ । 
तत्पुप्रयलनिर्वत्यपद्मकोरादिभि भवेत्‌ ॥ 
व्षधारादिकेतेऽभिनेये सात्त्विकता न किम्‌ । 
अथ चेद्रथतिरेकस्ते तेभ्यस्तषामिमे यथा ॥ 
रत्यादयधित्तवृत्तिनिर्वेदात्‌ पूर्वमेव तु । 
निर्वेदनं "पकुर्वन्ति ततः प्राणमधान्तरम्‌ ॥ 
तन्मां सछछीविश्वरूपाभ्यां सत्वं कल्टरषयत्यपि । ` 
अन्तःकरणसत्वस्य वायुराश्चयतां गतः ॥ 
क्रोधाद्या अपि ददयन्ते विकाराः पाणसंभवाः । 
प्राणसुच्रपरिप्ोते संविदभ्यासचिचिते ॥ 
विकारो जायते देहे तच्च चित्परतल्ययेन च । 


` रल्यादिरपरसरणसखःभावः पाण भूमिकाम्‌ ॥ 


अनधिष्टाय सहसाऽस्तमेति स यदा पुनः । 


` परामशाीद्टुक्षणीयामवधान धुरं बजेत्‌ ॥ 


तदा स प्रसरत्येव पाणभरूमो तथाविधः । 


सत्वमित्युच्यते सांख्यप्रसिद्धं सत्त्वमित्युत । 


न तस्य पाणदेहे च विकारः संभवेत्‌ कचित्‌॥ ` ` 
1 486 खेद्‌ । 2 + बिक? । न 3४ ¡ 


३७१ 


३.५२ 


 - ३७३ 


३.१४ 


३.५.५9 


२८० 


5; 2 ३८१ 
, ३८२ 
` ३८३ 


4 ३८४ 


३८८५ 





नरृ० र० को०-उल्ास ४ परीक्षण 4 


धूमविधूसरवदनपरकरृतिविजिह्यख भावस्य । 
नैते लोके दृष्टाः कचिदपि स्वे विकारास्तु ॥ 
तथा च राहुलः 
सतत्वं रजस्तम हति परथिता गुणा ये 

चित्तं तदात्मकभिहोपदिशरान्ति सन्तः । 
सत््वोत्कटं मनसि ये प्रभवन्ति भावा- 

स्ते सात्त्विका निगदिता सुनिभिः पुराणैः ॥ 
इति- 
लाघवे च प्रकाडो च तारतम्यस्य सं भवात्‌ । 
दृष्टः क्रोध भयादौ च तथा सत्वस्य संभवः ॥ 
तत्प्राणभूम्यां प्रखतपाणसंबेदव्रत्तयः। 
देहेनैव तावदमी संवित्खीकारवर्जिताः ॥ 
बाद्यार्यजडरूपेण भोतिकेन तथा पुनः । 
इन्द्रजालादिविदादवि भावेन तथैव च ॥ 
र्यादिकेनातिचव्येमाणगोचरतां गतैः । 
अनु भावेगम्यमाना भजन्ते भावराब्दताम्‌ ॥ 
ते च सत्वे प्राणमये भवत्वात्‌ सात्विका मताः । 
ते सत्वेन चित्तव्रत्ते(त्तौ) चव्य॑माणा विधानतः ॥ 
निच्रेत्ता इति विज्ञेयाः साच्िकास्तयथोच्यते । 
मनःप्रभवतो वस्तु सत्त्वं प्राणात्मकं मतम्‌ ॥ 
सीदत्यस्मिन्‌ मनः सत््वोत्कषोत्‌ साधुत्वतोऽपि च । 
केचित्‌ सत्त्वेन संजल्पसख भावां राब्द भावनाम्‌ ॥ 
आहुः सृक्ष्मवासनादिखरूपेण उयवस्थिताम्‌ । 
तथा चिरतराभ्यास भावनाया विकल्पतः ॥ 
संजल्पतोद्धिन्व्त्तः सनाश्नो मनसोः्वः। 
यस्मिन्‌ तत्‌ सत््वमित्युक्तं नज किं केवलो ठे) भवेत्‌ ॥ 
प्राण भूते सत््वरूपे तच्र को हेतुरुच्यते । 
तस्मात्‌ सत्वाद्वेतुभूतादाहितं यत्समन्ततः ॥ 
मनः संवेदन तस्य संबन्धान्मनसोऽपि च । 
समाधानाच रत्यादि विषयस्य तु ### ॥ 


1 8५ 410) बा । 2 45८ डुक्ष्म । 3 ४५ मनसं । 
“^ च रन॒° 


२८द 


म 


३९ 
३९५ 
2 
३९६ 
२३९७ 


३ ९८ 30 








| 
। 
। 








३४ 


185 


20 


2 


30 


1 80 कि । 2 ^86 निख्िताम्‌। 3 +8५ थबहि । 


न° र० को०-उद्टासं १, परीक्षण १ 


चव्यमाणादिरूपेणोत्पय्यते पकरतित्वतः । 
स्तम्भाधरान्तैरः पूर्वमभिन्नक्रमरूपधूक्‌ ॥ 
एवसुक्तात्‌ िःप्रकारात्‌ सच्वादुत्पाद्यतेऽच्र यः । 
स सात्विक इति ख्यात इति चेदुच्यते त्वया ॥ 
तर््यव रतिनिर्वेदप्रसुखा अपि सात्त्विकाः । 
स्थानभेदोपसंक्रान्तावस्थान्तरयुजो न किम्‌ ॥ 
एवमेकोनपश्चाराल्लाता भावास्तु सात्त्विकाः । 
अत्राहुः केचिदाचायौः स्थायिषु व्यभिचारिणः ॥ 
पथवस्यन्ति तेषां च रूपं परसरणाह हिः । 
अन्तोष्टारेचन()स्तम्मादिके दुर्योजमेव तत्‌ ॥ 
तथा देते प्रोततया धराद्यं भूतपञ्चकम्‌ । 
प्रपश्चयति प्राणोऽथ खतच्रश्चेष्टतेऽपि च ॥ 
तच्रावलम्बते प्राण धराय भूतपश्चकम्‌ । 

प्राणो यां यां चित्त्रत्ति कुरुते खात्मनि *भिताम्‌ ॥ 
संपादयति तां तां स स्तम्भमखेदादि भावताम्‌ । 
तथा द्यत्र कोधभयहषदिविहिता अमी ॥ 
देहक्रिथाप्रयन्नेच्छादय एकखरूपिणः । 
चित्तघ्रत्तिस्तम्भमाच्राकारा स्युव्येभिचारिणः ॥ 
अमीभिरेव स्तम्मावैनाय्ये संगृद्य वर्णिताः । 
यथोद्रेगा वैमनस्यं बाद्यवैवण्यहेतुके ॥ 

तस्मात्‌ सर्वचित्त्त्तिकलापोऽष्टक एव यत्‌ । 
अन्तभूतः स चैवात्रानुभावेष्वत एव सः ॥ 
तदुक्तौ संग्रहीत; स्यादन्यत्राप्येवसूद्यताम्‌ । 
जिद्यभागप्रधाने तु प्राणे संक्रान्त उच्यते ॥ 
चित्तव्त्तिगणो बाद्यस्तेज सस्तु तथा पुनः । 


` क्रोध इत्युच्यते तीब्ातीबत्वेनोपरक्लितः ॥ 


आकारास्यानग्रहे तु परल्यः परिकीतिंतः । 
(४ खेदवारी केचन 

न तत्पूवं ततः पञ्चात्‌ ति केचन ॥ 

तामवस्थां परिपरास्तोऽधावंहित्थादि भावक १ 

बहिर्विकारपयेन्तपा्तोऽच्र परिदृङयते ॥ 


 ----- -- ----- 


[ साचिकभावपरीक्षा 


०० 
४०१ 
2०२ 
2०३३ 
ठन 
2०५ 
ॐ०चै 
४०७ 
यै०८ 
४०९ 
१० 
४११ 
४१२ 


४१२ 


[तो 








साच्विकभावपरीक्चा ] ० र० को०~उल्टास ९, परीक्षण १ ३५ 
तदच्रान्तर्मनोरूपत्वाख्याभावाच बाद्यतः । 
मोतिकाख्यविकारान्ता चेतोच््तिरिह रफुटा ॥ देश्ये 
प्राणभ्रूमौ तु विश्रान्ता दिता स्थुलददिना। 
अत्रा्टत्वं स्थूलदरा वस्तुतोऽनन्तता मता ॥ ४१५ 
र(अ)व्युचलतया श्वासोच्छरासरूपतयान्यकः । ¢ 
करोधोऽन्तरा सखुदितो बाद्योऽन्यः खेदहेतुकः ॥ ४१६ 
आनन्दोऽप्येवमेवेष्टः रोकजे तु गलग्रहे । 
अन्योन्य एव तेनाष्टाविति स्थूलदरां दरा ॥ ४१७ 
देहात्ममानिनां तेन नीचानां स्षटिति स्फुरन्‌ । 
उत्तमानां तु देहादिव्यतिरिक्तात्ममानिनाम्‌ ॥ ४१८ 10 
विवेकरालिनां' चान्त वहिरेरयते कचित्‌ । 
योगिनां * सर्वथा नेति तैययेवोपदिदयते । ४१९ 
अतो भूतान हााष्टधा प्राणाप्यनुम्रहात्‌ । 

स मनोल्वलनाद्‌ "ध्यानाद्‌ रोमहर्षः परजायते ॥ ४२० 
अयमर्थो मया यावदुपयोगं प्रददीत; । 18 
आगमस्यानुरोधेन खोकाभिपायवेदिना ॥ ४२१ 
नाव्याभिप्रायमाभिलय साच्िकत्वं निरूप्यते । 
अज्र प्रयलनिर्वत्यो; सात्तिका इति संमतम्‌ ॥ ४२२ 
रोमाश्चादि यथा बाद्यमान्तरं स्यात्तथा" नदैः । 
कतु न शाक्यते व्यन्नैः रि्चामाजोपजीविभिः ॥ ४२३ ‰0 
अलमेतेन चेन्नेवं रोकालक्रतिरूपकम्‌ । 
सात्त्विकं तद्भवा भावाः सात्विका आन्तरा मताः॥ ४२४ 
प्राणाययनुग्रहात्ते स्युरितराङ् तथेप्सिताः । 
नलु बाष्पादि यद्वाद्यं नाव्यमस्तु तदन्न किम्‌ ॥ 2२५ 
तेनान्तरालिकेन स्यात्‌ कृत्वे८लये)नेति तथा न हि । 28 
इदमत्र तु तात्पथे ये भावा नाव्यगामिनः ॥ रदे 
कुवन्ति सुखदुःखे ये तथा येऽभिनयन्ति ते । 

` बाद्यादयस्तु ते काया यथा नो राङ्कितास्तथा ॥ ४२७ 
वाद्यधूमादिहेतुत्था दुःखजैरान्तरारिकरैः । 
वाष्पादिभिस्तुल्यरूपा नार्व्ध॑घर्भिप्रयोजिताः ॥ ४२८0 


1 680 विश्राता । 2 40 सव्र; । 3 420 शालिनी । 4 ० योनिना । 5 ^50 
नात. । 6 ^80 त्तरा । 7 4५ अलनरेते च तेनैवं । 8 ^26 “भावा । 9 76 नामस्तु | 
10 4980 घर्म । ¦ ण 





२३६ 








12 





| । | । 30 
| 





च ° र० को ०-उद्ास १, परीक्षण र 


निर्णीयन्ते प्रक्षकेश्च सल्यत्वेनान्तरालि काः । 
रामादिकाभिनेयानां परतीतिप्रययस्य च ॥ 
विरोधित्वसमत्वाभ्यां श्रुतत्वेनोपरञ्जिताः । 
नटज्ञान विरोधेन चैवं रूपद्रुयस्य च ॥ 
अनसारेणाल्गाम्ये रूपं भातीति सांप्रतम्‌ । 
अच्र दुःखमदुःखेन खुखं चासुखितेन च ॥ 
नाभिनेतु क्लमं तस्मादितयाभिस्युतेन च । 
द्रष्टव्यावश्चुरोमाश्चाविति सात्त्विकनिर्णयः ॥ 
अच्र प्रयलनिर्वर्ये समाने भाववगेगे । 
अतिप्रसक्तिखुखेषु दोषरूपस्थितेषु च ॥ 
सात्त्विका आङ्खिकेष्वेव युज्यन्त इति सांप्रतम्‌ । 
"तस्मान्सुख्यावभिनयो वागङ्पर भवौ मतौ ॥ 
अर्थप्रतीत्युपायत्वाद्वाचिकोऽपि हि तद्धणः । 
सुख्यत्वमाङ्किकस्यैव यदारादुपकारकः ॥ 
वाचिकोऽपि भवेदर्थप्रतीतिद्रारतोऽस्य च । 

एवं नानासुनि ' मतोऽभिनयोऽचत्र विवेचितः ॥ 
चतुधा च चिधा द्वेषैकधा सलयेवमप्ययम्‌ । 
चतुर्विधो शुवो भवो लक्ष्यते लक्ष्मविन्सुदे ॥ 
राखाचत्ताङ्करो पाधि भेदात्तच्राद्धिक सिधा । 
वर्तनाः करयोः चाखास्तच्र वैचिच्यचिच्रिताः ॥ 
अङ्ोपाङ्चयेस्तन्न स्थानकेरुपवृहितैः । 
करणेरङ्हारिश्च “निव्र्तं उत्तसुच्यते ॥ 
अङ्करोऽप्यङ्व्यापारो द्िप्राघान्यमाभितः । 
भ्ूतवाक्यार्थबिषयधित्त्रत्यपेणक्षमः ॥'' 

स एव ` सुचीसंज्ञः स्याद्धाविवाक्यार्थसूचनात्‌ । 
आर भरी सात्वती च कैरिकीति तिखष्वपि ॥ 
रखाखा चैवाङ्करो “छत्तं वर्तन्तेऽ्र यथाक्रमात्‌ । 
देराकारवयोवस्थावेष भूषणराक्तितः ॥ 
भाव्यते तद्भतो मेदो मावकैरञ्जसा खतः । 
रसाभिव्यक्तिपयेन्तो वृत्ति त्रितयवाचिकम्‌ ॥ 


ग्वेणाक्चः । 11 480 सृचात्‌ । 12 ^80 चरुल्यं । 15 80 ठृतयवाचिकम्‌ । 


[ आङ्गिकच॒व्यकमः 


४२९ 
२० 
४३१ 
२२ 
४२२ 
रेष 


२२५ 


४२९ 


2२.७५ 
४३८ 
४३९ 
टटै० 
४४१ 
ठेर 


छर 


1 ^90 लिकः । 2 +20 दयुत्वत्वेः | 3 450 चुगाम्ये । 4 ^ न्मुखाव । 5 ^80 


| | मते । 6 ^ देधौकधा । 7 ८० कत्निध। । 8 ८ कयैस्तत्र । 9 5 निचुत्त । 10 80 





आश्गिकनृत्यक्रमः ] न° र० को०~उल्टास १, परीक्षण १ ३७ 


'संस्सरतो चलयाब्देनाङ्किकोऽप्यत्राभिधीयते । 

लक्षणां वृत्तिमाभिलय नास्यरा"ज्दोऽपि वर्तते ॥ देणणे 

छत्याभिधेऽङ्गाभिनये श्रोक्त पूर्वमिदं मया । 

चरतेः क्यपप्रल्यये नल्यराब्द; कर्मविवक्षया ॥ 2४५ 

भावोपसजेनो यत्र रसो सखुख्यः परकाराते । 5 

तन्नाय्यपूर्वकं छल मागेचरत्यं तदुच्यते ॥ चद 

रसोपसजेनी भूतो यच्र भावः पकाराते । 

मार्गो भावाभिधस्तस्मान्स्रृग्यतेऽच्र रसो यतः ॥ ठेदे9 

नाद्यमार्गोपाधिभिन्न द्विधा चलयसुदीरितम्‌ । 

चरतेः क्तप्रत्यये रूपं देरी चत्तमिहोदितम्‌ ॥ ४४८ 10 

नन्वच्न प्रलययैकार्थे मागेदेरीति का भिदा । 

उच्यतेऽत्र तदेक्येऽपि यो यज्र विनियुज्यते ॥ ४४९ 

विवक्षावरातो ब्रूते स तमर्थमिति स्थितम्‌ । 

पङ्जत्वे समानेऽपि रोके पद्य तदीरितम्‌ ॥ 2५० 

विवक्षा चाच्र शोभायां दस्त दस्तेकदेरावत्‌ । 15 

यये चयेकदेदोऽपि चलयराब्दाद्‌ द्रयोग्रंहः ॥ ७५१ 

नाख्यधर्म(? मी)लोकधमींयेवं रूपविरोषणात्‌ । 

इति कर्तव्यता तस्य द्विविधा परिकीर्तिता ॥ ४५२ 

नाद्य धर्मी द्विधा तच्र शुद्धां नाव्योपयो गिनीम्‌ । 

आभिलय कैरिकीघरत्ति करोलयावेशितादिभिः॥ ८५५३ % 

चतुभिः करणैः रोभां प्रथमा सा भवेदियम्‌ । 

अंरोनैवोपजीवन्ती “लोकमत्या प्रवत्तेते ॥ दे५ये 

चायोपविद्धया हस्तेनाधेचन्द्रेण यो भवेत्‌ । 

निःकादाने प्रयोगोऽ् न राख्रादेव गम्यते ॥ ८५८५ 

न लोकादेककादेव तच्राज्ञानादनादरात्‌ । प 

कि तु द्वितयसंसगादिदश्चाऽस्मिन्‌ प्रजायते ॥ ८५ 

लोकधमीं द्विधा ज्ञेया चित्त्रत्यपिकेकिका । 
 निर्वेदादेधित्तवृत्तेज्ञानदच्यादयो यथा ॥ ` ४५७ 

अन्या स्यादाद्यवस्तूनां निरूपणपरायणा । 

बाह्यस्य कमलदेस्तु पद्मकोदादयो यथा ॥ ४५८ 3 


नाद्यं मागे च दे्ीयसुत्तमं मध्यमं तथा । 





1 80 संखृतो । 2 49० शाब्दापि । 3 ^ प्रोक्त । 4 ^90 लोमकन्या । 














18 


30 





न° र० को० -उह्छास ९, परीक्षण ६ [ आङ्ञिकनरलयक्रमे रिरोमेदाः 


अधमं कमतो ज्ञेयं चलयच्रितयसुत्तमम्‌ । 
लास्यताण्डव भेदेन जयसमेतद्‌ द्विधा मतम्‌ ॥ 
लटलनाटखछितरङ्रचनोपचितैः छ मैः । 

प्रयोजैः सखुकुमारेयेत्‌ साधितं लास्यमत्र तत्‌ ॥ 
लासः ख्रीपुंसयो भावस्तच्रा्हीये तु तद्धिते । 
साधावस्ये¢ थ) लास्य राब्दः कामो छासनदेतुकः ॥ 
मद्रङ्हारकरणचारीचरणकोमलः । 

ताण्डवं तद्भबेव्यत्तु प्राधान्येन प्रवर्तितम्‌ ॥ 
विषमं विकटं टध्विलयन्न तद्विषं मतम्‌ । 
यदभ्यासवराद्रल्लभ्रमणादि प्रददर्यते ॥ 
बिरूपवेषावयवव्यापारं विकटं मतम्‌ । 
करणेरश्चिताययेत्‌ पयुक्तं तइ वेषु ॥ 

सङ्गीणं तद्धवे्रयं यदेतत्रयसङ्करात्‌ । 
सर्वेष्वभिनयेष्वत्र व्यापारिराङधिकेयतः ॥ 
उत्पद्यन्ते लयभेदाः सप्रपश्चा अनेकाः । ` 
अतः प्रयत्नतः सवान्‌ तानहं वच्मि तत्वतः ॥ 
अच्राङ्ञाभिनयः साक्षादङ्विज्ञानपूर्वकः । 
अतोऽङ्निचयं वश्ये विस्तरा्छश्ष्मपूर्वकम्‌ ॥ 
यद्यप्यत्र प्रधानत्वे चये चरणकर्मणः। 
चरणादेः प्रकथनं युज्यतेऽङ्निरूपणे ॥ 

तथापि रिरसोऽङ्गानां पाधान्यादधिकारतः। 
राखरस्यास्य मनुष्यस्य शिरःप्रश्चतिवर्णनम्‌ ॥ 
यतो मौटेस्तु मलुजा वण्याश्चर[ण]तः खुराः । 
इति शि्ाचारमरूलं मोलितोऽङ्निरूपणम्‌ ॥ 
एवं दि्ालुरोषेन यद्यप्यन्नोपवर्णितम्‌ । 
रिरःप्रभृतिकाङ्घानां लक्षणं संग्रहस्तथा ॥ 
तथापि चले चायोदौ' सुख्यत्वाचरणस्य च । 
तद्धे तुकत्वप्राधान्यादन्यस्य' चरणादितः ॥ 
तच्राङ्गानि रिरो हस्ती वक्षः पावै कटीतटम्‌ । 
पादाविति षड्क्तानि “भरताचायसंमते ॥ 

सम धुत च बिधुतमाधूतमवधूतकम्‌ । 
कभ्पिताकम्पितोर्क्षिप्ताधोगतानि च लोलितम्‌ ॥ 





1 ५9५ कामहा । 2 490 चायदि । 3 ^ नन्यस्यै । 4 + भरचा० । 


2५५९ 


टद० 


देष 
2.9 
४८ 
४९९ 
दै.५9० 
८.५१ 
2.9२ 


४.५३ 





आङ्गिकनरत्यक्रमे शिरोभेदाः | न° ₹० को०-उद्ासं १, परीक्षण र ३९ 


निहितं पराव्त्तं परिवाहितमशितम्‌ । 

एवं स्युः रिरसो मेदाः समाने च चतुरा ॥ ४७५ 

सम खभावाभिनये खभावावस्थितं मतम्‌ । 

"इदं पूजाजपध्यानसखामिसेवादिषु स्थतम्‌ ॥ 2७६ 
॥ इति समम्‌ ॥ १॥ हि, 


कमेण तियेगनमितं रानैसुक्तं धुतं शिरः 
प्रतिषेधेऽनीप्सिते च विषादे विस्मये तथा ॥ ५.५ 
छन्यतायामनाश्वासे पाश्वेदेरावलोकने । 
अत्रैवान्तगेतं ज्ञेयं रिरः पाश्वेविलोकितम्‌ ॥ ४५८ 
॥ इति धुतम्‌ ॥ २॥ 10 


धुतमेव भवेच्छीघश्रमणाद्विधुतं शिरः । 
इीतातं ज्वरिते भीते सव्यः पीतासवे भवेत्‌ ॥ ४५९ 
॥ इति विधुतम्‌ ॥ २ ॥ 


तिगृद्ध सन्रन्नीतमाधूतं कीर्तितं रिरः। 

गर्वेण सुजवीक्चायां पाश्वस्थस्योर्ध्ववीक्षणे ॥ ४८०1; 
राक्तोऽस्मीलयभिमाने च तथाङ्ीकारकर्मणि । 

इवो द्राहितं ज्ञेयमन्तभ्वतं विपथिता ॥ ४८१ 


॥ इत्याधूतम्‌ ॥ ४ ॥ 
नै 


अधस्तात्‌ सकरदानीतमवधरूतमिहोच्यते । 

स्थिलय्थं देरानिदेरो संज्ञालापनयोरपि । 20 

उपविष्टाल्पनिद्रायामाह्याने च प्रयुज्यते ॥ ४८२ 
॥ इत्यवधूतम्‌ ॥ ५॥ 


ऊध्वीधःकम्पनाच्छीघ बहुशः कम्पितं मतम्‌ । 

रोषे बितके विज्ञाने तजनेऽङ्गीकृतावपि ॥ ४८३ 

त्वरितप्र्रवाक्ये च राज्ञा कम्पितमीरितम्‌ । र 

विञ्वोकादिषु कान्तानासिदमाहर्मनीषिणः। 

 तियैरनतोन्नतं ज्ञेयमच्नान्तमोवमागतम्‌ ॥ ४८४ 
॥ इति कम्पितम्‌ ॥ ६ ॥ 


1 80 इद्‌ । 











कक 5 > इ य- ज 











न° ₹० को०-उल्टास ९, परीक्षण १ [ आङ्गिकन्रत्यक्रमे शिरोभेदाः 


द्विःपयुक्तं कम्पितं स्यात्‌ रानैराकम्पितं रिरः । 
पुरस्थवस्तुनिर्देडाचित्तस्थार्थप्रकाराने । 
संज्ञायासुपदेरो च पश्च चावाहने तथा ॥ 

॥ इत्याकम्पितम्‌ ॥ ७ ॥ 


ऊध्वौभिखुखसुत्क्षिधं मस्तकं विनियुज्यते । 
दरौनेऽनुगवस्तुनां चन्द्रादिव्योमचारिणाम्‌ । 
दिव्याख्ाणां प्रथोगे च विचारेऽर्थस्य वेष्यते । 
इदमेवाल्पसुल्क्षिप्रसुद्राहित'मितीतरे ॥ 

॥ इत्युत्छ्षिप्तम्‌ ॥ ८ ॥ 


अधोगतं स्यादन्वथं दुःखे लल्नाप्रणामयोः* ॥ 

॥ इति अधोगतम्‌ ॥ ९ ॥ 
लोलितं मन्दमन्दं स्यात्‌ सर्वदिश्चु बिलोलनात्‌ । 
निद्रागदग्रहावेशामदमूच्छोखु तन्मतम्‌ ॥ 

॥ इति रोलितम्‌ ॥ १० ॥ 


उरिक्चप्रांसं किञ्चिदिव तिथग्ग्रीवं निहञ्चितम्‌ । 
एतद्धिखासे विञ्बोके ललिते किकिञ्िते ॥ 
माने मोट्ायिते गर्वे स्तम्भे कुटमिते स्थिते । 
विलासो ललिता चेटा विरिषागमनादिका ॥ 
विञ्वोको वाज्छितार्थस्य खामे गवोदनादरः। 
अङ्गानां सौकुमायै यद्छलितं तदुदाहृतम्‌ ॥ 
हर्षक्रोधाभिलाषादेः सां क्ये किलकिञितम्‌ । 
मानः प्रणयजो रोषः परिये तज्ज्ैरुदाहृतः ॥ 
कान्तस्तुतिकथालापलीलाहेलादि दीने । 
तद्भाव भावनं ख्रीणाखुक्त मोदायितं स्फुटम्‌ ॥ 
अहं भावः स्मरतो गर्वः ख्रीणामभ्यासमागमे । 
स्तम्भः पराद्छुखी भावः प्रियेऽनुनयतत्परे ॥ 
सौख्यानु भावेऽप्यधरस्तनकेराग्रहादिषु । 


बाह्यो दुःखानु भावो यः सोऽत्र कुटमितं मतः ॥ 





८५ 


८9 


144 


४८९ 


४९० 
४९१ 
४९२ 
९३ 
४९ 
2९५ 


४९ 


1 ^80 पञ्च । 2 +80 वाहिता? । 8 ^80 अधोमतं । 4 ^ प्रमाणयोः । 
५. शप्रणामयोः सं. र. अ. ७ "छो. ७३। । + ध । 


हि 
र १ 
[वः ९ कतक 





आङ्किकनरत्यक्रमे रिरोमेदाः ] भर० २० को०~उट्टास ९, परीक्षण ए ७१ 


 खभावावस्थितं खीणां स्थितसुक्तं मनीषिभिः। 


अनेनैवोक्तपूव तु शिरस्तियेग्नतोन्नतम्‌ ॥ ४९७ 
, ॥ इति निहितम्‌ ॥ १९१ ॥ 


पराघ्रत्तं तु तच्छीष प्रयक्तसरखं तु तत्‌ । 
पराच्रत्तालुकरणे पृष्ठतः प्रक्चषणेऽपि च । ¢ 


लल्ञादिजनिते काये 'सुखापसरणेऽपि च ॥ ४९८ 
॥ इति परावृत्तम्‌ ॥ १२॥ 
नैः 


मस्तकं मण्डलाकारभ्रामितं परिवाहितम्‌ । 

स्कन्धौ किञ्चिदिवाश्छिष्यदेतदाराचिकं मतम्‌ ॥ ४९९ 
हर्षेऽनुमोदने रोधे विचारे विस्मये स्मिते) | र 
 लल्ञाकरते तथा मौने प्रियाजकरणेऽपि च । 


कार्यमाहरिदं तज्ज्ञाः पराभिप्रायवेदने ॥ ५०० 
॥ इति परिवाहितम्‌ ॥ १२ ॥ 


पाश्व॑तो विनतग्रीवं किञ्चिदश्चितसुच्यते । 
व्याधौ मोहे च मूच्छायां चिन्तायां मदनिद्रयोः। 15 
स्कन्धानतमिहेव स्यादन्त भृतं दिरोऽन्तरम्‌॥ ` ५०१ 
॥ इत्यञ्चितम्‌ ॥ १४॥ 
॥ इति चतदेराविधं हिरः ॥ 


[ अथ वेणीधम्मिष्टः । ] 


` वेणीकरूतास्तथा सक्ता बद्धाः" स्तन्धकचा मताः । % 
मोटको जूटको बीरग्रन्धिद्धंछलकस्तथा ॥ ५०२ 
„  नारिगी चैव धम्मिह्धः]्न्तलः संनिच्॒न्तकः 
यावग्रन्थिः कुराग्रन्धित्रेद्य्मन्थिश्च ुम्फितः। 
मूलग्रन्थिस्तथा मध्यप्रान्तय्रन्थिस्तथेव च ॥ ५०२३ . 
इत्यायनेकरचाश्चैव ज्ञातव्याः संयताः कचाः भ 
: .छुटिलो लम्बितस्तद्रदलुर्वक्रस्तथाग्रगः 
हिरोमध्यगतः कर्णोपरिगः सं गोऽसं )यतो भवेत्‌ ॥ ५० 
| ॥ इति बेणीधभ्मिरः परिपूणैः ॥ | 
॥ इति आङ्गिकनरत्यक्रमः ॥ २॥ 
। [न भ ०्पिर । 2 450 बद्धा । 3 ५४० श्रन्थिः । 4 ५४५ यावम्रन्थी-कुराग्रन्थी । 
न° २० 

















18 


|| 20 


+ 10 


2 


„ 1 ^ “थंचाः;४धा। 


० र० को० -उद्ास १, परीक्षण १ 


अनेकार्थषु राब्देषु संयोगादेयथार्थता । 
'आद्धिकाभिनयेष्वेव प्रयोगादर्थताः तथा । 


सोऽपि प्रयोगो रभते खोकात्‌ “खरासख्रतोऽपि च ॥ 


निश्चेतव्यास्ततश्चैते लोकराखानु सारतः । 
पताकच्िपताकञ्चाधचन्द्रः कर्तरीखुखः । 
अराटलसुष्टिरिखरकपित्थखटर्कासुखा‡ ॥ 
शुकतुण्डश्च काङलपद्यकोरोऽलपटह्टवः । 
खचीखुखः सपेदिराश्चतुरो खगङ्ीरषकः ॥ 
हंसास्यो हंसपक्चश्च भ्रमरो सुकुलस्तथा । 
ऊर्णनाभश्च संदंरास्तात्रचूडः करः परः ॥ 
चतुर्विंरातिरिव्येते दस्तकाः स्युरसंयुताः । 
अभिनेयपरत्वेन कवित्‌ स्युः संयुता अपि ॥ 
उपधानः सिहसुखः कदम्बश्च निकुश्कः । 
एतैः संमिलिता भूत्वा स्युर्ाविं रातिश्च ते ॥ 
अञ्जलिश्च कपोतश्च ककेराः खस्तिकस्तथा । 
खेडका "वधेमानाख्य उत्सङ्ञो निषधस्तथा ॥ 
दोलः पुष्पपुटश्चैव तथा मकर संज्ञकः । 
गजदन्तो बहित्थश्च वधेमानस्तयथैव च । 
त्रयोदददौते विज्ञेया संयुता दस्तका बुधः ॥ 
योगप्रदालिङ्गनाख्यौ करौ द्िशिखरस्तथा । 
कलापकः किरीट चकषश्चाथ टेपनः ॥ 
सेते हस्तका सन्ति बृहदेदीविदां मते । 
अश्ाचत्वारिदादेते भवन्यभिनये कराः ॥ 
चतुरस्रावथोद्रत्तावन्यो तलसुखाभिधौ । 
खस्तिकौ विप्रकीणोख्यावरालखटकासुखीौ ॥ 
आविद्ध वक्रौ सूच्यास्यौ रेचितावधेरेचितौ । 


तथार्थ८ धे)चतुरस्राख्यौ 'हस्तावुत्तानवशितौ ॥ 


नितम्बौ पटुवाख्यौ च केदावन्धाभिधौ करौ । 
लताख्यौ करहस्तौ च पक्चवश्चितकाभिधो ॥ 





2 ^+ आगिकामि०; ४० आगिभिः । 
4.4.90. संशा । 5 20 मुखा । 6 >० वद्धमानाख्या । 7 ^४0 वक्त्रो । 5 420 हत्वा । 


[ दस्तसैख्याः ` 


५०५ 


५० 
५०७७ 
५९०८ 
५०९ 
५१० 


५११ 


3 ^80 शघास्त्‌* । 








| | पताकः ] चर ° र० को०-उलास › परीक्षण १ 


पक्षप्रयोतकौ दण्डपक्षौ गरुडपक्चकौ । 
ऊर््वमण्डलिनौ हस्तौ पान्वेमण्डलिनौ तथा ॥ 
उरोमण्डलिनौ वि | 
खु्िकखस्तिकावन्यौ नलिनीपद्मकोराकौ ॥ 
अलपद्यानुल्वणौ च वलितौ ललितौ तथा । 
वरदा भयदौ चेति द्वार्िराच्त्यहस्तकाः ॥ 
लताख्यो यौ करौ तौ तु दलयाभिनयगोचरौ । 
संप्रदायादुक्तिबलाह्ोकाचाच्र विरोषधीः ॥ 
क्रमादङीतिरेव स्युः सर्वे संभूय दस्तकाः । 


कुचिताङ्ग्टको यत्र तजेनीमूलमाितः ॥ 
ऋश्िष्टाङ्गलिर्ञंयः पताकस्तालतः समः । 
राज्ञां प्रतापाभिनये प्रशांसागर्वयोरपि ॥ 
प्ररणायां प्रहारे च प्रोञ्छने प्रतिचेधने । 

प्रधाने गोप्यार्थे पुष्करादेश् वादने ॥ 
आदा याचने छक्ष्णमर्दने तालिकादिके । 
स्परे वि भजने वस्तुनिर्दैदोऽयं प्रयुज्यते ॥ 
्वालादयृद्भिनयने स्यादूर््वपरचलाङ्लिः। 
तथाविधोऽधोगच्छन्‌ स्यात्‌ धाराद्यभिनये करः ॥ 
ऊध्वं गच्छन्‌ जु स्सतेषु पक्षिपक्षे कटिख्थितः। 
सरदङ्गादिप्रहारेषु स्यादधो वदतः करः ॥ 
सुखप्रदेरामागच्छन्‌ नाभिदेराः खपार््वतः । 
पाषाणादिस्थूलवस्तुम्रहणे तादराः स च ॥ 
उत्पाटनेऽन्योन्यसुखं पताकाट्धितयं भवेत्‌ । 
सरःपल्वलनि्देरो खस्तिकी भूय विच्युतम्‌ ॥ 
काये पताकाद्भितयं विश्छिष्य खस्तिकीक्रतम्‌ । 
क्षालनेऽन्यमधिष्ठाय रौरं घर्षन्‌ भवेत्‌ करः ॥ 
तथाविधः रानैधर्षन्‌ मर्दैने मार्जनेऽपि च । 
खस्मिन्‌ पाश्वे कंपमानः प्रतिवेये भवेदसौ ॥ 
वायूर्मिवेगेऽधो *गच्छचजुचरित्रचलाङ्गलिः । 
अन्येष्वभिनयेष्वेतं राजराजो पदेरातः । 


. लोके युक्तिमवेश्ष्याच्र पताकं "योजयेद्रुधः ॥ 


॥ इति पताकः ॥ १ ॥ 
ध. 


५३९ 


3 


५३२ 


1 ^80 श्ृदाङ्गादि । 2 0 गच्छन्‌ च्यु । 8 480 च्न्रिपर० । 4 80 परताकयो । 








न्न ° र० को० उल्ास ९, परीक्षण १ 


एतस्यैव यदा वक्रानामिका करियते तदा । ` 
चरिपताकं 'विजानीयादभिनेयमथोच्यते । 


[ ज्रिपताकादयः 


॥ 
| एष दध्यादिमङ्गस्यद्रगयरपशंदिषु स्तः ॥ ५३३ 
| | कुश्चितोध्वोङ्गखिद्रन्द्रः स्यादाह्ाने पराड्ुखः । 
| 8 ` अधस्तलो बहिः क्िघ्ाङ्कलिद्धनद्स्त्वनादरे ॥ ५३४ 
|| प्रणामे मस्तकगतः कर्तव्यः पाश्वेतस्तलः । 
|| अश्ुपरमाजेने च स्यादधोगच्छदनामिकः ॥ ` ५३५ 
| ॥ आहानेऽङ्कलियुग्मस्य कुश्ने स्यादवाञ्छखः । 
|  उत्तानाङ्गलियुग्मस्तु वदनोन्नमने भवेत्‌ ॥ ५३६ 
|| 10 संदाये कमतोऽङ्गल्यो कर्तव्येऽस्मिन्नतोन्नते । 
| अधोखखो' भ्रमन्‌ रीषे्ान्त उष्णीषधारणे ॥ ५३७ 
|| तादो मस्तकादृध्वे कार्यो सुकुटधारणे । 
||| तिलके स्याद्भूबोमध्यादूर््वगामी ललाटगः ॥ ५३८ 
।॥ अल्कस्यापनयने त्वलिकलकसंभितः। 
| 1 15 विकते गधवाक्‌राब्दे नासास्यश्रोच्ररोधनम्‌ ॥ ५३९, 
|| कमात्‌ कुव्नङ्गलीभ्यां विद्व द्वि्विनियुज्यते । 
|| छुद्र पक्षिषु च स्रोतस्यल्पे तुच्छेऽनिेऽपि च ॥ ५४० 
|॥ कमादूरध्वमधस्तियंक्षटिक्षे्रगतः करः । 
|॥ अधोखुखचलाङ्गल्यो दधदेषः प्रयुज्यते ॥ ५.४१ 
4 % अस्रे संमाजने नेचरक्षे्रगां बजती'मधः । 
|¢ अनामिकां'दधत्‌ कार्यो लोकाच्छेषेऽभिनीयते ॥ ५४२ 
॥ इति जिपताकः ॥ २॥ 
| अङ्कल्यो वितताः शिष्टा एकतोऽन्यत्न चापवत्‌ । 
|| अङ्गुष्ठः क्रियते यस्य सोऽधेचन्द्रः स्तो बुधैः ॥ ५४३ 
| पराञ्खः स्यात्‌ खेदे तु बलान्निःकारानादिषु ॥ ५४४ 


पराद्मखोऽग्रतो गच्छन्‌ रोकयुक्तिमवेक्ष्य च । 














| ॥ 1 ^ विविजाः। 2 ० मुखोमुखोश्रः। 3 ०५ शीरषप्रात । 4 ५४७० मध्यो दू । 
| ॥ 5 ४0 चतस्नोत° । 6 7० चरङ्गल्यो । 7 ^४५ खमार्जने । 8 5० धमः । 9 9० कां दृत्‌। 
| 10 80. तार } < 


| 
| 
| करिक्षे्रगतौ स्यातां ` रस? श)नायामधोखुौ ॥ ५४९ 
। 








कतैशीसुखादयः ] न° र० को० -उलास १, परीक्षण २ 


मध्योपम्ये८ स्ये) तथा शिष्टौ तिय 'गन्योन्यसन्सुखौ । 
कर्णक्षे्रगतः काथः कणौ भरणधारणे ॥ 
असंयुतोर््वगामिभ्यासुच्च्रताभ्यां खपाश्वेतः । 

 अर्धचन्द्रकराभ्यां' चाभिनयो (? नेयो ) बालपादपः ॥ 
राङ्कस्याभिनयो ज्ञेयो सुखक्षेच्रगते द्ये । 

. + . पुरतः कलसे स्यातां करावन्योन्यसन्सुर्वौ । 

कटके मण्डलान्रत्या मणिवन्धप्रदेरागः ॥ 

| ॥ इत्यर्धचन्द्रः ॥ २ ॥ 


अनाशि्टा मध्यमाया; पृष्टे स्यात्तजेनी यदा । 
न्निपताकस्य विज्ञेयस्तदासौ कर्तरीखुखः ॥ 
 अलक्तकादिना पाद्रञ्जने स्यादधोमुखः । 
तद्भदेवाग्रतः कार्यो बुधैमौगेपरदरोने ॥ 
, नासिकाष्षेचरतः काये; कणान्तिकसुपाभितः । 
दने दीर्षगावेतौ राङ्गाभिनयने मतौ ॥ 

, . वितर्कितेऽपराधे च पतने “मरणे तथा । 
्े्तन्योऽधोखुखो उयस्ततजेनिश्चलवङ्गलिः ॥ 
उन्तानाङ्कलिरम्रस्थस्तद्रत्‌ स्या्धेख्यवाचने । 
दवितरिवोयं प्रयोज्यं “स्यादिति तद्रेदितां मतम्‌ ॥ 

| ॥ इति कर्तरीमुखः ॥ ४ ॥ 





. 
* च 
कै 
1 
। 
। 
५ 
चै 
4 
1 
1 
षि - 
ध 
ह ज 
र 
# 
1 


अङ्ख्टः कुञ्चितो यत्र तजेनीचापवन्नता । 
आकुञिताः पूर्वपूर्वपाभ्वेगा मध्यमादिकाः ॥ 
भवन्ति यच्र विज्ञेयस्तच्रारालकरो वुधैः । 
हृदयस्षेच्रगोऽयं स्यादारी वौदादिकर्मणि । 
खेदापनयने भालक्षेत्रात्काये' त्वधोसुखः ॥ 
असंबद्धपलापे स्याह हिः क्षिप्राङ्गलिस्त्वयम्‌ । 
आद्धकमदिके तज्ज्ञः प्रयोञ्योऽय बहिसखः' ॥ 
 पतदङ्खलिराह्याने जनसंघे तथा व्रजन्‌ । 
प्रदक्षिणे देवतानां भ्रमन्‌ स स्यात्‌ प्रदक्षिणम्‌ ॥ 
अङ्गल्यग्रः खस्तिकः स्याद्विवाहे द्रयसंगमात्‌ । 
वलोत्साहधुतिस्यैयेगर्वगार् भीय सूचने ॥ 








५.9 


५५८ 30 


+ +1.1 480 तिर्यग॑न्यो । 2 90 करभ्यां । 8 6 मुष । 4 0 मरणे मरणे तथा । 


$ 80 शज्यस्या । 6 ^80 त्कायेत्व° । 7 ^ बहिमुखः । 




















(91 


10 


‰0 


25 


-14: 


चर ° र० को०- उल्लास १, परीक्चषण १ 


नाभिक्षेचरादृरध्वगामी स्यादयं मस्तकावधिः' । 
वीप्सया मण्डलाव्रत््या 'यथौचिव्यादयं भवेत्‌ ॥ 
कामिनीनां केराबन्धे तथा तेषां विकीर्णनि । 
परस्परमसंबध भाषणेऽयं प्रयुज्यते ॥ 

पुनः पुनबहिः क्षिपाङ्गलियुक्तिखुपाभितः । 
त्रिपाताकोदिते कर्मण्यखिलेऽयं प्रयुज्यते ॥ 


त्रिपताकेऽप्यरालोक्तं खीणां पुंसां न युज्यते । ` 


इति व्यवस्थया केचिदाचायोः संप्रचक्षते ॥ 


॥ इत्यराखः ॥ ५ ॥ 
नैः 


तलमध्याग्रसंलम्रा अङ्खल्यः श्छिष्टसंघयः । ` 

अङ्गो मध्यमाप्र्टसंलम्रो सुष्टिहस्तकः ॥ 

मह्ययुद्धे खड्धकुन्तनिखिरादिय्रहे' तथा । 

संवाहने दोहने चाग्रगाङ्ग्टञ्च धावने ॥ 

प्रकोष्टग्रहणे चापि रसनिष्कर्षणे तथा । 

रसवद्‌ द्रन्यतो लोके युक्तितः स्यात्‌ करद्रये ॥ 
॥ इति मुष्टिः ॥ ६॥ 


स एवोध्वीक्रताङ्गष्टः शिखरः परिकीर्तितः । 
राक्तितोमरयोमोक्षि"ऽलक्तकोत्पीडनेऽपि च ॥ 
कुकाङ्क काधनुर्व्टीग्रहणेऽधररञ्जने । 
अल्कोत्क्षेपणे कारये कार्यो खुष्टिस्तु युज्यते ॥ 


॥ इति शिखरः ॥ ७ ॥ 


अग्रदेरोन चेद्टम्ाङ्क्टाग्रेणैव तजनी । 
एतस्यैव तदा हस्तः कपित्थः कथितो बुधैः ॥ 


,. धारणे कुन्तवज्रदेः' दाराकषादिकर्मणि। 


चक्रचापगदादीनां ग्रहणे च प्रयुज्यते । 
यथा भरूतार्थकथने नियोगे शिखरस्य च ॥ 


॥ इति कपित्थः ॥ ८ ॥ 


न 


[ मुष्यादयः 


५५५९ 
५३० 
५५६१ 


५९२ 


५.९३ 
५देये 


५द९५ 


५९ 


५६७ 


५२८ 


५६९ 


1 480 वधि । 2 ^76 यथो । 3 ^76 सं प्रचक्ष्यते । 4 ^20 निखंरा | $ +20 
र £ 3 
रसखव द्रव्यतो | 6 ^+ए0 "घो । 7 ^26 कायः काय । 


8 ^४‹ “ज्ञादिश् धारणे 
कुन्तवज्नयोः सं. र. अ. ७. छो. १३२। मृष ९. 





 शंरुकीमुंलादयः 1] 


न° र० को०-उल्ास, परीक्षण र 


अनमिकाकनीयस्यावुर्क्तित्िव करते मनाक्‌ । ` 
विरलेऽस्यैव चेत्‌ स्यातां तदा स्यात्‌ खटकासुखः ॥ 
उत्तानोऽयं सख्रगादाने चामरस्यापि धारणे । 
प्रसूनावचये बाणाकषेणे दपेणग्रहे' ॥ 

वल्गाग्रहे पन्रच्न्तच्छेदने वीरिकाग्रहे । 
छारमन्थाकषणे च लोकयुक्तिमवेश्ष्य च । 

पेषणे कुङकमादीनामिमो कायीवधस्तलौ ॥ 


॥ इति खरकामखः ॥ ९ ॥ 


तजन्यनामिकेऽत्यन्तवक्रेऽरालस्य चेत्‌ स्थिते । 
शाकतुण्डस्तदा हस्त ईष्योयां 'प्रेमकोपतः ॥ 
सापराधे प्रिये 'य॒ताक्ष पते लेखधारणे । 
बीणादिवादने चास्य प्रयोगः कैशिदिष्यते ॥ 
नत्वं नाहं न मे कूयमिदयसंबनध भाषणे । 

बहिः क्षिघराङ्घुलिः स स्यात्‌ सावज्ञे तु विसजेने । 


अन्तर्मध्याङ्कलिः स स्यात्‌ सावज्ञावाहने तथा ॥ 
॥ इति श्ुकतुण्डः ॥ १० ॥ 


तजन्यङ्खछमध्याः स्युरूद्धाखताभिवत्‌ स्थिताः । 
वक्रानामा कनिष्ठोध्वौः कङ्कटे दस्तके भवेत्‌ ॥ 
चखुचुकाभिनये तद्भबिवुकम्रहणे शिरो; । 
बिडालस्य पदे कायेः कुसुमे चम्पकस्य च । 
मिते भ्रासे फटेऽस्येव रल्नाद्यभिनये ऽपि च ॥ 

॥ इति काङ्गलः ॥ ११ ॥ 
साङ्कछाङ्लयः किञ्ित्ङुःञश्चिता विरलास्तथा । 
 अलग्राग्रा भवेयुश्चेत्‌ पद्यकोरास्तदा करः ॥ 
पुष्पाणां अ्रहणे नादीपिण्डदाने च विस्तृतः । 
भ्रूमिस्थितार्थग्रहणे कुशिताग्रस्त्वधो सुखः ॥ 
` ` फुान्जेन्दीवरादौ तु संख्छिष्टमणिवन्धकी । संश्छिष्टमणिवन्धकौ । 


५७० 


५.५९ 


८१.५२ 


५.५३ 10. 


५१५ 


(१.५१ 15 


, १.७द्‌ 


20 
५.५.७9 


५.७८ ` 
25 


५.७९ 


1 450 दूषैणाग्रहे । % 80 प्रेमे यतः । 3 ^280 शक्षेपाते । 4 ^96 लेषधघारणे । 
5 ५80 कायै । 6 ^» °नये नच । 7 ^४५ किंचि कचिता । 








। 

॥ । 
11 

41 
|| 
| ¢ 
|, || 





10 


28 


च्र° र० को०-उल्टास १, परीक्षणं १ 


विरलाङ्खलीपद्मकोरी सि हायैरामिषग्रहे । 
लोकानुसारतः कायः कचिदेकः कचिद्र यम्‌ ॥ 
॥ इति पद्मकोशः ॥ १२ ॥ 


व्यावत्तिताख्यं करणं क्रुत्वा वा परिवर्तितम्‌ । 
यच्राङ्खल्यः करतले पाश्वेस्थाः सोऽपह्टवः ॥ 
अयमेवालपद्यः स्यात्‌ परिवतिंतमाभितः। 

अद्रतायुक्तमिथ्योक्तो कस्य त्वमिति वादने । 


खापराधगप्रोज्छने च खीभिनोस्तीतिवादने ॥ 
॥ इलयरपटवः ॥ १३ ॥ 


खटकाखुखदस्तस्य थस्मिन्नध्वप्रसारिता । 

तजनी ददयते सोऽय हस्तः सूचीखुखो भवेत्‌ ॥ 
एकत्वे सरलोध्वो स्यान्नासास्थाश्वासवीक्षणे । 
भ्रमन्ती वलयाकारस्तुध्वो स्याचक्रसुचने ॥ 
आयान्ती रीघमूध्वोधः सोदाभिन्याभियं भवेत्‌ । 


 कुलालचक्राभिनये भ्रमन्ती स्यादधोसुखी ॥ 


रथचक्राभिनयने ्रामयेन्निजपाश्वेतः । 

साधुवादे ध्वजे चापि चलामूध्वौ च दरहोयेत्‌ ॥ 
कणौव्तसे कणोन्तं नयेदीषत्‌ पकम्पिताम्‌ । 
स्तबकाभिनये किञ्चित्‌ कुिताः स्यात्‌ प्रसारितां ॥ 
कुटिलायां गतौ कायो मण्डलाकारधारिणी । 
भ्रमे त्वल्यन्तमसक्रत्‌ पाश्वोत्पाश्वान्तरं जेत्‌ ॥ 
चरुत्किालये दीपरिखायामपि चेष्यते । 
नक्षच्रायवलोके च सरलोर््वसुखा भवेत्‌ ॥ 
भ्रमन्ती मण्डलाकारं पतने तु पतवयधः। 
सिहादिदंषटराभिनये त्वोषटप्रान्तगताबुभौ ॥ 
किचित्‌ पाश्वेनतौ कार्यो ' करौ सूचीसुखौ सदा । 


संयोगे पाश्वंसंयुक्ते 'तजन्योऽधस्तटे मते ॥ 


वियोजिते वियोगे तु कलहे खस्तिकीकृते । ` 
कर्णकण्ड्यनेऽनिष्टञ्चवणे अवणोपगा ॥ 


 [ अरुपह्छबादयः 


५८० 


५८१ 


८२ 


` ५८३ 


५८ 


५८५ 


५८द्‌ 


८५८७ 
५८८ 


५८९ 


५९० 
५९१ 


५९१९ 


1 ^90 षरटका । 2 450 कुःचितां । 3 480 सेष्यते । 4 420 कायो । 5 ^.20 
न्यकले 2 अधस्तले सं, २. अ, ७, च्छो. १५१ 





` -भ 


। स्िरदयः ] २५ को०-उास ९, रीण ९ 
। 
। 


'चिकुरापनयखेदापनये किर संभिता । 
तजेकम्पितोध्वा स्यात्‌ सीवने चांराकस्य च ॥ 
चलाग्रगा ज्ञात्रश्ने किञ्चित्‌ पा्वनता भवेत्‌ । 
ईैश्वराभिनये भालदेदागा स्यादधोसुखी ॥ 
देवेन्द्राभिनये सा स्यात्तिरश्चीनोन्नता भवेत्‌ । 
परिवेषाभिनयने भ्रामयेन्मण्डलाकरतिम्‌ ॥ 
तिरश्चीनां तजेनीं च तथान्यदपि लोकतः' । 
नाद्याचा्यो पदेदोन खयसूद्यं विपश्चिता ॥ 

॥ इति सूचीमुखः ॥ १४॥ 


पताक्रो निन्नमध्यो यः स तु स्षरिरा भवेत्‌ । 

अधोगामी सपेगतावुत्तानो देवतर्पणे ॥ 

महानां च सुजास्फोरे नियुद्धादिषु कीर्तितः । 

प्रस्थस्थि) ते परिमाणे वास्फालने करिकुम्भयोः ॥ 
॥ इति स्पशिराः ॥ १५॥ 


मध्यमामध्यमो यत्र पताकाङ्ग्टको भवेत्‌ । 
कनिष्ठिका चोर्ध्वगता स भवेचतुरः करः ॥ 
अन्ये कनिष्ठिकामीषदनामाप्रष्ठगां जगुः । 
पताकाङ््टकं मध्यासूलगं चतुरे करे ॥ 
नये वदनदेदोऽसौ विनये मणिबन्धयोः । 
युतौ विचारे पाश्वेस्थ' ऊहापोहे हृदि स्थितः ॥ 
उद्वेटितयुतः कार्यो लीलायां कैतवे" पुनः । 
स मोक्षप्रेरणे च स्याच्छनैररध्वतलः करः ॥ 
मदेनाभिनये कायो मध्यमाङ्गषठमर्दनः। 
चातुथवचने त्वेतौ संयुतौ चतुरौ कसे ॥ 

` उत्तानौ नयनौपम्ये पद्मपत्रनिरूपणे। 
खूगकणोभिनेये च बालके स्यादधोखखः ॥ 
विधेयौ खस्तिकाकारौ खरताभिनये करौ । 
खल्पाथांभिनये तद्रदर्णकस्यापि सूचने ॥ 
चतुर्चतुरैः कायः चतुष्ष्वर्थषु रोकतः' । 

॥ इति चतुरः ॥ १६ ॥ 


1 ^.90 चिङ्करोप । 2 4४० प्रश्नो । 8 49० छोकता । 4 480 रस्थाङ' । 
वेतवे + 
तवे । 0 कैतवे सं. र. अ. ७ च्छो. १६७। 6 «8 छोकता । 


७ चरृ० र्न 


2०० 
8०१ 20 
६०२ 
९६०२ 

29 
दैण्् 


९०५५ 


30 


9 ^80 








। ॥ 
| | 
| | | | 
॥ | 10 


15 
20 


29 





न° र० को०-उ्टास १, परीक्षण १ 


भवेतां स्पशिरसो यदाङ्गछटकनिध्िके ॥ 
ऊरध्वकरती तदा हस्तौ खगरीषे उदाहृतः । 
अह सां प्रतार्भषु सोऽधो दयृताश्चपातने ॥ 
उत्तानोऽलिकदेरादि खेदापनयने भवेत्‌ । 
अलिकादिक्षेत्रसंस्थ एवमाद्यूदयेत्परम्‌ ॥ 

॥ इति सखगङीषैः ॥ १७ ॥ 


त्जन्यङ्गछटमध्याः स्युयेच्र चताभिवत्‌ स्थिताः । 
लग्ना यत्रोद्धुविरले रोषे सो दं सवक्त्रकः ॥ 
क्षणे शदुनि निःसारे मदिताङ्लिकच्रयः। 
हिथिलेऽल्पे घा वग्रं दधत्‌ क्षिप्रं विधूनितम्‌ ॥ 
सुक्ताफलादिवेधे च कुसमावचयादिषु । 
स्युतविच्युतमेदेन यथीचिल्यं विधीयते ॥ 


॥ इति हंसास्यः ॥ १८ ॥ 


पताकस्य न तन्मूलं तजेन्यायङ्खलिक्रयम्‌ । 

यदि किंश्चिद्‌ भवेत्‌ स स्यात्‌ हस्तको हंसपक्चकः ॥ 
आचमने स्यादुत्तानखन्दनाद्यलुरेषने । 
अधोगतस्तथोत्तानः प्रतिग्रहक्रतौ मतः ॥ 
"चिपुडादिविधौ कार्यो मालक्षेत्रगतः करः । 
प्रल्य्षे च परोक्षे चालिङ्गने खस्तिकौ करौ ॥ 
स्तम्भादयभिनये कार्यौ मण्डलाक्रुतिसखुन्दरौ । 
स्रीणां बिभ्र स्तनथोरन्तरे भवेत्‌ ॥ 
कपोलदेदो ५४०, ञन्तायां* दलुधारणे । 
रसभावानु भवेषु यथौचिलयं प्रयोजयेत्‌ । 


अन॒क्तेषु करेषु स्युरल'भाववक्राजुगाः ॥ 
॥ इति हं सपक्षः ॥ १९ ॥ 


स करो भ्रमरो यत्र मध्यमाङ्खष्टकौ मिथः । 
श्िष्टामनौ तजनी नज्नान्ये 'तृध्वं बिरडे तथा । 
कर्णपूरे तालपत्रे कष्टकोद्धरणादिषु ॥ 


॥ इति श्रमरः ॥ २० ॥ 
> 


[ मगदीषीदथः 


९०६ 
द०७ 


2०८ 


९०९, 
द९१० 


६११ 


९६९७ 


1 ^0 छषा । ? ^ जरिषुंद्वादि । 8 ^ श्चितायां । 4 ^»0 त्यं । न खं २. 
अ, ७. छो. १६८ । | 





ऊणैनाभादयः | न° र० को०-उल्ास ९, परीक्षण १ ५५१ 


साङ्खष्टाङ्कलयो यत्र संलभ्ाग्राः सुसंहताः । 

ऊध्वोः स सुकुलो ज्ञेयो सुक्कुलखाकारपेदालः ॥ द१८ 

खुराचेने भोजने च बलिकर्मणि कुडमले । 

मुहुविंकारय प्रक्रत नीतो दाने त्वरान्विते ॥ ६१९. 

कमलादेः प्रार्थनायां संख्यापश्चकसूचने । ध 

सविधे कामिनीनां तु मुखस्थो विट चुम्बने ॥ ६३२० 

स्यादाच्छुरितकेऽप्येष रस भावविजुम्ितः । 

कामिनीकुचकक्ादौ सराब्दं नखद्धेखनम्‌ । 

यदङ्कुलीपश्चकेन तदाच्छुरितकं विदुः ॥ द२१ 
॥ इति मुकुटः ॥ २१ ॥ 10 


पश्चाप्यङ्गलयो यच्च पद्मकोरास्य कुिताः । 

ऊर्णनाभः स विज्ञेयः शिरःकण्ड़यनादिषु ॥ ६२२ 

चौर्येण वस्तुग्रहणे कुष्टायभिनयेन च । 

सिहव्याघ्रायभिनये चिवुकक्षेत्रगौ च तौ । 

स्वस्तिकौ तु करौ कायौ फलादेग्रेह एककः ॥ द२३1 
॥ इत्यूणेनाभः ॥ २२॥ 


| भः 
'अराराङ्षटतजेन्यो भिलिताग्रो तथा पुनः। 
तलमध्यो८ध्ये) `सनािस्तः(मनाग न्यस्तः) 


स कं(सं)दंशोऽभिधीयते ॥ दर्थे 
अग्रजो सुखजश्नैव पाश्वैजश्चेल्ययं त्रिधा । %0 
तत्राग्रजः प्राञ्खः स्यान्खुखजः सम्मुखो भवेत्‌ ॥ दे २८ 
पार्वतः स्यात्पाश्वैसुखो विनियोगोऽधुनोच्यते । 
कुसुमच्छेदने च्रन्तात्‌ कण्टकोद्धरणे तथा ॥ द२दै 
सूश्ष्मपसूनावचये संदंरोऽग्रज उच्यते । | 
व्यञ्जन राटखाकादिपूरणे मुखजो मतः ॥ दे २.७२ 
धिशित्युक्तो तु रोषेण संदंराः पाश्वंजः श्युभः। 
मणिसुक्ताप्रवालादौ गुणनिक्षेपणे मतः ॥ ६२८ ` 
मणीनां वेधने चापि तत्वस्यापि प्रभाषणे । 
ध्याने निरूपणे सुक्ष्मच्यणुकादेस्तु घषेणे ॥ द२९ 


1 450 आरालाङ्गष्ठतजेन्यो । 2 ५. किंचिश्चेतरमध्यस्थस्तद! संदंश उच्यते ॥ 
सं, र्‌, अ, ४ छो, १७६ 1 = 











10 


15 


५५२ 


20 


29 


च° ₹० को०-उदल्लासं ९, परीक्षण १ [ ताश्रचूडादथः 


अलक्तकादिवस्तूनां चिच्रकार्मण्यपीष्यते । 
पाश्वाभिसुखदस्ताभ्यां दरिद्रस्य प्रकाराने ॥ ६३० 
भाषणे सद्वितीये स्यात्‌ सरोषे वामहस्ततः । 
किञ्चिदग्रविवरत्तंन तथान्येष्वपि युक्तितः ॥ द३१ 


॥ इति संदंशः ॥ २२॥ 


= मध्यमाग्रेण संलग्नः कुटिला यदा । 

न्यन्ये तटस्थ चेत्ताञ्नचृडस्तदा करः ॥ ३२ 
रीध्येविश्वासका्यै च बालाह्यने च भत्सने । 
ताडे कलासुहूतोदौ छोरिकादौ च राब्दवान्‌ ॥ द३३ 
प्रसारितकनिष्ठां च सुष्िमन्ये प्रचक्षते । 
तान्नचूडं सहस्राद गणने विनियुज्यते । 
क्िप्सुक्ताङ्गलिः प्रोक्तो विध्रबोऽभिनये वुधैः ॥ ६३४ 

॥ इति ताश्रचूडः ॥ २४७॥ 


॥ इति चतुर्वेशातिरयुतदस्ताः ॥ 


पताको विरलाङ्ष्ट उपधानः करो भवेत्‌ । 
स्याचिन्ता निद्रयोरेष उपधानेऽपि युक्तितः ॥ दे३५ 


॥ इत्युपधानः ॥ २५॥ 


४, 
कनिष्ठाङ्कष्टकौ यच्राधोगतौ संहतं पुनः । 
तजन्यादिच्रथ स स्यात्‌ सिहास्यस्तत्‌ खरूपतः ¦ 
सिहस्याभिनये स स्यात्‌ मेलने द्रवचूर्णयोः ॥ द३द६ 
॥ इति सिंहास्यः ॥ २६ ॥ 


संहताङ्ल्यो यन्न मध्ये वतुलतात्मता' | 
कदम्बोऽसो रसाखादे हस्तको विनियुज्यते ॥ ६६३७ 


॥ इति कदम्बः ॥ २७ ॥ 


पताकाङ्षटको यत्र मध्यमामूलसंभितः। 
निकुश्चकोऽसो खल्पार्थे बेदस्याध्ययने मतः ॥ ६३८ 
॥ इति निकुअ्चः ॥ २८ ॥ 


नः 


1 80 यज्कितः । 480 °४ये । 3 4४0 चिता । 4 ^80 मन्ते । 5 «90 शहमतां । 


कपोतादयः ] न° र० को०~उट्ास ९, परीक्षण १ ५५३ 


एभिञ्चतुभिः सहिता अष्टाविंदातिरयुतहस्ताः । 

भवेतां यच्र संश्िष्टे पताकस्य तटे मिथः । 

अञ्जलिनाम हस्तोऽयं विनियोगोऽस्य कथ्यते ॥ ६३९ 

धायं; क्रमात्‌ इीर्ष्ण वक्रे चश्चरदेरो नमस्कृतो । | 

देवताया गुरोश्चैव ब्राह्मणानां चभिस्त्वयम्‌ । 5 

नियतो नियतस्थाने ख्रीभिरेष प्रयुज्यते ॥ दे४० 
इत्यञ्जङिः ॥ १ ॥ 


करावच्चिष्टतल्कौ श्छिष्टमलाग्रपाश्वेकौ । 

कपोताक्रुतितो दस्तः कपोतः कीर्तितो वुधैः ॥ देथ 

इममेव परे प्राहुः कूर्मकं नास्यवेदिनः । 10 

विनये गुरुसम्भाषे प्रणामे पाञ्खो मतः॥ दे४२ 

वक्षःस्थः कम्पितः कायः खीकापुरुषयो'भये । 

स खेदवाक्याभिनये नेदानीमितिसुचने ॥ दे 

इयत्तायाः परिच्छेदे“ऽङ्गलिः स्परो नपूर्वकम्‌ । | 

विसुक्तोऽयं बुधैः कार्यो युक्तितोऽभिनयान्तरे ॥ देथ 15 
॥ इति कपोतः ॥ २॥ 


अङ्गल्यो यन्न करयोरन्योन्यस्यान्तरेषु चः । 
अन्तवेहिवौ दरयन्त निर्गताः स तु करकटः ॥ दे 
पराञ्जुखतलः किचचिदन्तनींताखिटाङ्गलिः । 
ऊध्व पार््वेऽ^ग्रतो वा स्यात्‌ कामावस्थाङ्गमोटने ॥ दद 20 
बहिगेताङ्गलिः स्थूलजरटस्य जठरस्य) निरूपणे । 
जरठः क्षेत्रगः (जठर-क्षे्रगः)' कार्यो 
मनाक्‌ चक्राङ्खलि; पुनः ॥ ३४७ 
रांखस्य धारणे कार्यो ज्ञम्भादौ बहिरङ्गलिः । 
खेदेऽङ्गलीनां षषे स्याद्धन्‌. राजाभिषेचने । % 
मूर्धि धायोः८र्यो) द्विखिवोयं [सलानकारयै]" प्रयुज्यते ॥ ६४८ ` 
॥ इति ककेटः ॥ २॥ 





-- ----- ----- - --- वि 9 था 


1 20 "षयोभ- । 2 ४० परिच्छेदगुलिः। 3 ^ तु । 4 ^ पार्श्व॑भ्र° । 5 ° जठरः 
श्चेगः सं. र. अ. ७ च्छो. १९१ । 6 116 1018518 ०1त्‌ऽ ९6 इप्गुगा९त पफ) 
4&०।६९10 81188 फणा 00 1४2. 07 - "` " सानकर्मणि । द्विखिवौ मृधि संयोज्यो 
गहे तु स्यादधस्तखः । {0110 11} ^ ° {06 718. > 24 र) 














| ॥ ५४ च° २० को०-उच्लास ९, परीक्षण १ [ स्वस्तिकादयः 
|| | अरालाख्यौ' पताकौ वा खटकासुखसंज्ञको । 
॥ अन्योन्यमणि बन्धस्थावुत्तानौ वामपाश्वेगौ । 
| हदयक्षेत्रगौ वा स्तशेत्तदा खस्तिकौ मतौ ॥ द४९ 
| ` एवमस्तीति नारीणां भाषणे विच्युतः स तु। 
| | | 5 सागराकारासुख्येषु विस्तीर्णेषु प्रयुज्यते ॥ ५० 
| ॥ ॥ इति स्वस्तिकम्‌ ॥ ४ ॥ 
|| ६२ 
॥ अन्योन्याभिस्ुखो स्यातां हस्तौ चेत्‌ खटकासुखौ । 
| खस्तिकौ मणिबन्धे वा 'खटकावधमानकः ॥ ३५१ 
|॥ उत्तानपादय८उत्तानः स्याद्य) 'सूर्योदयादौ प्रथमे मते । 
|¢ 10 प्रमाणप्रणाम) करणे पुष्पय्रथने सलयभाषणे । 
॥ ताम्बूलग्रहणे यूनोद्धिंतीये ति्थगाननः ॥ ६५२ 
|॥ ॥ इति खट कावधैमानः ॥ ५॥ 
| -- 
| | 'सपेरीषो पताकी वा खस्तिकौ मणिबन्धमौ । | 
॥ परस्परस्कन्धदेरौ गताुत्सङ्गसं जके ॥ `. ६५५३ 
|| 15 दक्षपाश्वेगत यद्रा वामपाश्वगत नु वा। 
|॥ उत्सङ्गे केचिदिच्छन्ति खस्तिकं दृल्यकोविदाः ॥ द५४ 
। ॥ पाश्वस्याभिखुखे यद्वा हस्तयोः धृषठके यदा । 
|| ¦ कूपरो खस्तिकाकारौ उत्सङ्ग केचिदूचिरे ॥ ९५५५ 
|| । अतिप्रयन्न साध्येऽथं छीलाया ग्रहणे तथा । 
। ।  ""पराद्खस्य शीते वा रोषामषेकरते तथा । 
|| प्ार्थनानभ्युपगमे लल्लादावपि योषिताम्‌ ॥ ६५५६ 
॥। ॥ इत्युत्सङ्ग; ॥.६ ॥ 
|| | + 
|| स्कन्धक्रूपेरयोर्मध्यमन्योन्यस्य जौ यदा । 
|| ईषद्‌ ध्वंपदेरास्थो गृहीतः "स्पदीर्पकौ ॥ ९५७ 
| | : तदा स्यान्निषधो हस्त ओत्खुक्यादौ नियुज्यते । 
| | गाम्भीयेस्थैरयंगवांदौ आचायैर्विनियुज्यते ॥ द५८ 
| | | 1 40 “ख्यो । 2 450 गमवस्थौ । 3 + खटिका । 4 ५20 खेखका । 
1 । 5 ण खयोदयादावुत्तानः स्यादयं प्रथमे मते ४ 1])५५8ऽ8 ५40०९ ; भ. को. 





। ॥|| पृ. १५२ । 6 9 प्रणामकरणे ना. रा. अ. ६ छो. १३८ 3 #/ 14888 भ. 
को. ¶. १५६ । 7 ५55 सक्षरीषो । 8 ५४५ ` स्वस्तिके । 9 ^80 सृत्यको० 1. 10 40 


पुराक्यखश्य । 11 80 सक्त । | 


बऋर्त्ः 


। 
॥ +॥ 

14 
1॥ 
19. 
¶1 10} 
| ॥ 
॥ 





दोलखादयः ] नर ° २० को०~उह्ास १, परीक्षण १ ५७ 


कपित्थो दस्तको वापि दश्चवामेतरं करम्‌ । 

सुकुलं बेष्िते प्रहुस्तदान्यं निषधं परे ॥ ६५९ 

चाखार्थस्य खीकरणे खीक्रतार्थस्य धारणे । 

'मान्यमेतदिदं वाक्यमित्युक्तो पीडनेऽपि च । 

तथा समयराखोक्तसकेत ग्रहणेऽपि च ॥ ६8०5 
॥ इति निषधः ॥ ७॥ 


दोखे छथांसौ कर्तव्यो पताकी विरलाङ्गली । =. 

लम्बमानौ नियोञ्योऽये मूच्छोयां व्याधिखेदयोः॥ ६१६१ 

संभ्रमे गर्वगमने कर्तव्यः पाश्वेदोलितः 

मदे चैव यथायोगं स्तन्यो वा करियते करः ॥ देदे२10 
॥ इति दोलः ॥ ८ ॥ 


उत्तानो व्यक्तसंश्छिष्टकरभौ सपेरीषेको । 

स्यातां पुष्पपुटो नाम पुष्पाञ्जलिबिसजने ॥ ६६३ 

धान्यपुष्पफलादीनां ग्रहणे च समपेणे । 

'अधौर्थिसंप्रदाने च तोयस्यानयनेऽपि च । 15 

पाणिपाच्रा'दाने राज्ञः प्रसादग्रहणे गुरोः ॥ ददे 
॥ इति पुष्पपुटः ॥ ९. ॥ 








परसपरोपरिगतौ खसंश्छिषटावधोखुखो । 

उरध्वौगष्टौ पताकी तौ मयेद) तां मकरे करे ॥ देदे५ 
क्रञ्यादमत्स्यमकरद्विपीनां याघसिहयोः । र 
नद्याः परे च बाहुल्ये प्रयोज्योऽय विचक्षणैः ॥ देदेदे 


॥ इति मकरः ॥ १०॥ 


कटिक्षेतरे स्दीषौ कुश्न्कूप्पैरकौ यदा । 

गजदन्तस्तदा हस्तो ग्रहे" स्तम्भस्य स स्तः ॥ ६६७ 
महाभारस्योद्रहने केचिदेनं भरचक्षते । ठ 
प्रथम निषिधं तं च वरवध्वोः समेतयोः ॥ ६द८ 


1 480 मन्य । 2 ^80 अध्य्थिसंप्रदनि । ५ अर्धदाने* ४1]121888 1 भ. को 
पु. ३७५ । 3 4.50 °पाज्रदाने । 4 0 गृहे । 





५६ न° र० को०-उछ्छास ९, परीक्षण १ [ अवहित्थादयः 


विवाहस्थाननयने तथा रि (दौ)लशिलादिनः- । 
वृक्षादीनां चालने च कर्तव्यः स्याद्रतागतः ॥ ६६९ 
॥ इति गजदन्तः ॥ ११ ॥ 


टएकतुण्डावधोवक्रो हृदयाभिमुखौ करौ । 

क्रत्वाधो नीयमानो चेदवहित्थस्तदोदितः। 

दौवेल्यौटसुक्यनिःश्वासगाच्रकादर्येष्वसौ भवेत्‌ ॥ दे.9० 
॥ इति अवदहिस्थः ॥ १२॥ 


(9५1 


सखगरीर्षो हंसपक्चावथवा सर्परीषकौ । 

पराञ्वुखौ खस्तिकत्वं प्रा स्याद्रधेमानकः॥ ६७१ 
10 खस्तिकेन विना भूतौ तावेनं केचनाभ्यधुः। 

द्वारवातायनादीनां कपारेद्धाटने मतः ॥ ६७२ 

श्रीमत्कीतिंधराचायों द्वितयं निषधं करं । 


नौ यी 


वधेमानाभिधं पराह विनियोगस्तु पूर्ववत्‌ ॥ ६७३ 





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1 ॥ इति वधेमानः ॥ ९३ ॥ 

| | | 

| | । 15 सुशिष्टौ पताको चेत्‌ हस्तौ [प्र]योगदस्तदां | 

| | | मेलने प्रीतियोगे च परस्परम मतः ॥ दे.७षे 
| | ॥ इति प्रयोगप्रदः ॥ १४ ॥ 

६ 

॥ किञ्चित्‌ श्िष्टसुजावेव पताकौ खस्तिकीकरतौ । 

| | ¢ आलिङ्गनो भवेद्धस्त आलिङ्गनविधौ मतः ॥ ` ६.७५ 
| ॥ 9 5: ॥ इत्यालिङ्गनः ॥ १५॥ 

| * 

। | शिष्टौ मिथश्चेच्छ्खिरौ करौ द्विदिखरस्तदा । 
|॥ रायनार्थऽङ्कुलिस्फोटे नास्तीति. कथनेऽपि च ॥ ६७६ 
| । ॥ इति द्विशिखरः ॥ १६ ॥ 
|| ॥ भः 
| । ` .  सभाधीरासुखं हस्तं कृत्वो्वविरलाङ्कलिः । | 

| ८ % अस्य षष्टे द्वितीयोऽपि तवङ्गुल्यन्तराङ्कलिः ॥ ६७७ 


उभयोः करयोः भान्ते तथाङ्गघठौ बहिगेतो । 
1 शोलशिलादिनः. ण सं. र. अ. ७ छो. २०७ शौटश्चिलोत्पाटे । २ 50 सेखने । 











म न =-= 
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° ~ ककण ि-भ्ी र कक ~ = = ~ -न > 


किरीखादयः] त्र° र० को०~उल्कास ९, परीक्षण श ७७ 


कलापं हस्तक प्राहुः केचिच्छेषकणं(१रं) त्वसुं । 
अभिनेये फणीरोऽसुं तथा भूमीग्वरे जगः ॥ ७८ 


॥ इति 'कखापः ॥ १७ ॥ 


कलाप एव रीषेत्थः(स्थः)' किरीट इति कथ्यते ॥ ६७९ 
॥ इति किरीटः ॥ १८ ॥ ¢ 


कूपेरौ पाश्वैलप्नौ चेत्स्यातां पुष्पपुटाभिथे ।* 


तदा स्याचषको हस्तः पाणिपात्र नियुज्यते ॥ द८० 
॥ इति चषकः“ । १९ ॥ 
नः 


उत्तानो वामहस्तश्चेत्‌ पताकस्तदुपयपि । 
चटत्संदं रादस्तश्चेत्‌ पररः) स्यालटेखनस्तदा । 10 
लेखने विनियोज्योऽयं उलयाभिनयगोऽपि च ॥ ६८१ 

॥ इति डेखनः ॥ २० ॥ 


एते 'विरातिसंख्याकाः संयुता दस्तकाः स्मरताः । 
अथ चत्ताख्यहस्तानां प्रपश्चमपि दध्महे ॥ ६८२ 
प्राञ्खी' खटकावक्रो वक्षसोऽ्टाङ्लान्तरे | 18 
समानक्रूपेरस्कन्धौ चतुरस्रावुदाहलौ । 
आकर्षणे समाख्यातौ सुक्ताहारख्रगादिनः ॥ ३८३ 
॥ इति चतुरखौ ॥ १॥ 
न 


दंसपक्षाख्यकरयोः ` समयोभेद्यदेककः । 

उन्तानोऽधो बजल्यन्यो वक्षसो यालयधोसुखः ॥ ८४ % 
तदोद्रत्तौ समाख्यातौ ताखच्रन्तनिरूपणे । 

तावेव तालघ्न्ताख्यौ चतुरखरविरोषितौ ॥ ३८५ 
हंसखपक्तीकृतौ तौ तु व्याघ्ृत्तिपरिवत्तितौ । 

उद्भृतौ हस्तकौ तौ तु जयशब्दे नियोजितौ ॥ दे८दे 


इत्युदृत्तो ॥ २॥ २६ 


तुल्यांराधस)क्रूपैरौ तिर भूतौ 'संसुखस्थतलौ । 
1 ^ कपाखः 2५ कपोलः । 2 ण कलाप पव रीषैस्थः । ४1194888 भ. को. 
पर. १३६ । 3 ४० °निधे । 4 40 इतिति च° । 5 ४0 “तिर्या । 6 ४० दृच्नहो । 7 २0 
प्राङ्धखो । 8 80 4०) समयो । 9 ^ मुखतस्तलौ । ५ संमुखस्थतलो । सं, र. अ. 


७ श्छो. २२१ । 
८ चरृन्रन्नर 














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मन्त - 





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बसरी 





५८ न° र० को०-उलटास ९, परीक्षण ९ [ स्वस्तिकादयः 


10 


15 


20 


20 


उष्टृत्ती भूय पश्चाच त्यसी भूतौ खपाभ्वेगौ । 


हंसपक्चौ तलसुखौ मधुरे मदैटध्वनो ॥ | ६८७ 
॥ इति तलसुखो ॥ ३ ॥ 
हं सपक्षकराश्िष्टखस्तिकः खस्तिको करौ ॥ ६८८ 


इति स्वस्तिको ॥ ४ ॥ 


तावेव `बिप्रकीणोख्यौ शटिति खस्तिके च्युते । 
पराञ्खावुन्नताग्रौ नीचाग्रौ वा व्यवस्थितो । 


भ्यां पुरतो दंसपश्षौ तौ विप्रकीर्णको' | ३८९ 
= र इति विप्रकीणैको ॥ ५॥ 


पताकौ खस्तिक भूय व्याच्त्तपरिवर्तने*(? 'वतितौ ) । 

करत्वा 'वाममथोत्तानमराल रचयेत्करम्‌ ॥ ३९० 
अधोवक्रं दक्षिण च खटकासुखतां गतो । 

चातुरसख्रेण कथितावरालखटकाखखो ॥ ३९१ 
पद्यकोरावथो्दरोस्यै उयाचरत्तपरिवर्तितौ । 

अराठी खस्तिकाकारौ जायेते खटकासखो ॥ ~ ६९२ 
चातुरख्याविरोषे तावरालखटकासुखो । 

"वणिजां सिवादीनां वितर्केऽसो पयुज्यते ॥ ६९३ 
अथवा हृदयाग्रस्थः पाञ्छसखः खटकासुखः । 

परोऽरालः पोन्नताग्रस्तियेगल्पप्रसारितः ॥ ६९४ 
पररपरान्यपाग्वैस्थो खपाश्वे वा व्यवस्थितौ । 


ताखान्तसै तदा प्रोक्तावरारखखटकासखखो ॥ ६९५ 
इत्यरालखटकासखो ॥ ६ ॥ 


शुजाग्रकूषरांसेषु सविलासेषु चेत्करौ । 

भूत्वा पताकौ व्याच्रत्तं विधाय भवतो दतम्‌ ॥ ३९९ 
अधस्तली तदाविद्धवक्तौ चलययकरौ मतौ । 

केचित्‌ पताकयोः स्थानेऽरारौ तौ संप्रचक्षते । 

विक्षेपवलने चैव विनियोगं प्रचक्षते ॥ ३९७ 


इत्याविद्धव क्रो ॥ ७ ॥ 
1 


1 ^+86 वप्र । £ ^+286 °पक्षोस्ते | 3 20 निकरौ | 4 ् 4601 8)8118. पताको 
खस्तिकीकत्य व्याचृत्तपरिवर्तितौ । ( {0110 15 0) 5 ^® शत्वामपथो । ण क्रमात्‌ 
त्वा यत्र वाममुत्तानाराखमाचरेत्‌ । सं. र. अ.७ च्छो. २२५ । 6 ^8५ °वण्य । 7 ^80 
मणिजं । ण वणिजां । सं. र. अ. ७ छो. २२७। 





खच्यास्थादयः ] ० र को०-उल्लाख १, परीक्षण १ ५९ 


चतुरसरौ खस्िकौ वा सपेरीर्षौ यदा करौ । 

मध्यमासंगताङ्गष्टौ पयायप्रखलतौ तिरः ॥ ६९८ 

बहिः प्रसारितां धत्तस्त्वङ्कटीं चेत्प्रदेरिनीं । 

तदा सूचीखुखादच् विरोषं केचिदूचिरे ॥ ६९९ 

पूर्वं पताक्षौ कर्तव्यो व्यावरत्तपरिवर्तितौ । ५ 

भ्रान्त्वा प्रसरणं कृत्वा पञ्चादन्यस्तु पर्ववत्‌ ॥ ७०० 

केषांचन मते सर्पद्ीषोकारौ करौ स्थितौ । 

मध्यप्रसारिताङ्खषठौ रेचितखस्तिकी तथा । 

सूचीसुखौ भवेतां ताविति सूच्यास्यलक्षणम्‌ ॥ ७०१ 
इति सृच्यास्यौ ॥ < ॥ 10 


चरसारितोत्तानतली ईतपक दरतश्रमो । 
रेचितौ तौ' इसिहस्य' दैत्यवक्षोविदारणे ॥ ७०२ 
केचिदुत्तानप्रखतौ पताको रेचितौ जण; । 


केचिदेतौ पूर्वलक्ष्मवि भागेन परथग्विदुः ॥ ७०३ 
इति रेचितो ॥ ९ ॥ 16 


रेचिते दक्षिणे हस्ते वामे च खटकासुखे । 
अथवा शचतुरखेणकेनोक्तावधरेचितौ ॥ ७०४ 
इत्यधरे चितो ॥ १० ॥ 


एतत्करविपयोसात्‌ ब्रूतेऽधेचतुरस्रकौ ॥ ७०८ 
इत्यधंचतुरसखरौ ॥ ११ ॥ 20 


र. 
“चिपताकौ 'तिरशथीनावन्योन्याभिञुखो करौ । 
अंसक्ूपंरयोः किंचिचलतोश्चेत्कपोलयोः ॥ ७०६ 
हृदयां सललाटानां क्षेत्रे चान्यतमे स्थितो । 
क्षणमूधे(? ध्वं ) तरौ भूत्वा च लतश्चदयदा तदा । 
उत्तानवश्चितौ' हस्तौ कथितौ' चयकोविदैः ॥ ७०७2 
इत्युत्तानवश्चितो ॥ १२॥ 





1 450 °तौतो । 2 + हास्य ५ प्रयोज्यो त च सिहस्य देत्यवक्चोविदारणे । सं. 
र. अ. ७ च्छो. २३७। 3 «9८ चतुणस्तेणे° ५८ एकेन चतुरस्रेण । सं. र. अ. ७ च्छो. 
२३७ । 4 ^8५ च्रिपताको ५. जिधताको । सं. र. अ. ७ छो. २५५ । 5 5५ तिर्यञ्चौ । 
6 ^80 खलं । 7 «5५ °संचितो । 8 ^850 कथितो । | 





19 


&० 


1 80 शश्रसारि । 


० र० को०-उल्छास १, परीक्षण ९ 


भूत्वोत्तानावधोवक्तौ पताकंलिपताकयोः । 
कूरावन्यतरौ स्कन्धदेकान्निष्कम्य चदिमो ॥ 
रेचितं विदधाते तौ नितम्बाबुदितौ करौ । 
पृष्क्चेत्रे भरम केचिदेतयोः संपचक्षते ॥ 

इति नितम्बौ ॥ १२ ॥ 


चताकौ चिपताको वा दिथिलोर्ध्वप्रसारितो । 

दयाव्त्तिपरिचत्तिभ्यां खस्तिकाकारमापितो ॥ 

पल्वौ चापरे प्राहः पताको पद्मकोराकौ । 

नतोन्नतौ विधो च मणिबन्धप्रवेायोः । 

पुरतः पाश्वैयोवोथ सृख्ितौ पटवो मतौ ॥ 
इति पटवो ॥ १९४ ॥ 


चादौ निपताकौ वा र्शरान्तो पाश्वैदेरातः। 
समभरुत्थितौ चिरोदेरागतौ केराप्रदेरातः ॥ 
पुनः पुनर्विनिष्कम्य नितम्बं चेत्समाभितोौ 


क द्राबन्धाविति प्रोक्तौ हस्तो नरयविरारदैः' ॥ 
इति केदावन्धो ॥ १५ ॥ 


पताकौ जिपताको वा तिक्‌ परखतदोलितो । 
लताकरौ इति भोक्तौ चलयद्ाख विदारदैः ॥ 
इति ताकरौः ॥ १६ ॥ 


उन्नतो दोलितश्चेव पाश्वयोश्च्ठताकरः । 

करर्णस्थख््रिपताकोऽन्यः खटकाखुख एव वा ॥ 

तदा करिकराकारत्वेनोक्तः करिदस्तकः । 

नन्वच्र " जत्तदस्तानां लक्ष्मसाधारणे कथम्‌ ॥ 

हस्तकद्यनिष्पाये सुनिनैकल्वमास्थितम्‌ । 

तथा कीर्तिधराचाय ; करहस्तावितीरितम्‌ ॥ 

तथेव सुनिनात्रेव हस्तक त्वधेरेचिते। ` 
विजातीयकरद्रन्द्रौत्पा दितिकप्रधानके ॥ 

उक्त हविवचनान्तत्व तथैवाच्नोपपव्यते । 

मैवं महात्मनामेषः ख भावो यत्र कुत्रचित्‌ ॥ 


2 20 विद्यादैः । 3 ५ "करो 1 4 ^90 चत्त. । 


[ नितस्बादथः 


५०८ 


(७०९. 


७१० 


५१९१ 


७१२ 


७६१२ 


५१ 


७१५ 


५१३ 


७१.७५ 


५७१८ 


७१९. 





पक्चवश्चितादयः ] न° र० को०-उल्ास ९, परीक्षण १ ६ 
निरूपयन्ति यत्‌ किलिन्मनः कि न नपुंसकम्‌ । 














गङ्ायसुनयोश्आापि नदीत्वं प्रतिषिध्य च ॥ `: ७२० 
खल्पामारोपितं यच तद्टीटखायितचेष्टितम्‌ । 

अतो द्विवचने परापे कर न्द्रैकदेत॒जे ॥ ७२१ 
अस्मिन्‌ करिस्प्रतेर्हेतौ प्राधान्येन कताकरे । । 5 
लीलायितेन सुनिनेकत्वमनत्रोपदर्ितम्‌ ॥ ७२२ 
भटाभिनवगपैश्च तदारायवरानुगैः । 

एकैकस्य करस्याच्न पथक्त्वेन प्रयोगतः ॥ ` ७२३ 
करिहस्तत्वसुचितसदितं `तन्मतं यथा । | 
करिकणौक्रतेस्त्वेकः परः करिकराक्रतिः ॥ । ७२४ 10 
करस्तदानयोर्योगि द्वित्वोक्तिस्तत्परेरथ । 

इति कर्तब्यतात्वेनाविचायोन्यत्करस्य तु ॥ ` ७२९ 
गौणत्वं भणितं तत्ते जचधिटीति यतोऽत्र च । 

समप्रधान भावो हि दष्टः प्रकरणाग्रतः ॥ ५२६ 
खटकच्रिपताकान्यतरः कथित्करः परः । 15 
करहस्ताक्रतिस्तस्माद्‌ इन्द्रत्वान्न द्विता कथम्‌ ॥ ७२७ 
अन्राक्रतिप्रधानत्वे कविनेकत्वमास्थितम्‌ । 
क्रियाप्राधान्यतोऽन्येषु युक्तः द्विवचनं स्थितम्‌ ॥ „ ७२८ 
अतो यदेकवचनं तदाचायेस्य शां सितुम्‌ । 

सवातिरायितां खोकमध्य इत्येव सुस्थितम्‌ ॥ ७२९ 0 

करिहस्तः ॥ १७॥ 
पताक कटीरीषं न्यस्ताग्रौ पक्चवशितौ ॥ ७३० 
इति पश्षवश्चितो ॥ १८ ॥ | 

एतावेव यदा पाश्वौभिसुखाग्रौ व्यवस्थितौ । 

पश्चप्र्योतकौ ज्ञेयावुत्तानौ वा तदाकरौ । 5 
केचिदृध्वीगलीकौ तौ पराङ्वकतो* प्रचक्षते" ॥ ७३१ . 
| इति पक्षप्र्योतको ॥ १९ ॥ 

हंसपक्षे गते पाश्वादुपवक्षः“स्यलं रातः । 

1 80 0") च । 2 ४५ °दितन्म? 1 5 ^४80 “हस्त । 4 ^ बरान्वज्गो; 0१ 


तूर्ध्वागुली च पराड्युखो । खं. र. अ. ७ च्छो. २५६ । 5 ^90 प्रचक्ष्यते । 6 ^ 
वक्षस्थले । 








६२ भ्र° र० को०-उल्टास ९, परीक्षण १ [ गरुडपक्षादयः 


सविलासं तथा दस्ते'तियेक संपखते कमात्‌ । 
युगपद्भा तदा दण्डपक्षौ हस्तौ प्रकीर्तितौ ॥ ७३२ 
इति दण्डपक्षौ ॥ २० ॥ 


पताक त्रिपताकौ वा तियेगध्वै कृतौ करौ । 

प्रागधोग्रो कटिक्षेत्रे स्थितौ न्यकृतक्रपरौ । 

हस्तौ गरुडपक्षौ तौ गरुडेरागणोदितौ ॥ ७३३ 
॥ इति गरुडपक्चौ ॥ २९ ॥ 


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अरालौ हंसपक्चौ वा वक्षोदेराह्टलाटमौ । 
 .  तच्रस्थावप्य८स्थौ प्राप्य) वा भालपाश्वयोः ससुपागतो ॥ ७३४ 
0 मण्डलाच्र्तिवितता उर्ध्वमण्डलिनो करौ । 
ललाटप्राभिपयेन्तं भ्रमणं केचिदूचिरे । 


चक्रवर्तनिका"संज्ञावेतौ' दल्यविदां मते ॥ ७३५ 
॥ इत्यूध्वेमण्डकिनौ" ॥ २२ ॥ 





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3, 5. 


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तावेव पाश्वेविन्यस्ती 'पताकाकारमागतौ । 
15 अन्योन्याभिखुखौ सन्तो प्वेमण्डलिनौ मतौ ॥ ७३६ 
आविद्धभ्रामितखजौ केचिदाहः खपाश्वयोः । 
कक्चावर्तनिकेऽन्ये तौ चल्यज्ञाः संप्रचक्षते ॥ ७३७ 
इति पाश्व॑मण्डलिनो ॥ २२॥ 
~ 


हंसपक्चावरारो वा हृदयक्षेचमागतौ । 
%  युगषत्करणे कृत्वोद्रेष्टितं वापवेष्टितम्‌ ॥ ७३८ 
वक्षसः खखपाश्वेस्थौ भ्रान्त्वा मण्डलवत्‌ कमात्‌ । 
वक्षःस्थौ वा कमादेतौ उरोमण्डलिनौ मतौ । 


न 





उरोवर्तनिके त्वेतो चत्यविद्धिः प्रकीर्तितौ ॥ ७३९ 
| इत्युरोमण्डलिनो ॥ २४॥ 
% अभ्यासात्‌ युगपद्वेति वक्षस्युत्तानितः करः । 
एकोऽन्यः प्रखतः पाश्वं तयोर्वक्षःस्थितः करः ॥ ७४० 
व्यावर्तितेनारुपद्मी भवन्‌ पाश्वे बजन्‌ करः । 
मण्डलाकरतिरन्यश्चोद्धे[शि]तिन प्रसारितः ॥ ७४१ 


-- 


1 8५ हस्तति° । 2 ^50 °वर्तिनका । 3 +४५ एतोन । 4 49५ गिभौ । 5 48५ 
पताकार” । | 








भुष्टिकस्वस्तिकादयः ] ० र० को०~उद्टास ९, परीक्षण र ६३ 


खपाश्वेऽरालतां धराप्तो हृदयमण्डलाकरतिः । | 
प्राभ्ुयादिति संपो क्तावुरःपाश्वोदध्‌ मण्डलो ॥ ७४२ 
इत्युरःशपा्वाधमण्डलौ ॥ २५ ॥ 


विधाय कमतो हस्तावराटमरपद्टवौ' | 
रेचितः खस्तिकाकारौ क्रिये[ते] खटकासुखौ ॥ ७४३ 
अथवा शिखरौ सुष्टी कपित्थौ वा सुहुखेहः । 


खस्तिकाकृतितां नीतौ सुशिकखस्तिकौ करौ ॥ अदे 
इति मष्िकस्वस्तिकौ ॥ २६ ॥ 


नैः 

वयावर्तनक्रियोपेतावशछिष्टखस्तिको करौ । 
मिथः पराञ्युखी भूय यौ गतौ पद्मकोराताम्‌ ॥ ७६९ 10 
नलिनीपद्यकोरौ तौ केचिट्टुक्ष्मान्यथाजयुः । 
अन्योन्याभिसुखौ श्छिष्टमणिवन्धौ पृथग यदा ॥ ७४दे 
पद्मकोरौ प्रकुर्वीत व्याव्रत्तपरिवर्तने । | 
नलिनीपद्यकोरौ तावथवा पदयकोरायोः ॥ ७४७ 
 व्याश्रत्तिपरिघ्र्तिभ्यासुपजानुगतेरिमो । 15 
यद्रा विवर्तितौ पद्मकोशौ स्यातामिमौो पुनः । 
स्कन्धयोः स्तनयोः पाश्वे जाचनोरपि तत्वतः ॥ ७४८ 

इति नलिनीपडकोशौ ॥ २७ ॥ 


उद्वेशितक्रियौ वक्लोदेरास्थावरुपल्वो । 
ततः स्कन्धान्तिक प्राप्य प्रस्थितावलपद्मकौ ॥ ७४९ २0 
॥ इत्यलपद्यो ॥ २८ ॥ 
नैः 


ऊर्ध्वप्रसारितौ स्कन्धाभिखखौ चलदङ्कली । 


विच्रत्तावलपदमी चाबुल्वणौ भणितौ परुतौ ॥ ७५० 
इत्युल्वणौ ॥ २९ ॥ 


लताख्यौ वलितौ ज्ञेयो खस्तिकीकृतकपरौ । 6 
अथ सूरिं विचृत्तो तौ खुटिकसवस्तिको मतौ ॥ ७५१ 
अथवाऽन्योन्यलग्राग्रावृ्ध्वगौ नश्रङूपेरौ । 

पृष्ठतः खटकावक्रो वलितौ गदितो करौ ॥ ७५२ 


इति वकितौ ॥ ३० ॥ 


गैः 


1 ^80 शप्राक्तो । 2 ^80 उत्तर । 3 ^0 छां । 














10 


६७ 


20 . 


20 


30 


त° र० को०~-उद्छास ९१, परीक्षण र 


वलितौ प्व चापि रीषेणि खितं विदुः । 
अपरे चातुरस्रेण शिरःस्थावचलौ विदु; ॥ 
अपरे खटकावक्रो शिरः प्राप्य ₹हानैः रानैः। 


अन्योऽन्यस्य विलभ्राग्रौ ललितौ संचचश्षिरे ॥ 
इति खुलितो ॥ ३१ ॥ 


नैः 
वामदक्षिणभागख्धौ वरदामयदौ कसे । 
-आराटौ कटिपाश्वस्थौ कथितो वरदाभय ॥ 
इति वरदाभयो ॥ २२ ॥ 


द्वारिदादेते संप्रोक्ताः समासात्‌ जलयहस्तकाः । 
एते चले कमेणापि प्रथोज्या इति संमतिः ॥ 
व्युत्कमेण प्रयोगेऽपि न दोषो खुनिदासनात्‌ । 
अङीतिभिलिताः सर्वे चिविधा अपि हस्तकाः ॥ 
इह कथिद्धिपश्ियन्नििनोति करानिह । 
चतुःषष्टिमितां( १ "तान्‌ )तन्नो विचारपदवीमियात्‌ ॥ 
यतो नाटीकते मानं खुनिमागोत्परिच्युतम्‌ । 
तथा हि भरताचार्थैः सप्तषष्टिरुदीरिताः ॥ 
तन्मता सप्चषष्टिस्तान्‌ रल्नाकरक्रदभ्यधात्‌ । 
तर्मतस्यापकर्वेण चतुःषष्टिमिताः परैः ॥ 

उक्ता गवेष्यमाणे यं तद्राचोयुक्िजम्बुकी । 
विचारसिह भूतेव न 'तिष्टति पदात्पदम्‌ ॥ 


तथा हि योक्ता युक्त्युत्था विदोषणविरोष्यता । 


करयोर्विपरकीणोद्या न तदा"चायसंमतम्‌ ॥ 
यतः [कर]पथक्त्वे न तेषासुदेराटक्ष्मणी । 
सुनिनैव कृते तन्नो खुवचं यददो यथा ॥ 
नीलसुत्पलमिवयेष दृष्टान्तो विषमः खल । 
यतोऽत्रायुतसंबन्धः प्रायो गुणिगणाश्रयः ॥ 
द्र्ययोस्तच्र संबन्धो युतसिद्धः स्तो वुधैः । 


 अन्योन्यनिरपेक्षेषु खस्तिकादेषु कथ्यताम्‌ ॥ 


मह्योरिव को स्यातां कयोस्तच्र विरोषणम्‌ । 
भिन्नगामित्वमनयोने समानमिदेष्यते ॥ 


[ टखखितादयः 


५५५२ 


(५ दै 


(५५७५ 


५६० 


७द९ 


७द२्‌ 


७द२ 


9दे्े 


७६५ 


दद 


` 14० च्ेक्षः। ०० गसिभूते०। 8 ०भिष्टति। 4 ४० व्दावायसः?। 5 ६४० पुक्त्वेन। 








अञ्जनादयः ] नर ° ₹० को०-उदल्लास १, परीक्षण १ ६५ 


विदोष्य नानुयाल्यन्यमजुयाति विरोषणम्‌ । 

यथोत्पलं तदेवापि रक्तादिशुणयोगतः ॥ ७६७ 
विदोष्यते तथा नीरं न कचिदुरटयते बुधैः" । 

एकादराविकारेऽपि यदि ते स्यादनन्यता ॥' ७६८ 
न मेदः कल्प्यतां विदन्‌ पताकत्रिपताकयोः । 5 
कचित्किचिद भेदेऽपि" हस्तकानां परस्परम्‌ ॥ ७द९ 
देकयादामूलमेक्ये तु तव स्यादेकहस्तकः । 

तस्माचतुःषष्टिरिति संतोष्टव्यं विपश्चिता ॥ ७9० 
सप्तषष्टिरितीय या संख्याचार्थैः प्रदरा । 

नैव सा नियता यस्मान्नादष्टाथांय हस्तकाः ॥ ७७१10 
कविः तु दृ्टार्थसंपत्त्यै लोकयुक्तिमवेक््य च । 

यथाच्लोभं प्रकर्प्याः स्यू रसालुगतिकाः कराः ॥ ७७२ 
प्रयोगः पूर्वमेवोक्तः परि भाषापरीक्चणे । 

अभिनेयवरादेते सर्वेऽभिनयहस्तकाः ॥ ७७३ 


नः 
नरिविधा अपि विज्ञेया दत्ययुक्ता युतादिकाः । 15 
आनन्लयादभिनेयानां सन्दयनन्ताश्च ते यथा । 
अञ्जनश्न्द्रक्ान्तञथ जयन्तश्चेति नामभिः ॥ ७9 


ललितं वक्षसः क्षेत्र कपोतं कण्देदागम्‌ । 
संदंहाबिधिनैवं स्यादञ्जनो नाम हस्तकः ॥ ७.७५ 
॥ इत्यञ्जनः ॥ १ ॥ 20 


नैः 
अधचन्द्रं करं कृत्वा ततो मकरमाचरेत्‌ । 
हकास्यं दण्डपक्षौ च जालदेराललारयोः । 
चतुर्भिैस्तकैः परोक्तशचन्द्रकान्ताभिधः करः ॥ ७७६ 
॥ इति चन्द्रकान्तः ॥ २ ॥ 


नैः 
वामे विधाय मकरं दक्षिणे वाधचन्द्रकम्‌ । | % 
भ्रामयित्वा समं कुयात्‌ पताकं दक्ष पा््वगम्‌ । 
चरिपताकं तथा स्कन्धे जयन्तो हस्तको भवेत्‌ ॥ ७9७ 
॥ इति जयन्तः ॥ ३ ॥ 
नैः 


1 480 बुधः । 2 450 °तां । 3 ^50 'दलोदपिः । 
९ चृ० रज्र 





द न° र० को०-उल्लाख ९, परीक्षण १ [ वक्षः स्तनौ च 


एवमन्येऽपि विज्ञेयाः खवुद्धथा चल्यक्रोविदैः ॥ ७.५८ 
॥ इति हस्तप्रकरणम्‌ ॥ 


| अथ वक्षः | | 
पश्चधा सममासुम्नं निखेभ्रं च प्रकभ्पितम्‌ । 
£ उद्वाहित च विज्ञेय वक्षस्तद्युक्ष्म कथ्यते ॥ ५.७९ 


ससौष्टवं समं ज्ञेय चतुरसराङ्कसंभ्रयम्‌ । 
प्रकृतिस्थमिदं वक्षः खभावाभिनये मतम्‌ ॥ ७८० 
॥ इति समम्‌॥ १ ॥ 
न 


आम्र दिधि निन्नं वक्षः स्यादर्वरोकयोः। 
10 व्याधौ विषादे मृच्छोमीलज्ञादौ संभ्रमेऽपि च । 
रीतहृच्छल्ययोश्चैव संपोक्तं भरतादिभिः ॥ ७८१ 
॥ इत्याभुस्म्‌ ॥ २॥ . 


निन्नप्षटं च निसुभ्रं बन्धुरं 'स्तन्धमयप्युरः । 
गर्वोत्सिके पटर्षोक्तो स्तम्मे विस्मयवीक्षणे । ॑ 
15 सत्यवाक्ये तथा माने प्रयोज्यं त्यकोविदेः ॥ ७८२ 
॥ इति निभुञ्चम्‌ ॥ ३॥ | 


अजस्रम्‌ दरं खल्ेपैः कम्पितं यत्पकम्पितम्‌ । 
कामहासश्रमश्वासहिका"दौ रोदनेऽपिच॥ ७८३ 
॥ इति प्रकस्पितम्‌ ॥ ४ ॥ 


० सरलोतिक्षप्तमाक्रम्पयुक्तुद्राहितं मतम्‌।  . ` 
उचतङ्गालोकने जम्भा दीर्घोच्छासादिके तथा ॥ , ७८ 


॥ इत्युद्राहितम्‌ ॥ ५॥ 
॥ इति पञ्चधा वक्षः ॥ 


[अथ स्तनौ । ] 
% उच्चावापाण्डूरौ इयामौ मनापी(सपीनौ)लोलितौ ' मनाक्‌ । 


सङ्कचद्वदनौ चेति स्तनौ[तु] षट्‌ प्रकीर्तितौ । 
एतौ रसेषु भावेषु यथोचिययं प्रयोजयेत्‌ ॥ | ७८५ 


= - ~ 


॥ 


1 8 ब्य; ¢ वक््यमूट्ध । थ 80 बर । 3 ४५ स्तम्भविस्मय? । 4 10 °हिष्का । 
8 80 जुभा । 6 ^+56 इयामामनाप 


। 7 ५80 ग्दृन्नो । 8 480 बोर । 








पाश्वं करी च] न° र० को०-उल्कास ९, परीक्षण ? ६9 


[ अथ पाशवम्‌ । ] 
` उन्नतं च नतं चैव प्रसारितविवर्तिते । 
तथापखतमित्युक्तं पाश्वे" पश्चविधं वुधैः ॥ ७८६ 


नितम्बां ससुजैव्येक्तखुन्नतेसन्नतं मतम्‌ । ञः] 
नियोञ्यं नारके तज्ज्ञेरपसपणकर्मणि ॥ +. ७८७5 
॥ इति उन्नतम्‌ ॥ १॥ ` 


भैः 
नतवबाहूनितम्बां खं नतं स्यादुपस्पणे ॥ 4. ७८८ ` 
॥ इति नतम्‌ ॥ २॥ 
नः 


प्रसारितं तू भयतो "विस्तारात्‌ स्यान्ख॒दादिषु ॥ ७८९ 
॥ इति प्रसारितम्‌ ॥ ३॥ 10 


विव्तिकनरिकं पाश्च विवतितं “विवर्तनात्‌ ॥ ७९० 
॥ इ ति विवर्तितम्‌ ॥ ४ ॥ 


1 भवेदपखतं पार्श्व विवरतिंतविवर्तनात्‌ । 
1 निवर्तने प्रयोगोऽस्य चल विद्धिश्चिकीर्षितः । 
। प्रयोज्यमेतन्नाय्ये तु पराच्रत्तौ नटस्य तु} _ ७९१5 
॥ इत्यपखतम्‌ ॥ ५॥ | 
॥ इति पञ्चविधं पा्वैम्‌ ॥ 


[ अथ कटी । ] 
कटी पश्चविधा प्रोक्ता विच्तो द्राहिता तथा । | 
( छिन्ना च कम्पिता चेति रेचितेलयथ' लक्षणम्‌ ॥ = ` ७९२१ 


विदधाति कटीं यां तु उयगः प्रयगाननः । 
विवत्तितामभिशखखीं विच्रत्ता सा विवर्तने ॥ ` : ७९३ 
॥ इति विचरन्ता ॥ १ ॥ | 2 


` 10 पार्भ्वा । 8 ५० नितरवोस० । 3 ^०५ गतारास्यान्मदादिष । द स र ज.५ °स्तारास्यान्मदादिषु । ५ सं. र. अ. ७ 
च्छो. ३०५ प्रसारितं तूभयतो विस्तारात्‌ स्यान्मुदादिषु । ¢ च 15 स्तारे स्यान्मु? 
( ^. 8-8 ) (20096 13० ना. शा. (0 8-8 ) अ, १०, च्छो. १४ आयामनादुभयतः 
पाश्वैयोः स्यात्‌ प्रसारितम्‌ । ९०१ छो. १६ प्रसारितं प्रहषीदो । 4 480 भतितवि° । 
5 490 “नद्धाः । 6 ^ त्यत । 7 ^70 विवर्त । 4 | "कना्ः२ * 














६८ न° र० को०~उद्ास ९, परीक्षण ? [ चरणाः 


सोद्राहिता कटी ज्ञेया रातेः पाश्वेद्रयेन या । 
चलता रो भने खीणां पीनाङ्गानां गताविव ॥ ७९ 
॥ इत्युद्धाहिता ॥ २ ॥ 


मध्यस्य वलनाच्छिन्ना पात्रे तियञ्ुखे कटी । 
5 व्यावृत्तपरक्षणे चैषा व्यायामे संभ्रमे तथा ॥ ७९५ 
॥ इति छिन्ना ॥ २॥ 


रीर गतागतैयुक्ता पाश्वंयोः कम्पिता कटी । 
खज्ञवामनकुव्जानां गमने सा प्रयुज्यते ॥ ७९द 
॥ इति कम्पिता ॥ ४॥ 


10 सर्वदिष्षु भ्रमणतो रेचिता भ्रमणे कटी ॥ ७९७ 
॥ इति रेचिता ॥ ५ ॥ 
॥ इति कटी ॥ 


[ अथ चरणः । ] 


समोऽञ्ि'तः कुञ्चित सूच्यग्रतलसश्चरः । 

18 उद्धदितख्नाटितश्च घटितोत्सेधसंज्ञिकः ॥ ७९८ 
चद्धितो मितश्च स्यादग्रगः पाष्णिगस्तथा । 
"पाश्वेगश्चरणो ज्ञेयख्रयोदराविधः स्फुटः ॥ ७९२९ 





=+ क ऋदु क नकन्ये 4. 
जः ऊर ए च 
« क 
= १ 


क --कन्ो-- 
(न = ड जे 






र 
= 


समः खभावाभिनये ख भावावस्थितो भवेत्‌ । 
चलोऽसौ रेचके प्रोक्तः ख भावे च स्थिरो मतः ॥ ८०० 


%0 ॥ इति समः ॥ १॥ 


~+ "कक 
कुक्करः कन = 
+ # 177) 
~ > 3 = ~ 4 
~ = 3. 


न + --- ~ ++ 


नः 
अङ्कल्यः परखता यस्य पारणि भूमौ व्यवस्थितः । 
उर्क्षिप्ाग्रतलश्चैव चरणोऽचि'तसंज्ञितः । 


पादाहतिविधो स स्यान्नानाश्रमरिकादिषु ॥ ८०१ 
॥ इत्यञ्चितः ॥ २ ॥ 


पष [ज क = 
~ व 
\ ~ +न =": - च - * = क 
य ~ ब ~" ~ य न नगर "~: ष्कः 
- = ---- ~~ न~ 


1 80 °म्रोचितः । 2 ५8० पष्वगः । ग सं. र. अ. ७ शो, ३१४ पाश्वगः । 3 ^+80 


°क्ि्षातख \ ण सै. र. अ. ७ छो. ३९६ खसुरिक्चपताग्रतखः \ ५ ५8५ °9ोवितसं \ 





दतः 
न करः 


व {न 


कुश्चितादयः | न° ₹० को०-उल्ास ९, परीक्षण १ ६९ 
आङशष्य मध्ये ' तुत्क्लिप्तपाष्णिः सङ्कचिताङ्कलिः । । 
कुःितोऽयमतिक्रान्तकमे तुङ्गस्य च ग्रहे ॥ ८०२ | 

॥ इति कुश्चितः ॥ २॥ | ॥ 
वामः समः परः पथ्व्यामङ्गष्टाग्रेण संस्थितः । ॥ 
उर्क्ित्ेतर भागोऽसौ सूची नूपुरबन्धने ॥ ८०३७ | 

॥ इति सूची ॥ ४ ॥ | 

नैः &। 

१ ( 

अङ्गः प्रखतो यस्याङ्गल्यस्तु न्यश्चितास्तथा । | 
उत्िक्षघ्रा तु भवेत्‌ पाष्णिः पादोऽग्रतलसश्चरः ॥ ८०४ 
रेचके श्रमणे भूमिताडने स्थानपीडने । | 
कदने प्रेरणे भूमिस्थितस्य चाप सारणे ॥ ८०५10 


॥ इत्यग्रतलछ सरः ॥ ५ ॥ 


स्थित्वा पादाग्रतो भूम्यां सकृद्वा बहुरोऽपि वा । 
पार्णिर्निपात्यते स स्यात्‌ पाद उद्धटिताभिधः॥ ८०६ 
॥ इत्युद्धद्ितः ॥ ६ ॥ 


आपीड्य पाणिना पृथ्वीं तामेवाग्रेण हन्ति यः। 16 
त्राटितः चरणः स स्यात्‌ कर्तव्यः क्रोधगर्वयोः ॥ ८०७ 
॥ इति जरितः ॥ ७ ॥ 


घद्टयन्नग्रपार््णिभ्यां करमादुवीं सुहसेहुः । 
ताडने विनियुक्तोऽय घटितोत्सेधकारकः ॥ ८०८ 
॥ इति घरटितोत्सेधः ॥ ८ ॥ 20 


घटयन्‌ पाष्णिना भूमि घटितः खल्पनोदने । 
॥ इति घट्टितः ॥ ९॥ 


तिरश्चीनतखेनोवीं मदैयन्‌ मर्दितो भवेत्‌ ॥ ८०९ 
॥ इति मर्हिंतः ॥ १० ॥ 


नैः 


1 ४8 मध्ये मुर्क्षिः ^ मध्ये मुतक्षिः ० मध्ये युत्श्चि {1116 ९०१८९५४ ९8010 
४४ 8180 06 मध्ययु्क्षिः । 2 ^9 °स्यापयसारणे । 





७०. न° र० को -उल्लास १, परीक्षण २ | पत्यङ्गानि 


पङ्किलोव्यामग्रगः स्यादग्रतः रीघगत्वरः। 
 ॥ इत्य्रगः ॥ ९१ ॥ 


पाणिना पृष्ठतो गच्छन्‌ चरणः पार्षिणिगो मतः । 
॥ इति पाष्णिगः ॥ १२ ॥ 


नैः 
४ पाश्वे गच्छन्‌ पाश्वेगः स्यादथवा पार्वतः स्थितः॥ ८१० 
॥ इति पाश्वंगः ॥ १३ ॥ 
॥ इति जयोददा चरणाः ॥ 


` येनान्नायः षडङ्गः प्रकटित इतिकार्त्यतासंयुतोऽद्धा 
येनोचैः खामिना निजगुणनिभतं खीयराज्यं षडङ्धम्‌ । 
10 यो निलयं शाम्खुजायां चिखुवनमहितां ' न्यस्यति" खां बड 
तेनायं लक्षणोक्तो व्यरचि छपतिना' खलयव्गः” षडङ्कः ॥ ८११ 
इति श्रीराजाधिराज-श्ीकुम्भकण मीमहे नद्रेण विरचिते संगीतराजे षोडशसादख्यां 
. : संगीतमीमांसायां बू रत ]फोसे -भज्गोलासे अङ्गपरीक्षणं थमं समाकम्‌॥ 


प्रथमोह्छासे द्वितीयं परीक्षणम्‌ । 
185 `. ` [ ग्रयङ्खानि ] 
अथ प्रत्यङ्ग संपन्नः पत्यङ्गानां सखुचयम्‌ । ` 
प्रल्ङ्गीकरुत भूपालो वक्ति "लक्षणपूर्वकम्‌ ॥ १ 
प्रत्यङ्गानि स्कन्धो ग्रीवा बाह च पृरष्ठसुदरं च । ` 
` ऊरू जङ्घे चान्यौ मणिवन्धौ जानुनी चैव ॥ व ` भ 
%0 अ स्कन्धो | ] 
लोटितावुच्च्तौ सरस्तावेकोचौ कर्णलग्मङौ । 
नान्नैव व्यक्तलक््माणौ स्कन्धौ प्विधौ स्मृतौ ॥: ` ३ 


< .1 80 “नान्तं । 2 ^80 नसहितां । 3 ^0 न्यखति । 4 ४० षडङ्ग । 5 50 चृप- 

पत्तिना! \ 6 ^80 चत्यवगैषडङ्गः ! 7 ^+ 0०18 खमाप्तं ! 010 8 तिला 186 
सेमीतममोखायो चृत्यरत्वकोद्े ओगोपते अगपरेष्वण प्रथमे समाप्तम्‌ ॥ शुभे मवतु ॥ 
8 0708 प्ण) इति †० प्रथमम्‌ \ 0ण५ ९४१९७ उ अत अथ 6०, अ]०९५९ 38 
1 0 ४16 पाक्फल [भ( 01 ४16 वमनु ०, 8 86 प्रलयं । 9 ४० छक्षपूवैकम्‌ । 








ग्रीं ] चर° र० को०-उल्लाख ९, परीश्चणं २ ` ७१ 


नियुक्तो लोखिती तच्र इड्क्ाकचाद्य वादने । क्रा 


हास्ये बिटक्रते चये 
॥ न ॥ इति लोलितो ॥१॥ 


उच्क्ितीदहर्षगर्वथोः॥ ` णे 
॥ इति उच्छ्रितौ ॥ २ ॥ 5 


मदे दुःखे रमे स्रस्तौ, ० 11 1१7 1 


॥ इति सस्ती ॥ २ ॥ 


एकोचौ खुष्टिकन्तयोः । प्रहारः 
॥ इति एकोच्यौ ॥ ४ ॥ 


कार्णलम्नौ स्तः, शिरिराशछेषयोरपि ॥ 4.10 
॥ इति कणैटस्नो ॥ ५ ॥ 
॥ इति पञ्चधा स्कन्धो ॥ ५॥ 


| ग्रीवा | । नि 
समा निवृत्ता वलिता रेचिता कुिताच्विता । ` ` `` 
ज्या नतोन्नता चोक्ता ग्रीवा नवविधा चुधै[ः]।  _ ५ 


प्रक्रतिस्था समा ध्याने ज्पे कायै खभावजे॥ ६ 
॥ इति समा ॥ १॥ 


आभिसुख्याचनिवर्नेत या निवृत्तेति सोदिता । 
स्कन्ध भारे चाभिसुख्ये तथा चकितवीक्षणे ॥ ७ 
॥ इति निवृत्ता ॥ २॥ जं ०५ %0 


पार््वोन्सुखी तु या ग्रीवा विता सा निगद्यते । 


ग्रीवाभङ्के स्मर(१ क्र ोतेश्तायां भियस्य गुरुसंनिधौ ॥ ८ 
॥ इति विता ॥ ३ ॥ - 


ग्रीवोक्ता विधुतभ्राता (? न्ता) रेचिताङ्गादिमदैने । 
॥ इति रेचिता ॥ ४॥ >^. 26 


आकु्चिता कुश्चिता स्यात्‌ शीरष॑भारे खगोपने॥ ` [क = 
॥ इति कुञ्चिता ॥ ५॥ 


1 50 इुड्ुक्ताबादने । 2 ^ बुधे 20 बुधो । । | 








20 


न्र° र० को०~उल्ास ९, परीक्षण २ 
केशाकर्वेऽधेवीक्लायां लोलातिप्रखताशिता । 


॥ इत्यञ्चिता ॥ ६ ॥ 
नै 


त्या स्यात्पाश्वेगा खेदे पाश्वेदकस्कन्धभारयोः ॥ 
॥ इति अयसा ॥ ७ ॥ 


नः 
अवनस्रा नता कण्ठटालम्बेऽलङ्ारबन्धने । 
॥ इति नता ॥ ८ ॥ 


उन्नतोध्वगतोध्वीवलोके कण्टसथददानि ॥ 


॥ इत्युन्नताः ॥ ९ ॥ 
॥ इति नवधा भ्रीवा ॥ 
>< 


| बाहवः ] 
ऊध्वास्योऽधोसुखस्तिथगपविद्धः पसारितः। 
अशितो मण्डलगतिः खस्तिकोदिषितावथ ॥ 
प्छानुसारी चाविद्धः कुखितोत्सारितावपि । 
सरलान्दोकितौ न्रे बाहुः षोडराधोदितः' ॥ 


ऊध्वं व्रजन्‌ शिरोदेशादृध्वौस्यस्तुङ्गवीश्चणे । 
॥ इत्युरध्वास्यः ॥ १ ॥ 


आलिङ्गननिव भूष्छमधोवक्र इतीरितः। 


॥ इत्यधोवक्कः ॥ २॥ 


मिक ति्थकः पा््वोपसर्पीं स्यात्‌ ॥ 
॥ “इति तिर्यक्‌ ॥ ३। 


यो मण्डल इव श्रान्त्या वक्चःसेत्राहित्रजेत्‌ । 
सोऽपविद्ध इति ज्ञेयो गदायुद्धादिषु स्मरतः ॥ 


॥ इत्यपविद्धः ॥ ४॥ 
अनवरजन्नग्रदेर बाहुः पोक्तः प्रसारितः । 
वित्ियुक्छ पलपन ूलष्देषप्चनेऽपि च \\ 


५ इतति प्रखररेतः \\ ७५१ 
2 





[ बाहवः 


९१ 


९२ 


१३ 


१४ 


९५ 


९९ 


.1 80 'ताञ्च* । £ 450 शत्यन्नता । 3 ^55 “स्याघा । 4 50 श्डितं । 5 ५ 
01008 #० इति ४० श्युद्धादिषु । 





अच्चितादयः ] न° र० को०-उ्टास१, परीक्षण २ 


वक्लोदेकाच्किसि गत्वा वक्षःप्रयागतोऽखितः। 
खेदादौ विनियुक्तोऽयं, 


॥ इत्यञ्चितः ॥ ६ ॥ 
५. 


सर्वो अ्रमणाद्धजः ॥ १॥ 
उच्यते मण्डलगति; खदङ्गादिभ्रामणे स तु। 
॥ इति मण्डलगतिः ॥ ७॥ 


भ 
पाश्वेव्यवयासतो बाहोः खस्तिकः स्यादलभ्रयोः। 
उपस्थाने `रवेः कायः परीरम्मेऽभिवादने ॥ 
॥ इति स्वस्तिकः ॥ ८ ॥ 


मणिवन्धाद्धिनिःखलय पुनव्यौवृत्तिमाभितः' । 
उद्वेष्टितो भवेदाहुः सर्वंगवीद नादरे ॥ 
| | ॥ इत्युद्ेष्टितः ॥ ९॥ 


पृष्ठतो गमनात्‌ पृष्ठालुसारी बाहसच्यते । 
तुणाह्यणग्रहे स स्याद्‌ वीरिकाग्रहणेऽपि च ॥ 
॥ इति पृष्ठाचसारी ॥ १०॥ 


आविद्धोऽभ्यन्तराक्षिप्तः, 
॥ इत्याविद्धः ॥ ११ ॥ 


सूचीकुर्व्च करम्‌ | 
वक्रितः कुञ्चितः पाते प्रहारे भोजने तथा ॥ 


खद्धादिधारणे चास्य विनियोगः प्रकीर्तितः ॥ 
॥ इति कुञ्चितः ॥ १२॥ 


अन्यपाश्वोन्निजे पाश्वं बरजज्चत्सारितः स च । 


जनतोत्सारणे पोक्तः"“““““ “““ ॥ 
॥ इत्युत्सारितः ॥ १३ ॥ 


सरलः पाश्वंयोरूर््वमधस्ताच प्रसारितः । 
सपक्ानुक्रतौ माने भूस्थनिर्देदाने" कमात्‌ ॥ 


॥ इति सरलः ॥ १४॥ 
भः 


1 80 रवः । £ ^ १०]8 तः; । 3 80 7606९४० हाने । 


१० च ० ₹्‌9 


७२ 


१७ 


१८ 


१९ 


19 


११५ 
५5 । 


२३ 


25 


रै 





७8 च० र० को०-उल्ास ९, परीक्षण २  [ बतैना 


आन्दोितः स्यादन्वर्थः सविरखासगतौ मतः । 
॥ इति आन्दोकितः ॥ १५॥ 


किंचिद्रक्रीकरतो न्नः स्तुतौ माल्यस्य धारणे ॥ २५ 
॥ इति नस्रः ॥ १६॥ 


नः 
६ एतेषां विनियोगस्तु परिभाषापरीक्चणे । 
उक्तः क्ष्मापालनाथेन तत एव गवेष्यताम्‌ ॥ रदे 
॥ इति बाहवः ॥ | 
नैः 


[ वतेना । 1] 


न 0 


जायन्तेऽतंख्यरूपाः कमत इह रसोह्धासिवेचित्यतश्च । 
आवत्योवतनान्ना रसमनरुचिरा स्वे स्तेन) लास्यालुरूपा- 
स्ताभिैयप्रपश्वास्त्वभिनयचतुराः पाणयोऽनेकशाः स्युः ॥ २७ 
पताकाराज्योः पूवं छकतुण्डारपद्ययोः । 

15  बलैना खे(? ख )टकस्यापि पश्चान्म'करवतेना ॥ २८ 
उद्ध८( ? ऊर्वं )वतेनिकाविद्धवतेना रेचिताहया । 
नितम्बकेराबन्धाख्ये फल्युवर्तनिका ततः ॥ २९ 
कक्लावर्तनिकोरस्ये ¢! स्थ)वर्तना खड्वर्तना । 
पद्मवर्तनिका दण्डवतेना पल्ुवाभिधा ॥ ३० 

%0 ` ` बलिता माच्रपूवो च वर्तना परिवर्तना । 

| चतुर्विंातिरित्युक्ता वर्तना भटतण्ड़ना ॥ द» ३९ 
अथ कमाल्युक्षणसुच्यते- 
सन्यापसब्यव्यदयासाद्भान्तिरामणिबन्धतः। 


` ; क्रियते चेत्‌ पताकस्य सा पताकाख्यवर्तना ॥ ३२ ` 
% ॥ इति पताकावतेना ॥ १॥ 





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वि यिनि 


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तजेन्याद्यङ्खलीनां यदन्तरोद्रेष्टनं कमात्‌ । 
अवेष्ितक्रियापरवं सा प्रोक्तारालवर्तना ॥ ३३ 


॥ इत्यराटख वतना ॥ २॥ 
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अकवतैनाया वर्तनाः ] न° र० को०-उल्टास १, परीक्षण २ @५ 
छकतुण्डकरो चलन ;स्थाविद्धोऽधोसुख ¦ करतः । 





















ऊरुपृष्ठे व्तितश्चच्छुकतुण्डाख्यवर्तना ॥ इणे ॥ 

॥ इति शुकतुण्डाख्यवतेना ॥ २ ॥ १। 

अभ्यन्तरे कनिष्ठाया वर्तन्तेऽङ्कलयः कमात्‌ । | 

्यारृत्तिक्रियया यच्न साऽलपहववर्तना ॥ ३५२ ॥ 

॥ इत्यरुपट्ववतेना ॥ ४॥ ६ 

योनीभिस्ेच ॥ 

खटकासुख सव्यापसव्यतः । || 

मणिबन्धावधिभ्रान्तिः खटश्ास्चखवर्तना ॥ ३१ ॥ 

॥ इति खट कामुखवतेना ॥ ५ ॥ | | 

| ५ ॥ 

यदा तु मकरो हस्तः पुरस्तात्पाश्वेयोरपि । | 10 ॥ 

्यावतंते बहिश्चान्त्यस्तदा मकरवर्तना ॥ ३७ ८ 

॥ इति मकरवतेना ॥ £ ॥ ॥ 

नैः ॥ | 

ग(१ य )दोद्युतो खलयहस्तावृर््वदेरो तु वर्तिती । ~ `: ५ 

तदोध्व॑वर्तना नाम वर्तनाविद्धिरीरिता ॥ ३८ ¦ | 

॥ इत्युध्वैवतेनिका ॥ ७॥ 1 ॥ 

. । | 4 । | 1 ॥ 

अथापविद्धवत्‌ पाणी वर्तेते' चेद्धजौ ऋमात्‌ । ॥ 

आविद्धावन्तराक्षिघ्ती सा स्यादाविद्धवर्तना ॥ . ३९ || 

॥ इत्याविद्धवतेना ॥ < ॥ + ॥ 

> । 4 

हंसपश्चौ ¢ । 

खस्तिकाद्विच्युतौ हस्ती हंसपक्षौ दर तश्रमौ । न 1 

रेचितो चेद्रतनाभ्यां तदा रेचितवर्तना ॥ न ४००0 ॥ 

॥ इति रेचितवतेना ॥ ९ ॥ ॥ 

भः . ® 

। `“ मणिवन्धावधिभ्रान्तौ विशिष्टाङ्लिपह्छवौ। ` ` । 

नितम्बोक्तप्रकारेण वर्तित स्कन्धदेदायोः ॥ १ ॥ 

।  एुननितम्बदेदो तु पताकौ वतितौ कमात्‌! + ॥ 

` नितस्बवर्तना नाम ॥ > ; दे२% | 
। ॥ इति नितस्बचतैना ॥ १० ॥ 


नैः 
`“ 1 ५90 बतेते । 0 आविद्धवक्रयोः पाण्यो्तेते चेद्धजौ कमात्‌ 14111508. 
ख, रं. अ, ७9 शो, २४९ कटानिधि पु, (4 ०५७ । ~ क ` =~३ॐ$ „15 


७६ न° २० को० १ उदास १, परीक्षण २ [ केशवबन्धाया वतना 


केराबन्धे प्रकीर्तिता । 
विचिच्रवर्तनायोगात्‌ केरादेराद्विनिगेतौ । 
पुनश्च केादेरो च पय।येण विवर्तितौ । 


पताकावेव चेत्‌ सा तु केराबन्धाख्यवर्तना ॥ ४रे 
् ॥ इति कैशबन्धवतेना ॥ १९ ॥ 
- ध. 


यावृत््या वक्षसो भालं प्राप्य तत्पाश्वेमागतौ । 
ततो मण्डलवद्धान्दा प्रचालितख्जौ कर ॥ धेथे 
पताक चेद्धमेदृ्ध्वमण्डटलावेव कोविदैः । 
चक्रवर्तनिकेत्युक्ता फट्गु(१ फाल )वर्तनिकापि च ॥ दे५, 
10 ॥ इति फद्गु(? फा)वतेनिका ॥ १२॥ 
नै 


पाश्वमण्डलिनोः पाण्योर््रमणं खसपाश्वेयोः । 


ऋमादकैकपा्भ्वैव कक्चवर्तनिकां जगुः ॥ | ४६ 
॥ इति कक्षावतेना ॥ १२॥ 


उरोवर्तनिकां विद्यादुरोमण्डलिनोः क्रियाम्‌ । 
18 ` ` ॥ इत्युरोवतंनिका ॥ १४ ॥ 


एकः स्यात्‌ कुशचितो सुधि[:]खटकास्योऽञ्चितः पुरा(परः) । 2७ 

इति कीर्तिधरस्त्वाह खुशिकखस्तिकौ करो । | 

खङ्कवर्तनिकेयतन्नामधेय त्वकल्पयत्‌ ॥ । ४८ 
॥ इति खड वतेनिका ॥ १५ ॥ 


% पद्मको्ाभिधौ हस्तौ व्यावृ््यादिक्रियाचिती । 

` आश्िष्टौ खस्तिकक्षेत्रे व्याव्त्तिपरिवर्तितो ॥ ९ 
मिथः परादौ सन्तौ नलिनीपद्मकोराको । 
एतौ कीतिंधराचायोः पद्मवर्तनिकां जगुः ॥ „ ५० 


% खस्तिकौ कुशचितौ हस्तौ व्या्र्तिपरिवरतितौ । 
. :. मिथः पराञ्छखौ बद्धौ सैषा कमलवर्तना ॥ = ५१ 
॥ इति पद्मवतेना ॥ १६॥ 


नैः 


र --~--~ 
-------___ 
--- ----- 


1 ग एकस्याङुञ्चितो खष्टिः खरकास्योऽञ्चितः परः । कलानिधि ० सं. र. अ. ७ 
ग्छो. ३२४९ पृ. १०८ । | | 








दण्डवतेनाया बतेनाः ] च र० को०-उल्ास २, परीक्षण २ 


वक्षःक्षेत्रं ्रथलेको येन काटेन पाभ्वैतः । 
व्यावृत्त्या हंसपश्चाख्यस्तनेव परिवर्तितः ॥ 
प्रसारितखजोऽन्यस्तु तियेक्‌ पयोयतः पुनः । 
एवमङ्ान्तरेणापि क्रिया स्यादण्ड पक्षयोः । 
दण्डवर्तनिकामेनां भटहतण्ड्र भाषत ॥ 

॥ इति दण्डवर्तना ॥ १७॥ 


पताकी मणिबन्धस्थौ रििलो खस्तिकौ पुनः । 
कथितौ पट्ुवौ तौ हि ख्याता पटुववर्तना ॥ 


॥ इति पटववतेना ॥ १८ ॥ 
मैः 


ज्यावर्तितेन हस्तश्चेदलपल्यवरंसिना । 
खपाश्वं वक्षसः प्राप्य प्रसारितसुजो भ्रमात्‌ ॥ 
अराल दधदन्येन करणेन रयेत्‌ परः । 
तदानीमेव पाश्वे खमन्यो गच्छति पूर्ववत्‌ ॥ 
मण्डेन ततोऽप्येव पुरः पाश्वाद्धंमण्डलौ । 
तथा तेषां क्रिया सा स्यादधेमण्डलवर्तना ॥ 

॥ इत्यधमण्डलवतेना ॥ १९॥ 

नैः 


 उद्वे्ितेन निष्पन्नौ स्यातां चेदलपट्टवो । 
वक्षसः स्कन्धयोरूध्वै परसारितखजावुभो ॥ 
स्कन्धाभिसुखमाविद्धौ चलिताङ्कलिवीजनैः। 
अलपद्माभिधौ श्राहुघातवर्तनिकां' परे ॥ 
॥ इति घातवतेनिका ॥ २० ॥ 


एतावेवाचली सू्धक्षे्रगो लटिता मता । 


खटकास्यौ रिरोदेदचो लभ्राग्रौ तां परे जगुः ॥ 
॥ इति छलितवतेना ॥ २९ ॥ 


करू्परखस्तिकाकारवर्तनाद्रलिता मता । 
अन्ये व्याचक्षतेऽन्योन्यलप्राग्रौ खटकासुखो । 
ऊर्ध्वगौ पृष्ठमानीतक्ूपरौ वलितिति च ॥ 


॥ इति वछितवतेना ॥ २२॥ 
नैः 


५२ 


५३5 


५ 


10 


५७१ 
५५ दे 


(९.५ 18 


५८ 


(९ 20 


द० 


98 


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1 ^80 श्यंल्ये° । 2 ^ प्राह ₹:५९ सं. र. अ. ७ गो. २४९ पृ, १०९ । 3 ^80 


का पः २146 1014. 


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७८ चर° र० को०-उल्लास ९, परीक्षण २ [ गात्रवर्तिताया वर्तनः | 


व्यावर्तितोऽन्तर्गान्नं चेदलपह्वहस्तकः । 


परा्खोऽपविद्धः स्यात्‌ कथिता गाच्रवर्तिता ॥ ६२ 
॥ इति गा्रवर्तिता ॥ २३ ॥ 1 


गाच्रस्य प्रातिलोम्येन पाणिरुक्क्षप्य वर्तते। 


5 | अद्टुपल्वसंज्ञश्चेत्‌ प्रतिवर्तनिका तदा ॥ देर 
। ॥ इति प्रतिवतेनिका ॥ २४ ॥ 


अन्याश्च कथिताः सप्त वर्तना खलयवेदिभिः। 
वर्तना शिखरस्याद्या द्वितीया `तिलकस्य च ॥ दथ 
वर्तना नागबन्धः स्यात्‌ सा सिदसुखवर्तना । 

10  वैष्णव्येका तलसुखी ससन स्युः" कलराभिधा ! 


नाममात्रप्रसिद्धास्तास्तेरेव स्यु? : स्फुट ) "लक्षणाः ॥ ६५ 
॥ इति वतेनाः ॥ 


| षष्ठम्‌ । ] 
` जटर' सेव बोद्धव्यं षष्ठं तु जठरालुगम्‌ । 
15 अतो विसुच्य तत्‌ पृष्ठं जठरं क््यतेऽग्रतः ॥ दै 
॥ इति पृष्ठम्‌ ॥ > ^> > 


[ जठरम्‌ । | 
पूणे खट रिक्तपूणं क्षामं च जठरं स्छृतम्‌। = 
चतुद्धो तजर पणी ; ५ भवेत्‌॥ ६७ 
% याधिते तुन्दिे 
॥ इति पृणैम्‌ ॥ १॥ 


खट निं खमातुरे॥ ` | । 


किते च क्षुधात्ते स्यादातुरे जठराक्रलौ ॥ : ` =` :: दे८ 
वैतालश्रद्धिरित्यादि ! क {न 


2 : 5 ॥ इति खट्‌ ॥ २॥ 





\ ५९५ सेकः \ °. सखद्तप्ः ऋ. ननि. स. र. ॐ. ७ छ. २० पु. ९९० ४ 
रूरल ७. ४ ४७5 अररे, ५ पुषे त्‌. सरसोत्सपमवेतनभविवतति न्‌ 
4 तत्पृथर्वाच्ये जरर तूच्यतेऽधुन्‌ \ से. र. २. ७ छो. ३५३ \ 2 ५७० -निश्चेखम \ 


~ 








रिक्पूणम्‌ | मु० र० को०-उललास ९, परीक्षण २ ७९, 
रिक्तपूर्णमथोच्यते । 


॥ इति रिक्तपूणेम्‌ ॥ २ ॥ 
नैः 


श्वासरोगे 


तथा क्षाम नमनादुपजायते । 


जुम्भायां हास्यनिःश्वासरोदनादौ तदिष्यते ॥ ¦ ¦ ` ६९९ 
॥ इति क्षामम्‌ ॥ ४॥ 
॥ इति चतुद्धोदरम्‌ः ॥ १॥ 
मैः 


[ ऊरूः । ] 
चलितः कम्पितः स्तन्ध उद्रर्तितनिवर्तितौ । 
पश्चधोरस्तु वलितोऽन्तभेते जानुनि स्तः ॥ ७० 10 
नियोज्यः खेरगमने खीणां त 
॥ इति वलितः ॥ १॥ 
कम्पित उच्यते ॥ 


नतोन्नते सुहु; पाश्वे दधानोऽधमचड्कमे ॥ „ ७१ 
॥ इति कम्पितः ॥ २॥ 15 


निष्क्रियः स्तन्य इत्युक्तो विषादे साध्वसेऽपि सः । , 
॥ इति स्तन्धः ॥ २॥ प 


उद्भर्तितो सहः पार्ष्णि बहिरन्तश्च विक्षिपन्‌। ~ _ 


क्षिपन्‌ तथेवाग्रतले व्यायामे तच वै भवेत्‌ ॥ ७२ 
॥ इत्युद्र्तितः ॥ ४॥ %0 


निवर्तितोऽन्तर्म८गे)तया पाष्ण्यां स्यात्‌ संभ्रमे रमे] ७३ 1 


॥ इति निवर्तितः ॥ ५॥ 
॥ इति पञ्चधोरूः ॥ 


जङ्घा । | निष 
जङ्घा पश्चविधा क्षिप्ोद्राहिता परिवर्तिता । %5 
[ आवर्तिता नता चैव निःस्खछता च बहिगेता ॥ ७४ 
परावृत्ता तिरश्चीना कम्पितेयपराश्च ताः |] ध 


1480 प्रतिचतुरद्धादरम्‌ । 2 <€ 8 ?९86 10677 ॥16 एलफक्नण६ | 
४0 14218*8 814 {16 8441४10018] 7१९ 19018*8 86618 0 06 1018810 
{४ 15560@06 10660 && 800९6 





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9 प 


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८० ० २० को०-उद्टास १, परीक्षण २ 


पुनः पश्च दद्दोवं स्युः; क्षिप्रा विक्षेपिता बहिः । ७५ 
व्यायामे ताण्डवे प्रोक्तो- । | 
| ॥ इति क्षिप्ता ॥ १॥ 


॥ -द्राहिता चोध्वदेायुक्‌ । 

|| 5 आविद्धगमनादी स्यात्‌; 

॥ इत्युद्धाहिता ॥ २ ॥ 
नै 


क = य 


| जङ्घा तु परिवर्तिता । 
| प्रतीपगमने पुंसां ताण्डवे विनियुज्यते ॥ ७६ 
॥ ॥ इति परिवर्तिता ॥ ३॥ 9 


७ विपयासे चरणयोर्वामदश्षिणतः कृते । 15 
सुहरावर्तिता परोक्ता विदृषकपरिक्रमे ॥ ७७9 


॥ इत्यावतिता ॥ ४॥ 


नैर 
नता जङ्घा नमल्नालुगेतस्थानासनादिषु । 
॥ इति नता ॥ ५॥ 


नैः 
15 पुरःप्रसरणोपेता निःखता परिकीतिता ॥ ` ७८ 
॥ इति निःखता ॥ ६ ॥ 


चये प्रसारिता पाश्वे जङ्का परोक्ता बहिगेता । 
॥ इति बहिगेता ॥ ७॥ 


पश्चाद्‌ याता पराचृत्ता रूमिस्ते८स्थे)न च जाजुना । 
% दक्षेण सुरकार्ये स्याद्रामेन पितृकर्मणि ॥ ७९ 


॥ इति पराचरत्ता ॥ ८ ॥ 


क्षितिसिितबहिःपाश्वो तिरश्चीनासने स्थिता । 
॥ इति तिरश्चीना ॥ ९ ॥ 


नै 
कम्पिता कम्पनाद्धीतौ काय घधेरिकारवे ॥ ८० 
2६ ॥ इति कम्पिता ॥ १० ॥ 
॥ इति ददराधा जङ्घा ॥ 
1 





1 80 पश्चाद्‌ \ 2 ^ चता २५ कात 8३ पञ्चाद्रता \ स.र. अ. ७ न्छो दद) 











मणिबन्धः | च्र०° ₹० को०-उष्ास ९, परीक्षण २ 


[ मणिबन्धः । ] 
पश्चधा मणिबन्धः स्यात्‌ सम आकुखितश्चलः । 
निकुःशित्च भ्रमित ऋजुः सम इतीरितः । 
प्रतिग्रहे पुस्तकस्य धारणे परिकीतितः ॥ 

॥ इति समः ॥ १॥ 


आकुशितोऽन्त्निंन्नः स्यात्‌ प्रोक्तोऽपसरणे वुधैः । 
॥ इत्याङ्ञ्चितः ॥ २॥ 


निकुजाकुशिताभ्यासाचल आवाहने स्मृतः ॥ 
॥ इति चः ॥ ३॥ 


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बहि्नीतो निङुश्वः स्यात्‌ स दानाभयदानयोः । 
॥ इति निकः ॥ ४॥ 


नै 
भ्रमणाद्धमितः खड्दुरिकाभ्रमणादिषु ॥ 
॥ इति मितः ॥ ५॥ 
॥ इति पञ्चधा मणिबन्धः ॥ 
नेः 


[ अथ करभो | ] 


कर भो मलिनो खच्छावरुणौ कुितान्रज्‌ । 
इत्थमन्वर्थनामानौ कथितौ पञ्चधा वुषैः ॥ 
॥ इति करभौ ॥ 


जानु । | 
समं नतं च विवरतसुन्नतं चाध॑कुखितम्‌ । 
संहत कुितं चेति जान सप्तविधं स्षरतम्‌ । 


प्रकृतिस्थ समं जानु खभावावस्थितौ मतम्‌ ॥ 
॥ इति समम्‌ ॥ १॥ 


नतं महीगतं ज्ञेय जानु वा(पा)ते नमस्कृतौ । 
 ॥ इति नतम्‌ ॥ २॥ 


जानद्रन्दरं बहियातं वितं राशग)जरोहणे ॥ 


भ | ॥ इति विचतम्‌ ॥ २ ॥ 


११ चभ्रन्नर 


८१ 


८१ 


15 


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29 


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८२ न° र० को०-उल्ास १, परीक्षण ३ [ इत्य्धकञ्चितम्‌ 


स्तनदेरागतं जानृन्नतं रोलाधिरोहणम्‌ । 
॥ इत्युन्नतम्‌ ॥ ४॥ 


जान्वधेकुचितं ज्ञेयं नितम्बनमनंद्धधैः ॥ ८७ 
॥ इव्यधेकुञश्चितम्‌ ॥ ५॥ 


$ हीरोषेष्यासखु जानृक्त श्िष्टान्यजालु संहतम्‌ । 
॥ इति संहतम्‌ ॥ ६॥ 
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कुशितं जान टम्रोरुजङ्कमासनकर्मणि ॥ ८८ 
॥ इति कुञ्चितम्‌ ॥ ७॥ | 
॥ इति सप्तविधं जानु ॥ 


10 प्रलयङ्कमालिङ्खति यं सदैव साभ्राज्यलक्ष्मीरनमोदिकेव । 
तेनासुना राजवरेण राज्ञा प्रलयङ्गसंघः खुधियाभ्यधायि ॥ ८९ 
इति श्रीराजाधिराजश्रीकुम्भकर्णमही महेन्द्रेण विरचिते संगी तराजे षोडशसादख्यां 
सङ्गीतमीमांसायां चूयरन्रकोरे भङ्खो्ठासे प्रयङ्गपरीक्षणं द्वितीयं समाप्तम्‌" । 


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प्रथमोह्छासे ततीयं परीक्षणम्‌ 


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16 उपाङ्ग ङ्गे)यस्य शोभेते' चन्द्रगङ्के सदोज्वछे । 

1 सवोलवलेन महसा भ्राजमानं न॒मः दिवम्‌ ॥ . १ 
| ‡ | 

| [ उपाङ्गानि । | 

: दष्ट(१ शि )पुटताराञ्च कपोखो नासिकानिलः । 

॥ „ अधरो दशाना जिह्वा चिबुकं वदनं तथा ॥ २ 
|` % उपाङ्गानि द्राददोति रिरस्यङ्ान्तरेषु च । 

॥| पाष्णीगुल्फो तथाङ्गल्यः करयोः पादयोस्तले ॥ =: ३ 
| खुखरागञ्च करयोः प्रचाराः करणानि च । | 

|| कमणि पाणिष्षेत्राणि तेषां लक्षणसुच्यते ॥ ४ 
|॥| | | अथ टदष्िप्रकरणम्‌ । ] 

|| %  इष्टयल्िविधास्तच्र स्थायिजा रसजास्तथा । 


व्यभिचारिभवाश्चति तासां लक्षणसुच्यते ॥ ५ 
1 ४0 40] समाप्तं । 2 ^ इोभाते । 


॥4 





4 ए 

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ल्िग्धा ] नर र० को०~उछ्टास १, परीक्षण ३ ८३ 


सिग्धा हृ तथा दीना ऋद्धा दभ्रा भयान्विता । 

जुगुष्सिता बिस्मितेति स्थायिजा अषटदटयः ॥ दे 
कान्ता हास्या च करुणा रौद्री बीरा भयानि(१न)का । 

बीभत्सा चाद्धूतेलष्टो द्रष्टव्या रसदश्टयः ॥ | ७ 
छान्या च मलिना आ्राता (न्ता)लल्िता राङ्किता तथा । 5 
सुकुला चाधेसुकुला ग्खाना जिया च कुशिता ॥ 
वितरकिंलाभितप्ना च विषण्णा ललिताभिधा ॥ ८ 
आकेकरा विरोका च विभ्रान्ता विरुता तथा । 

अस्ता च मदिरेयेता विदातिव्येभिचारिजाः॥ ९, 
व्यभिचारिषु सर्वेषु यथासां विंरातेरंराम्‌ । 10 
विनियोगस्तथा सम्यग्वक्ष्यामः पूर्वराखतः ॥ १० 
षटचिरान्मिखिताः सवा मवन्ति त्रिविधा [ अपि] | 
रसभावजयोहे योने विरोषोऽस्ति कि त्विह 

भावजायामनद्धूता भावा रल्यादयश्च ते ॥ ११ 


सिग्धा बिकारिनी सिग्धमधुरा चतुरे श्रवौ। ` 18 
चिभ्रती साभिलाषोद्यदेकशरस्तु कटाक्षिणी ॥ १२. 
॥ इति सिग्धा ॥ १॥ 


हृष निमेषिणी किञ्ित्स्मिता कुशचितचश्चला । 
अन्तविंरात्तारका च फुल्गह्छा स्ता बुधैः ॥ १३ 
॥ इति हृष्टा ॥ २॥ 20 


दीनाद्धेपतितो्ध्वस्थपुटेषद्र तारका । 
मन्दसश्चारिणी बाष्पव्याकुला सद्धिरिष्यते ॥ ४ 
॥ इति दीना ॥ २॥ 


द्धा स्थिरोडृत्तपुटा किचित्तरलतारका । 
भ्रकुटी कुटिला रूश्चा दष्टेविद्धरुदाहता ॥ ` १५. 2 
॥ इति कुद्धा ॥ ४ ॥ 


प्रा विकसिता सत्वसुद्धिरन्तीव सुस्थिरा ॥ १६ 
॥ इति दस्ता ॥ ५॥ 














15 


20 


25 


चर ° र० को०-उष्टास ९, परीश्चषण ३ [ जगुण्सिता 


निगंच्छदिव यन्मध्यं चासविक्िप्रतारका । 

विसर्फारितोभयपुटा दष्िरुक्ता भयान्विता ॥ १७ 
॥ इति भयान्विता ॥ ६॥ 

ज॒ग॒प्सिताऽदरयद्टावुद्धिभ्रा संकुचत्पुटा । 

मीखत्कनीनिका स्पश्ालोकिनी परिकीर्तिता ॥ १८ 
॥ इति जुगुष्सिता ॥ ७॥ 


विस्मिता दृरविरफारितारका च `विकारिनी । 
निश्च खोद्त्ततारा च पुटद्भन्द्रा निमेषिणी ॥ १९ 
॥ इति विस्मिता ॥ ८ ॥ 


इत्यष्टौ दृष्टयः प्रोक्ताः कमाद्रःलयादि भावजा, । | 

रसद्टय एताः स्यु भोवेरत्युल्बणेः स्फुटाः ॥ २० 

सभक्षेपकटाक्ना स्यात्‌ सविकाशातिनिर्मला । 

आपिबन्तीव दृदयं या कान्ता कामविवधेनी ॥ २१ 

यद्भतागतविश्रान्तिवेचिच्येण विवर्तनम्‌ । 

तारकायाः कलाभिज्ञास्तं कटाक परचक्षते ॥ २२ 
॥ इति कान्ता ॥ १॥ 

आङुशितपुटा मन्दमध्यतीव्रतया कमात्‌ । 

मध्ये किचित्‌ समाविष्टविचिच्रभ्रान्ततारका । 

न्रिविधप्रक्रतेहस्या द्िरविस्मापने मता ॥ २३ 
॥ इति हास्या ॥ २॥ 


नैः 


नासाग्रा्गता सास्रा किञिनिश्चलतारका। 


पतितोर्ध्वपुटा रोकात्‌ करुणा दष्टिरिष्यते ॥ ` २४ 
॥ इति करुणा ॥ ३ ॥ 

रूक्लोग्रा श्रुककटी भीमा लोहिता स्तन्धतारका । 

चश्चलद्धिपुटी रौद्री दष्टिदेटिविदोदिता ॥ २५ 
॥ इति रौद्री ॥ ४॥ 


1 ४0 विशाकरिनी । 2 0 “इत्यादि । 3 480 प्रचक्ष्यते । 4 ^ सास्रः । 








भयानकः | ° र० को०-उदल्वास २१, परीक्षण २ 


वीरा संकुचितापाङ्घा दीपा च समतारका । 
अचश्चला विकसिता गम्भीरा धीरसंमता ॥ 
गाम्मीयमाधुयैविलासरो भा- 
'स्थर्यौजओदायसुखानरोषान्‌ । 
विच्रण्वती सन्षविरोषमेदान्‌ 
प्रसादलालिलयसुखेने सख्यान्‌ ॥ 
॥ इति बीरा ॥ ५॥ 


अलयन्तचश्चलो दुत्ततारोद्रत्तपुटा जडा । 


दइयमभिमिवार्श्षटरा याति भीत्या भयानका ॥ 
॥ इति भयानका ॥ ६ ॥ 


मीलल्योलचलत्पक्ष्मा चलन्तारा मिलत्पुटौ । 


अपाङ्खो संखता दद्योद्रेगाद्ीभत्सिका स्म्रता ।॥ 
॥ इति बीभत्सा ॥ ७॥ 
नैः 


अन्तवेहिगोमिकनीनिकेषन्मिलत्पटापाङ्विकादिनी च । ` 
प्रसन्नद्यह्कां राविद्युद्धधिष्णाद्धता स्मरता दष्टिरियं पुराणः ॥ 
॥ इत्यद्भता ॥ ८ ॥ 


खछङ्ारादिरसेष्वि्छा = कऋमादिमाः॥ 


॥ इत्यष्टौ रसदृ्टयः ॥ 


अथ विंदातिरुच्यन्ते व्यभिचारिसमाश्रयाः । 

निष्कम्पा मलिनापाङ्गा धूसरा पुटतारयोः । 

छल्यप्रकाशिनी दष्टः छन्या शन्यविलोकिनी ॥ 
॥ इति शुन्या ॥ १॥ 


मणिना किश्चदाकुश्चत्पुटा पक्ष्माश्रमन्थरा । 

व्याब्रलय तारकापाङ ददयाद्रेवण्ये रांसिनी ॥ 

दृष्टिः स्याद्धिकरते खीणां दष्िविद्धिरुदाहता । 

विकरतं तद्ररोरूणां पियेण समयेऽपि यत्‌ 

प्रा्ेऽसंलपनं माना[द्‌]रोषाद्रेति विनिधितम्‌ ॥ ` 
॥ इति मणिना ॥ २॥ 


ता 


1 80 अचला । 2 ^ न्येर्योः । 3 ^86 °सेधिष् । 


२८ 


10 


२९ 


२०15 


३१ 


20 


३२८. 


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कणन नण "^ कु = =+ 


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<६ च ° र० को०-उ्टास १, परीक्षण २ 


अलसा निपतत्तारा स्रस्तापाज्ञा विलोकिनी । 


दूराद्‌ ग्खानोभयपुटा दृष्टिः श्रान्ता अमार्तिषु ॥ ` 
| ॥ इति श्रान्ता ॥ ३ ॥ 







न 
लज्िताऽन्योऽन्यतः रपषटपश्ष्माय्रा किथिदथ्रतः । 


5 . : मीलत्तारा विनघ्रोद्धुषुटा सापच्रपाभरे ॥ 
 ॥ इति खज्जिता ॥ ४॥ 






चयामृढे वाच्यता तियेगसुह्ुश्चकिततारका । 
: नातिस्थिरा निचरत्ता पागीक्षणाहहिशन्सुखी । 
८ दाङ्कायां राङ्किता द्िनव्यविद्धिरुदाहता ॥ 
10 ॥ इति राङ्किता ॥ ५॥ 


पतितोर्ध्वपुटा दृष्टिः किञ्िन्मीलिततारका । 

-रफुरदाशछिष्ट पक्ष्माग्राप्यधोनीतकनीनिका ॥ 

विनम्नोर््वपुटा द्टिखेकठेति प्रकीर्तिता । 

निद्रायामियमानन्दे हृययोः स्परांगन्धयोः ॥ 
॥ इति मुकुखा ॥ ६ ॥ 


मीलिताधेपुटा किञिदरफुटाधकनीनिका । 
उक्ताधेखुकुला दृष्टिराह्ादे विनियुज्यते ॥ 
 ॥ इत्यधैमुकखा ॥ ७॥ 









15 






अन्तनिंधिष्टतारा या मलिना मन्दचारिणी । 

विछथज्रूपक्ष्मपुटा ग्लाना ग्लानौ नियोजिता । 

अपस्मारादिकेऽप्येषा संपोक्ता भरतादिभिः ॥ 
॥ इति गाना ॥ < ॥ 


किचित्कु्त्पुटा तिक्‌ रानैर्गदं विलोकिते । 
तियक् पतिततारा या जिद्यापाङ्गपटत्पुटा । 
% ..: जडतायामसूयायामालस्ये च नियुज्यते ॥ 
| ॥ इति जिह्मा ॥९॥ 


नै 





20 







1 ^5 चुरद्‌! । 






कुञ्चिता |] च ० २० को०-उद्टास १ „ परीक्षण २ ८७ 


। 

। 

| 
ईषत्कुशितपक्ष्माय्श्वपुटा वक्रतारका। ` | | 
तियेग्‌ निविष्टा दृष्टिः स्यात्‌ कुशितासूयितेऽपि सा । ॥ 
अनिष्टेऽथे व्यथायां च दुरारोके महस्यपि ॥ म . ४8 | 
॥ इति ऊु्चिता ॥ १० ॥ 





अधःसश्चारिणी तासेत्फुलोद्धान्तपुटापि च । 8 | 
वितकिता वित्ते सा विनियुक्ता मनीषिभिः ॥ फेण ॥ 
॥ इति वितर्किंता ॥ ११ ॥ . ॥ 


विलोकेतेऽसं भ्रान्ते संतप्रे हव तारके । १: ॥ 
व्यथाचरत्पुटोपेते यस्यां सोक्ताऽभितधिका । | 
उपतापेऽभिघाते च निर्वेदेऽपि नियुज्यते ॥ ४५0 | | 


॥ इत्यभितप्ता ॥ १२॥ 


स्तन्धतारानिमेषाद्या विस्तारितयपुटद्रया । ॥ 
विषण्णा पतितापाङ्गा विषादे विनियुज्यते ॥ णेदै | 
॥ इति विषण्णा ॥ १२ ॥ | 


 सथृक्षेपस्मितापाङ्के कुञ्चिता मधुरोन्सुखी । 16 | 
लिता लिते प्रोक्ता दषिर्मन्मथमन्थरा ॥ ` ४७ 
॥ इति रखुकिता ॥ १९४ ॥ 


ईषद्रकपुटापाङ्गा तिर्थगधेनिमेषिणी । 

नेच्ान्तरादन्यपथालोका उयस्तविवर्तिनी ॥ 9८ 
दृष्टिराकेकरा दूरालोके विच्छेदकर्मणि । | 20 
सापराधे प्रिये लेहविच्छेदेन यदीक्षणम्‌ । 


तद्रिच्छेदप्रेक्षितं स्याद्‌ दूरालोकेऽपि सा स्म्रता ॥ ४९ 
॥ इत्याकेकरा ॥ १५५ ॥ 


विकारिन्यनिमेषा च विकारितपुरद्रया । 
इतस्ततो भ्रान्ततारा विचोक्ा दष्िरिष्यते। ` 5 
ज्ञाने कोधे च विज्ञाने ग्वं उय्ावलोकने ॥ ५० 

॥ इति विरोका ॥ १६ ॥ 


ध अकि ~ = 8 । व प स~ क > 
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1 ^90 ख 9 सश्चृक्षेपसितान्विता खं. र. अ. ७ श्छो. ४१९। 





% ब. ---- ~ = श 








८८ 


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19 


18 


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० र० को०-उलास २, परीक्षण ३ 


विश्रान्ता कचिदश्रान्तमविश्चच्धविलोकिनी । 

चश्चलोत्फुलहतारा च विस्तीणो दष्टिरुच्यते । 

नियुक्ता विश्रमे वेगे संभ्रमे च मनीषिभिः ॥ 
॥ इति विश्रान्ता ॥ १७ ॥ 


पततः कमतो यस्याः स्तन्धविस्फुरितौ पुटौ । 
विष्धता चपले दुःखे तुन्मादादो च कोविदैः ॥ 
| ॥ इति विष्ुता ॥ १८ ॥ 


त्रा सोद्धमत्पटा रस्ता सोत्कम्पोत्फुलतारका ॥ 
॥ इति अस्ता ॥ १९. ॥ 


चिविधा मदिरा दध्िर्मय८ दोत्रेविध्यतः स्ष्ता । 
अधमे पसि संस्थस्तु मदस्तीत्रोऽधमो मतः ॥ 
अधः सञ्चारिणी त्र किशिद्‌दष्टकनीनिका । 
यत्नेऽप्यसिध्यदुन्मेषान्निमेषाद्‌ याधमे मदे ॥ 
मध्ये किंञिद्धमत्तारा किचित्कुञ्त्‌पुरद्रये । 
अनवस्थितसश्चारा मदिरा मध्यमे मद्‌ ॥ 

तरुणे क्लामनयना तथापाङ्विकारिनी । 


आधूर्णमानतारा तु मदिरा दृष्टिरिष्यते ॥ 
॥ इति जिविधा मदिरा ॥ २० ॥ 


नै 
> ५८५ द्यो लोकदष्िमागेखुपाभिताः । 
द्रि सन्तयनन्तास्तास्ताराश्रूुटकमणाम्‌ ॥ 
संद भौद्‌ ब्रह्मणाप्येताः प्रयकं वक्तुमक्तमाः । 
तत्प्रयोगप्रपश्चाथं भ्वादिकानधुना चवे ॥ 
॥ इति दष्िप्रकरणम्‌ ॥ 
नै 


[ भरः] 
सहजा पतितोत्क्लिप्रा रेचिता कुञ्चिता तथा । 
कुटी चतुरा चेति सप्तधा भ्वुः स्ष्ता वुधैः । 
ख भावात्‌ सहजा ज्ञेया भावेषु सरेष्वसो ॥ 
| ॥ इति सहजा ॥ १॥ 


[ विश्रान्ता 


५१ 


५ 


५२ 


५८ 


५९ 





पतिता ] च्र° २० को०-उछछछास ९, परीक्षण ३ ८९ 


अधोगता तु पतिता पयायेण सदैव वा । 

ज॒गुप्सासूययो रोषे हासे दर्षे च विस्मये । 

उत्क्षेपे च तथा घ्राणे पतेते त उमे खवौ ॥ ६१ 
॥ इति पतिता ॥ २॥ 


कमेण सह वोत्क्षेपादुल्क्षघ्ा' संमता' सताम्‌ ¢ 
खीभिर्हैलालीलयोभ्रेकोत्छषेष्या द्वयं चभिः। 
कोपे वितः श्रवणे दशोने च निजे तथा ॥ दै२ 


॥ इत्युत्क्षप्ता ॥ २॥ 
नैः 


एकैव चङितोत्क्षप्रा रेचिता कीर्तिता वुधैः ॥ दे३ 
॥ इति रेचिता ॥ ४॥ 10 


सद्धितीयैकिका वापि खदुभङ्िमनोहरा । 
निकुशचिताख्या श्रज्ञैया नियोगोऽस्याः प्रददर्यते । | 
मोहायिते कुटमिते विटासे किटकिश्ितेः ॥ देथ 

॥ इति कुञ्चिता ॥ ५॥ 


सा द्वितीया यदा मलादुल्क्षिपघ्ा खकुटी कथि ॥ दे५.15 
॥ इति श्चुकुटी ॥ ६ ॥ 

अल्पस्पन्दा सद्वितीयायता मन्थरचारिणी । 

चतुरा ललिते स्पशो युङ्गारे रुचिरेऽपि च ॥ ददै 


॥ इति चतरा ॥ ७ ॥ 
॥ इति सप्तधा भूः ॥ ‰0 


[ पटो । ¡ 
समो कुञ्चितौ प्रखतौ स्फुरितो च विवर्तितौ । 
निमेषितोन्मेषितौ च पिदहितौ च विताडितौ ॥ 2७ 
इत्येवं नवधा प्रोक्तौ पुटौ तद्यक्ष्म कथ्यते । 


खाभाविकौ समौ प्रोक्तौ खभावाभिन्ये चतो ॥ 2८ % 
॥ इति समो ॥ १॥ 


नैः 


` 1 80 °दुपात्छ्षि° 1 2 ४० समता । 8 ^ करिखकुञ्चिते । 
१२ त° रल्न° 





९.० 


20 


च ० २० को०-उल्टास ९, परीश्चण २ 


आङश्चितावहृये स्तो रूपादौ कुितौ पुटो ॥ 
॥ इति कुञ्चितो ॥ २॥ 


प्रखतावायतौ पक्तौ इषे बीरे च विस्मये ॥ 
॥ इति प्रसृतौ ॥ २॥ 


रफुरितौ सपन्दितौ पोक्ताबीषौयां विनियोजितो ॥ 
 ॥ इति स्फुरितो ॥ ४॥ 


विवतिंतौ सुदत्त कोधे योज्यो विपश्चिता ॥ 
॥ इति विवरतिंतो ॥ ५॥ 


निमेषितो तु पुरयोः संश्छेषात्‌ क्ोधगोचरौ ॥ 
॥ इति निमेषितो ॥ ६॥ 


उन्मेषितौ च विष्ेषाल्ियोगं पूर्वमाभितो ॥ 
॥ इत्युन्मेषितौ ॥ ७॥ 


पिहितावतिसंम्र पुटौ स्यातां दरो'ख्जे । 
सुस्मूर्च्छितव बोँष्णधूमवाताञ्जनार्तिषु ॥ 
॥ इति पिहितो ॥ ८ ॥ 


पु" विताडितो' ज्ञेयावुत्तरेणाधराहतेः। 
अतिविस्फारणात्‌ स्याताम “रयो वा विताडितो' ॥ 
॥ इति विताडितौ ॥ ९ ॥ 
॥ इति नवधा पुरो ॥ 


[ ताराकमोणि । ] 
तारकाणां विमेदा ये ते कर्मोपाधिका मताः । 
कर्मण्यपि द्विधा खस्य विषयस्याभिसुख्यतः ॥ 
नव तच्र खनिछानि पाक्रतं च प्रवेदनम्‌ । 
वलन रमणं पातश्चलने च विवर्तनम्‌ ॥ 


७६ 


५२ 


७२ 


1 


(५५ 


७द 


(५.9 


७८ 


\ ४७५ भरुक \ 9. ५४५ खलो \ 9 “इषौ ` स्‌. कते. पु. ३७० \ ५ ७० स्ख \ 
५ ‰90 पणःएप्टो, ०५ वितानै, ०७५९०४५ ०६ वितते \ 6 +8 स्यातोमद्धः \ 





"ऋ ९ कनका ऋका चकत = छ "मा क का क कादा ; इ क्रा क वः ` , "क की + धो " च क क का 


प्रातम्‌ ] च र० को०-उल्ास १, परीक्षण २ 
सखुद्ुत्त च निष्कामस्तेषां लक्षणसुच्यते । 


खभावावस्थिती ज्ञेय भावेनावेराभागिनिः॥ 
रसेऽद्धुते' प्राक्रतं तु, 
॥ इति प्राकृतम्‌ ॥ १ ॥ 
प्रवेदरानमथोच्यते । 


प्रवेशात्‌ पुटयोरन्त्वीभत्से च रसे स्यतम्‌ ॥ 
॥ इति प्रवेरानम्‌ ॥ २॥ 


वलनं ज्यसख्रगमनं रसयोर्वीररौद्रयोः। 
॥ इति वरख्नम्‌ ॥ ३ ॥ 
3 


तारयोर्मण्डलश्रान्तिः शुटान्तर््जमणं मतम्‌ ॥ 
रसे बीरे च रौद्रे च, 


॥ इति भ्रमणम्‌ ॥ ४॥ 
नैः 


पातस्तु स्यादधोगतिः । 
रसे च करुणे कायः. 


॥ इति पातः ॥ ५॥ 


>< 
चलन च प्रकम्पनं ॥ 
भयानके रसे परोक्त, 
॥ इति चलनम्‌ ॥ ६॥ 
नैः 


कटाक्षस्तु विवर्तने । 
श्बुङ्गारे च रसे हास्ये. 
॥ इति विवतनम्‌ ॥ ७॥ 


ससुद्रत्तमथोद्रतिः ॥ 
रसे वीरे च रौद्र च, 
॥ इति समुद्त्तम्‌ ॥ ८ ॥ 


नैः 


1 ^80 “गिनी? । 2 456 दधते । 3 ^80 “डान्तेर्रः । 


९.१ 


७९ 


८१10 


18 


८९ . 


८२ 





९२ न्र° र० को०~उद्लासं ९, परीक्षण ३ [ निष्क्रामो दशनानि च 


निगमस्त्वन्तरा तु यः 
स निष्क्रामस्तु बीरेऽप्यद्धुते रौद्रे भयानके ॥ दये 


॥ इति निष्कामः ॥ ९॥ 
॥ इति नव स्वनिष्ठानि ताराकर्माणि ॥ 
मः 


; [ दशेनानि । ] 


ताराकमोष्टकमथो विषयाभिसुखं बरुवे । 

रसभावे तु तत्‌ ख्यातं साधारणतया बुधेः ॥ ८५ 
¢ सम साच्यनुच्रत्तावलोकितानि विखोकितम्‌ । 
|| उद्ोकितालोकिते च प्रविखोकितमित्यपि ॥ ८६ 
| 10 कमोण्येतानि कथ्यन्ते दरंनानि मनीषिभिः। 


दनं सममन्रोक्तं सौम्यमध्यकनीनिकम्‌ ॥ ८७ 
॥ इति समम्‌ ॥ १॥ 


पक्ष्मान्तट्धीनतारं च साचि तियग्विलोकितम्‌ ॥ ८८ 
॥ इति साचि ॥ २॥ 


15 अनुदरत्तं दन स्याद्रूपनिर्वर्णनायुतम्‌ । 
अन्तःस्थिरतरा कात्र्याद्‌ दिदृक्षया क्रियातुया॥ ८९ 
निर्वर्णना तु साज्ञेया 
॥ इत्ययुल्रत्तम्‌ ॥ २ ॥ 


चावलोकितसुच्यते । 


| | | र अधस्स्थददानं तत्‌ स्यत्‌ , 
॥ इत्यवरोकितम्‌ ॥ ४॥ 


विटलोकितमितो मतम्‌ ॥ ९० 
पृष्ठतो दरोनं यत्तत्‌, 
॥ इति बिखोकितम्‌ ॥ ५॥ 
28 | उष्छोकितमिहोदितम्‌ । 


ऊर्ध्वस्थवस्तुनो यत्‌ स्यादवेक्षणमथो पुनः ॥ ९१ 
॥ इत्यु्ोकितम्‌ ॥ ६ ॥ 


~ ~ न 9 


--- ~न" --------- 
न ~ ¬) #: 
१ ग 


1 ^80 "चाद । 





आलोकितम्‌ | न° र० को०-उल्ास १, परीक्षण २ ९३ 


आलोकितं यत्‌ सहसा दरौन तन्मतं सुनेः। || 
॥ इत्यालोकरितम्‌ ॥ ७ ॥ 


प्रविलोकितमच्रोक्तं दरोनं पाश्वेमस्य तु ॥ ९२ 


॥ इति प्रविखोकितम्‌ ॥ < ॥ 
॥ इत्यष्टौ दशनानि ॥ 5 


[ कपो । ] 
कपोलौ षड्धिधौ पोक्तो समौ फुटौ च कितो । 
पूर्णौ क्षामो कभ्पितौ च; समौ खाभाविकौ मतौ ॥ ९३ 


अनावेरोषु भावेषु, 
| ॥ इति समो ॥ १॥ 10 


गह्टौ फुट बिकारितौ । 
प्रहे विनियोक्तव्यौ ॥ 
॥ इति पुटो ॥ २॥ 


संकोचात्‌ कुशितौ मतो ॥ ९ 
रोमाशिते भये शीते ज्वरे चेतौ प्रकीर्तितौ । नः 
॥ इति कुञ्चितो ॥ २ ॥ 


पूर्णौ गर्वोत्साहयोः स्तः कपोलावुन्नतौ च यो ॥ ९५ 
॥ इति पूरणो ॥ ४ ॥ 


न 


दुःखे क्षामाववनतो, | 
॥ इति क्षामो ॥ ५॥ 20 


रफुरितौ कम्पितो मतौ । 
रोमहर्षे स्तो तौ तु कपोलाः षडिमे मताः ॥ ९दे 
॥ इति कम्पितो ॥ ६॥ 
॥ इति षट्‌ कपोटलक्षणम्‌ ॥ 


| नासा । ] 5 
नासापि षड्धा खाभाविकीि मन्दा विक्ूणिता । 





न° र० को०-उद्ास ९, परीक्षण २ [ स्वाभाविकी 


नता विकृष्ट सोच्छरासा खभावावस्थिता तु या । 


आवेदावजिते भावे नासा खाभाविकी मता॥ ९७ 
॥ इति स्वाभाविकी ॥ १ ॥ 


निःश्वासोच्छरासमन्दत्वे मन्दा नासा छविः स्ता । 
निर्वेदोत्सुक्यचिन्तासखु नासा चैव विकणिता' ॥ ९८ 
॥ इति मन्दा ॥ २॥ 


अतिसंकुचिता हास्ये जगुष्सासूययोः पुनः । 
॥ इति बिकूणिता ॥ २ ॥ 


नता नासा सुहुः छेषविश्छेषितपुटा मता । 
मन्दविच्छन्नरुचिरे सोच्छुसाभिन्ये च सा ॥ 


॥ इति नता ॥ ४ ॥ 


अतीवोत्फुल्पुटका विक्रष्टातिंभयादिषु । 
रोषोर्ध्वन्वासविषया भूरिसौरभिपष्सया ॥ 
॥ इति विष्टा ॥ ५॥ 


सोच्छरासाक्रुष्टपवना निर्वेदादिषु सा स्खता। 
दीर्घोच्छरासकरेऽ्थे च सौरभे विनियुज्यते ॥ 


॥ इति सोच्छ्रासा ॥ ६ ॥ 
॥ इति षोढा नासा॥ 
> 


[ अनिटः । | 
प्रबद्ध: स्वलितश्चेव निरस्तो विस्मितस्तथा । 
 उद्छासितो विमुक्त पखताख्यश्चलौ परे ॥ 
खस्थाविति नवोच्छरासनिःश्वासौ कोहलोदितौ । 
समो भ्रान्तो विलीनश्चान्दोलितः कम्पितः परः ॥ 


स्तम्मितोच्छ्रासनिःश्वाससूत्क्रतानि च सीत्करतम्‌ । 
एवं द्राविधः पोक्तो मारुतः केशिदादतैः ॥ 


सराब्दं वदनाद्यस्तु प्रबद्ध: सन विनिगेतः। 
स प्रबद्धस्तु निःश्वासः क्षयादिषु नियुज्यते ॥ 


॥ इति प्रबद्ध: ॥ १॥ 
न - 


\ ४ तिपि \ 





[त व्क स्वकात्‌ काः = का क / । ~ 


स्खलितः ] न° र० को०-उल्ास ९, परीक्षण २ ९५५ 


यो निगेच्छति दुःखेन स्खलितः सोऽभिधीयते । 
अन्लयावस्थास सव्याधो प्रसूतिसमयेऽपि च ॥ १०६ 
॥ इति स्खलितः ॥ २॥ 


निगेच्छति सुहुर्वक्रा्निरस्तः उाव्दवान सुः । 
श्रान्ते रोगे च दुःखार्त विनियुक्तो बुधैरयम्‌ ॥ १०७९ 
॥ इति निरस्तः ॥ २३॥ 


मनस्यन्यपरेऽकस्माद्र्तमानस्त॒ विस्मितः । 
चिन्तायामद्भूते चार्थे विस्मये च प्रवर्तते ॥ १०८ 
॥ इति विस्मितः ॥ ४॥ 


घ्राणेन मन्दमापीतो मरुदुह्छासितो मतः। 10 
हदयगन्धे च संदि ग्घेष्वर्थेषृक्तो विचक्षणैः ॥ १०९ 
॥ इति उद्कासितः ॥५॥ 


निरुदधिरमासुक्तो विसुक्तः कथ्यते मरुत्‌ । 
प्राणायामे तथा ध्याने योगे चैष नियुज्यते ॥ ११० 
॥ इति विमुक्तः ॥ ६ ॥ 185 


दीधे; सहाब्दनिष्क्रान्तो घाणतः परखलो मरत्‌ । 
॥ इति परखतः ॥ ७॥ 


उष्णावुच्छरासनिःश्वासौ सराब्दौ वक्रनिगेतौ ॥ १११ 
चलावुक्तो तु तौ चिन्तीत्सुक्यरदोकेषु कीर्तितौ । 


॥ इति चो ॥ ८ ॥ ‰0 


खस्थौ खभावजौ प्रोक्तो वायू खस्थक्रियास तौ ॥ ११२ 
॥। इति स्वस्थौ ॥ ९ ॥ 
॥ इति नवधानिलः ॥ 


समाया वायवोऽन्वर्थ'नामानः किन्तु कथ्यते । 
विनियोगः समो ज्ञेयः सहजे कर्मणि स्थितः ॥ ११३ % 


॥ इति समः ॥ १॥ 
नेः 


1 ^ बायवोस्त्वर्थ; ४ वायवोस्त्वर्थनमोनः । 





९६ न° र० को०-उद्छास १, परीश्चण ३ [ भ्रान्तः 


श्रान्तः स चान्तभ्र( ? न्तर्भं ) मणात्‌ प्रथमे प्रियसंगमे । 
॥ इति रान्तः ॥ २॥ 
> 


लीनः स्यान्मूिते वायुः, 
॥ इति रीनः ॥ ३॥ 
¢ पर्वतारोहणे पुनः ॥ ११४ 
आन्दोलितः, 


॥ इति आन्दोलितः ॥ ४॥ 


कम्पितस्तु सुरते, 
॥ इति कम्पितः ॥ ५॥ 


10 । स्तम्मितः पुनः। 
राखरभोक्षे, 
॥ इति स्तम्भितः ॥ £ ॥ 


तथोच्छ्रास आघ्राणे कुसुमादिनः॥ ११५. 
॥ इति उच्छासः ॥ ७ ॥ 





15 निःश्वासो'ऽनुायादौ स्यत्‌, 
| ॥ इति निःश्वासः ॥ ८ ॥ 


।1 सूत्क्रतं वेदनादिषु । 
| राब्दालकःरणे वक्रात्‌ त्याज्ये वायौ च, 
। १ ॥ इति सू्कृतम्‌ ॥ ९ ॥ 


%0 सीत्करतम्‌ ॥ ११९ 
छीतद्केदो आआशदयवायौ राब्दालुकरणेऽपि च । 
नखक्चते शृगाक्षीणां निदेयाधरखण्डने ॥ ११७ 
॥ इति सीत्कृतम्‌ ॥ १० ॥ 


नासानिटेन व्याख्यातो मारुतो बे (१बव )दनोदद्धव ; । 
६ विनियोगान्तराण्यच्र खुविज्ञेयानि लोकतः ॥ ११८ 
॥ इति अषटात्रशाद्विधो वायुः ॥ 


त द 
1 0 °9्वासानु2। 2 1 पण01५ 10 भ, को. °नुहरणे (पृ. ७३७) । 3 पण. 
0108 10 भ, को. गुह्यवायो ( पु. ७२९), एण¢ ०४. 956 ब्राह्म । | 





विवतिंतादयः ] चर ° र० को०-उल्टास ₹, परीक्षण ३ ९७ 
| अधरः | ] 


विवर्तितः कभ्पितश्च विखष्यो विनिगहितः । 
संदष्टकः ससुद्धश्चे (१ ) द्रत्तायतविकारिताः ॥ ११९ 
रेचितश्चेति दराधा बुधैरोध (१) उदीरितः। 


तिथक संकुचितश्ोष्ठपुटः भोक्त विवर्तितः ॥ १२० 5 
नियुक्तो बेदनासुयावज्ञाहास्यादिषु स्फुटम्‌ । 
॥ इति विवर्तितः ॥ १ ॥ 


कम्पितः कम्पनादद्धीरुडव्यथाङीतजपादिषु ॥ १२१ 
॥ इति कम्पितः ॥ २॥ 


विनिष्कान्तो विखष्टः स्यादलक्तायेन रञ्जने । ध 

विखासे चैव बिव्बोके खीणां णां च हेटने ॥ १२२ 
॥ इति विखृष्टः ॥ २ ॥ 

प्राणो सुखान्तर्निंहितः साध्येषु विनिगहितः । 


रोषेष्येयोर्वरोरूणां बलाच्॒म्बति वह्टुभे ॥ १२३ 
॥ इति विनिगृहितः ॥ ४॥ 18 


दन्तैदेष्टोऽधरः क्रोधे संदष्टो विनियुज्यते ॥ २४ 


॥ इति संद्टः ॥ ५॥ 
ससुद्धः कथ्यते चोष्ठसंपुटो दधद्ुन्नतिम्‌ । 
फूत्कारे चानुकम्पायां चुम्बने चाभिनन्दने ॥ १२५ 
 ॥ इति समुद्रः ॥ ६ ॥ 20 


सुखोर्क्षप्रतयोद्रत्तः सोऽवन्ञापरिहासयोः । 
॥ इत्युदत्तः ॥ ७ ॥ 


उत्तरोष्टेन साकं स ततः `स्यादायतः स्मिते ॥ १२६ 
॥ इ त्यायतः; ॥ < ।॥ 


किश्िदत्तो( ? दृष्टो ष्वरदनो विकारी कथ्यते स्मिते । % 


॥ इति विकारी ॥ ९ ॥ 
नैः 





1 ^80 स्याद्यतः । 
१३ त्रु° रन्न 





९.८ न° र० को०-उद्ासख १, परीक्षण २ [ दन्तकर्माणि 


रेचितस्तु विकारोऽपि( एरेऽपि ) पथन्तवलनाद्रवेत्‌ ॥ १२७ 
॥ इति रेचितः ॥ १० ॥ 
॥ इति दद्धाधरः ॥ 


[ दन्तकमीणि । | 


दन्तलक्षणसिद्धथभे दन्तकमोण्यथो चवे । 
कुटरन खण्डनं छिन्न चुक्षितं ग्रहणं समम्‌ ॥ १२८ 
दष निकर्षण चेति दन्तकमोष्टधा स्पृतम्‌ । 


| ५911 


कुट्रनं घर्षणं परोक्तं रीतसुग्भी जरा तत्‌ ॥ १२९ 
॥ इति कुट्नम्‌ ॥ २॥ 


10 दन्तानां छेषविश्छेषो सुहु; खण्डनमीरितम्‌ । . 
जपलक्षणसंलापाध्ययनेषु प्रकीतितम्‌ ॥ १३० 
॥ इति खण्डनम्‌ ॥ २ ॥ 


संशछेषः स्याद्‌ दददिचछननं शीत भीरोदना दिषु । 
व्याधौ च बीटिक्ाच्छेदे व्यायामादिषु चेप्सितम्‌ ॥ १३१ 


18 ॥ इति छिन्नम्‌ ॥ २ ॥ 
चुक्कितं' जुम्भणे दन्तपङ्क्त्यो "दूरस्थिते भवेत्‌ । 
॥ इति चुक्तितम्‌* ॥ ४ ॥ 
ग्रहणं धारणं दन्तैरङ्गल्यादेः प्रकीतिंतम्‌ ॥ १३२ 
॥ इति ग्रहणम्‌ ॥५॥ ` | 
„ दन्तानां किंविदाछेषः खमावाभिनये समम्‌ । | 
॥ इति समम्‌ ॥ ६॥ । 
दन्तेर्दष्टं भवेत्‌ क्रोधे त्व"धरे दरानं तु यत्‌ ॥ १३३ | 


॥ इति दष्रम्‌ ॥ ७॥ 
जैः 
1 +80 रोद राः । ° रोदने भीतिश्ीतयोः सं. र. अ. ७ च्छो. ४९९ । 2 814 


4 ^50 चुम्बित । 0 १९8० 136. 3 ^80 पङ्कदु. भ दन्तपङ्क्त्योः स्थितिदूरे चुक्तितं 
जम्भमणादिषु । सं. र. अ. ७ श्छो. ५०० । 5 ^90 त्वदधरे । 








जिह्वा ] 


न° र० को०-उलास १, परीश्चषण ३ ९९ 


निष्कारो निष्करषेणं स्याद्‌ मकषटादिकरोदने ॥ १३४ 
॥ इति निष्कषेणम्‌ ॥ ८ ॥ 
॥ इत्यष्टौ दन्तकमीणि ॥ 


[ जहा । |] 
जिहाथ षड्धा कञ्च्यु नता लोला च छेहिनी । 5 
वक्रा खक्रानुगा चेति प्रखतास्ये प्रसारिता 
ऋज्वी रमे पिपासायां श्वापदानां प्रकीर्तिता ॥ १३५ 
॥ इति ऋञ्वी ॥ १॥ 


ध 
्यात्तास्यस्थोन्नता जिह्वा जुम्मास्यान्तस्थवीक्चयोः । 
॥ इति उन्नता ॥ २॥ 


प्रखतास्ये चला लोला वेतालादौ प्रयुज्यते ॥ १३१ 
॥ इति खोखा ॥ ३॥ 


जिहावलेहिनी ज्ञेया दन्तोष्ठे लेहिनी सती ॥ १३७ 
॥ इत्यवलेहिनी ॥ ४॥ ` 


> 
` छसिहाभिनये वक्रा व्यात्तास्यस्थोन्नताग्रिका। ` 15 


॥ इति वक्रा ॥ ५॥ 


लीदखका रखता खकानगा कोपेष्ट मक्षयोः ॥ १३८ 
॥ इति खक्ताचुगा ॥ ६ ॥ 
इति षोढा जिह्वा ॥ 


| चिबुकम्‌ ] छ 
अङ्गष्टा' (जिहोष्ठा) नुगतं तेषां क्रियया लक्षितं स्फुटम्‌ । 
तथापि लक्ष्यते कफिशिचिवुकं सुखवुद्धये ॥ १३९ 
ज्यादीणं श्वसितं वक्रं संहतं चलसंहतम्‌ । 
स्फुरितं चलितं लोलमेवं चिवुकमष्टघा । 


जम्भाहास्यादिषु पोक्तं व्यादीणे दूरनिगतम्‌ ॥ १४००४ 
॥ इति व्यादीणैम्‌ ॥ १॥ 


1 ^90 ऋज्वान्नताः । 2 ण जिद्लोष्ठदन्तक्रियया चिवुकं लक्ष्यते ततः । सं. र. 
अ. ७ च्छो. ५०७। 











15 


१०० 


० र० को०-उ्टास ९, परीक्षण २ [ वदनानि 


अधस्तादङ्खलं सखरस्तं श्वसितं बीश्षितेऽद्ुते । 
॥ इति श्वसितम्‌ ॥ २॥ 


तिथग्गतं तु वक्र स्याद्रहावेरो नियुज्यते ॥ 
॥ इति वक्रम्‌ ॥ ३ ॥ 


संहतं मीलितसुखं निश्चल मोनकर्मणि ॥ २ ॥ 


॥ इति संहतम्‌ ॥ ४॥ 


लभ्नौष्ं चश्च नारीवल्गने चलसंहतम्‌ ॥ ५. ॥ 
॥ इति चरसंहतम्‌ ॥ "५ ॥ 


स्फुरितं कम्पितं धोक्तं शीते ( {भीते ) शीतज्वरे बुधैः । 
॥ इति स्फुरितम्‌ ॥ ६॥ 


चलितं छेषविश्छेषि क्षोभे वाकस्तम्भकोपयोः। 
॥ इति चलितम्‌ ॥ ७ ॥ 


तिर्यग्गतागतं लोर रोमन्थावर्तनादिषु ॥ 
॥ इति खोरम्‌ ॥ < ॥ 
॥ इत्य्रधा चिबुकम्‌ ॥ 
>: 


[ वदनम्‌ । | 


व्याम सुम्रस॒द्राहि विधत विक्रत तथा। 
विनिच्रत्तमिति प्राहुर्वदनं षडद्धिध बुधाः ॥ 


व्याुभ्रं किञ्चिदायामि सुखं चिन्तादिके स्म्रतम्‌ । 
निर्वेदौत्सुक्ययोश्चापि, 
॥ इति व्याभुञ्चम्‌ ॥ १ ॥ 
भुभ्र वक्त्रमधोसुखम्‌ । 
यतेः ख भावाह्ध्ञायाम्‌ , 
॥ इति भुञ्चम्‌ ॥ २॥ 


1 सं. र, अ. ७ च्छो. ५११. 1४5 भीते रीतज्वरे तथा । 


९४९१ 


१४२ 


९४२ 


१ यथै 


१४पै 





आ श क क रा एः | ' । ऋ रक = एकः "का ककः {प क| 


उद्वाहि | चर ° र० को०-उह्ास ९, परीश्चण ३ १०१ 


गवोनादरतो म८ग)तौ ॥ 


लीटासूर्क्षघसुद्राहि, १४७ 
॥ इत्युद्धाहि ॥ २॥ 


विधुतं तिगेगायनम्‌ 
निषेधे नेवमित्युक्तो, . 
॥ इति विधुतम्‌ ॥ ४ ॥ 


१४८ 5 


ई विघ्तं तु प्रकीतितम्‌ । 
विशिष्टो हास्यरोकभयादिषु विचक्षणः ॥ १४९ 
` ॥ इति विचतम्‌ ॥ ५॥ 


विनिचत्तं तु तत्‌ परोक्तं यत्परावरत्तमाननम्‌ । 10 
रोचेष्यासूयितेष्वर्थष्वेतन्चत्तविदो विदुः ॥ १५० 
॥ इति विनिचरत्तम्‌ ॥ ६॥ 
इति षोढा वदनानि ॥ 
॥ इति द्वादश शिरस उपाङ्गानि ॥ 


[ पाष्णिगुल्फकराङ्कुलिभेदाः । | 15 
उतरिक्षप्रापतितोतिक्षप्रपतितान्तगता तथा । | 
बहिगेता मिथोयुक्ता वियुक्ताङ्लिसंयुता ॥ १५१ 
अध्यष्ट(१अष्टघा )पाषिर्णरित्युक्ता पादचारपदेष्वियम्‌ । 
गुर्फावङ्गष् संश्छि्टावन्तयोतौ बहिगतौ ॥ १५२ 
मिथोयुक्तौ वियुक्तो च पश्चधा सुनिनोदितौ । 0 
एतेषां विनियोगस्तु स्थानकादिषु ददयते ॥ ` १५३ 
संयुता वियुता वक्राः प्रखताः पतितास्तथा । 
कुश्वन्म्बलाश्च वलिताः कराङ्गल्यस्तु सप्तधा ॥ १५४ 
नान्नैव करुतलक्ष्माणो मेदाः पाष्ण्यादिता इमे । 


[ चरणाङ्कुलिभेदाः । ]  % 
अधःक्षिप्रास्तथोरिक्षपता कुिताश्च प्रसारिताः ॥ १५५ 
संलस्राः पश्चधा ज्ञेयाश्चरणेऽङ्कलयो वुधैः । 
अधःक्िप्रा सुह: पातात्‌ विच्योके फिलकरिशिते ॥ १५९ 

॥ इति अधःक्षिप्ता ॥ १॥ 


नै 








१०२ न° र० को०-उल्ास १, = 0; [ उत्कषिप्तादयः 


नवोढा लज्िते तूरध्वक्षेपादुर्िक्षधिका खुहुः । 
॥ इत्युत््िप्ता ॥ २॥ 


रीतमूखोग्रहत्रासेः कुचित कुनात्‌ स्ता ॥ १५७ 
॥ इति कुञ्चिता ॥ २ ॥ 


नैः 
5 ऋजुः प्रसारिताः स्तन्धाः खापे स्तम्भेऽङ्मोहने । 
॥ इति प्रसारिता ॥ ४॥ 


अङ्ग्टस्याप्यमी भेदाश्चत्वारः परिकीर्तिताः । 


मिथोलग्राश्च संलग्ना साङ्गाः कर्षणे स्ताः ॥ १५८ 
॥ इति संख्याः ॥ ५॥ 


10 उद्धतं पतिताग्रं चोद्धताग्र भूमिलस्रकम्‌ । 
कुआन्मध्यं तिरश्चीन षोढा पादतलं स्म्रतम्‌ ॥ १५९ 
॥ इति पाष्णिगुर्फाङ्कलितखानि करचरणोपाङ्गानि ॥ 
: ६ 


उपाङ्गसेवकाः सिदासनसर्च्रचामरेः । 
भिद्यन्ते यस्य तेनाच्नोपाङ्गसंघः प्रदर्रितः ॥ १॥ 


15 इति श्रीराजाधिराजश्रीकुम्भकर्णं मही महेन्द्रेण विरचिते सङ्गीतराजे षोडशसाहसख्यां सङ्गीत- 
मीमांसायां नरयरत्रकोरो अङ्गोह्ासे उपाङ्गपरीक्षणं ठृतीयं समाप्तम्‌ ॥ ३ ॥ 


प्रथमोष्छासे चतुथं परीक्षणम्‌ 
यस्मिन्नविद्ययाहाये विभ्वं भाति सनातने । 


तमनाहायकार्येरा मार्थेरां राङ्करं नमः ॥ १ 
न 
%0 [ आहायाोभिनयः । ] 
अथ निधायेते सम्यगाहा्याभिनयो मया । 
यतः प्रयोगः सर्वोऽयमाहायाभिनये स्थितः ॥ = 


यतः प्रकरुतयः पूवे नानानेपथ्यसाधिताः। 
अन्ते (१ अतो ) ऽङ्गाद्ेरभिव्यक्तिमभिगच्छन्ययन्नतः॥ ३ 
नेपथ्यजो विधिः सर्वं आहायाीभिनयाभिधः। 
© | 
कायः प्रयन्नस्तच्रैव प्रयोगे छुभमिच्छता ॥ ्े 
नेपथ्यदाब्दवाच्यस्तु नाय्यालङ्कार इष्यते । 
स एवाहायाब्देन नाटके उयपदिरयते ॥ 


। ५ 
[=| 


४९ 








तेषथ्यस्‌ \, न्‌० २० के०-उ्छस २, पशष ४ ९०द 


१ नेपथ्यम्‌ \ } 
चतुर्विधं तु नेपथ्ये पुस्तोऽलङ्ार एव च। 
तथाङ्गरचना चेव ज्ञेयः सजीवमेव च ॥ दे 
पुस्तस्तु त्रिविधो ज्ञेयो नानारूपप्रमाणतः । 
सन्धिमो व्याजिमश्चैव चेष्टित प्रकीर्तितः ॥ ७5 


| अलङ्कारः | ] 
कायस्यालङ्कतिर्येन सोऽलङ्कारः स च द्विधा। | 
माल्यमाभरण चेति तच्र माल्यमनाच्रतम्‌ ॥ ८ 
चतुर्विधं तु विज्ञेयं देहस्याभरणं बुधैः । 
आवेध्यं बन्धनीय च क्षिप्यमारोप्यकं तथा ॥ ९.10 
आवेध्यं कुण्डलादीह यत्‌ स्यात्‌ श्रवण भूषणम्‌ । 
श्रोणिसूत्राङ् दैखेक्तावन्धनीयानि निर्दिरोत्‌ ॥ १० 
परक्ेप्यं नृ पुरं बिव्याद्रख्राभरणमेव च । 
आरोप्य हेमसूत्रादि हाराश्च विविधाश्रयाः ॥ ११ 
। अद्धरचना । ] 15 
सितरक्तदयामपीता वणीस्तैरङ्गसंस्क्रतिः । 
व्णौनां संकरोद्धूता रास्ताङ्रचना मता । 
बहुभिर्वर्णिता कणैः स्यादङ्करचना नवा ॥ १२ 
| पुस्तः। ] 
पुस्तः स उच्यते नाय्ये यद्विमानादि ददयते । %0 
॥ वसख्कमं ॥ 
केणिजे (१ किलिञ्जै) अर्मवखराथैः संधानात्‌ संधिमो मतः ॥ १३ 
व्याजे सूत्राकर्षणाध् रचितो व्याजिमो मतः। 
मधूच्छिष्टान्नजत्वादियोगर्यश्चे्यते नरैः ॥ १४ 





1 ^80 पदेसुक्ता 0 श्रोणिसूत्राङ्गदेसक्ता । ना, शा. अ. २३, च्छो. १३ ( 0. 8. 8, ) 








१०४ न° र० को०-उद्टास १, परीक्षण ह ॥ सजीवम्‌ 








[ सजीवम्‌ । ] 
स चेश्ितः' स्यात्‌ सजीवो रङ् प्राणिप्रवेरानम्‌ । 
देवदानवगन्धवौ यक्षराक्षसपन्नगाः ॥ १५ 
प्राणिसंज्ञाः कृता द्येते जीववन्धास्तथापरे । 
¢ ततौटघ्ासादयच्राणि चर्मवर्स॑ध्वजास्तथा ॥ १९ 
नानाप्रहरणाव्याश्च ते प्राणिन इति स्ताः । 
( अथवा कारणोपेता भवन्यते इारीरिणः ॥ १७ 
वेष भावाश्रयोपेता नाद्वधर्मीसुपाभिताः। 
4 वणीनां तु विधिं ज्ञात्वा वयःप्रकरतिमेव च ॥ १८ 
| 10 कुयीदङ्गस्य रचनां देाजातिवयः्िताम्‌ । 
ठ द्विपादः 'पादरहिताः चतुष्पाद इति चरिधा ॥ १९ 
| प्राणिनः प्रथमे तच्र देवमानुषपकषिणः। 
। पादहीनास्तु खजगाश्चतुष्पादा गवादयः ॥ २० 
॥॥ 
| एवमादा्यविधयो गवेष्या भरतादिह । 
॥ 15 अप्रस्तुतत्वात्ते नेह विस्तरेण प्रपञ्चिताः ॥ २१ 
| भूषाप्रसङ्गतः किचिन्नेपथ्यमिह दाशेतम्‌ । 
॥ भ $ 
| सुखरागः । | । 
अभिनेयार्थसंपत्तिः करणेरवधायेते ॥ २२ 
साधीना सखखरागस्य तत्‌ स आदौ निरूप्यते । 
„,„ यतो वदनरागोऽयं चित्तवति रसात्मिकाम्‌ ॥ २३ & 
प्रकटीकुरुते तस्मावर्थसिद्धिस्तदाधिता । । 
सुखरागसतेऽङ्गानि नाकमर्थपरकाराने ॥ २४ ठ 
अतस्तव रभन्ते तानि खे दादिना यथा । } 
रसाल रायिनी संपत्‌ पदाथौनां प्रकाराते ॥ २५ + 
4 तामात्मख्धां च्यनक्तयच्र सुखरागो रसे रसे । | 
स चतुधा स्तो राज्ञा पूर्वः" खाभाविकस्तथा ॥ २९ 


1 (कापोता वो0)08 ४1 कपा 8 प्न 8६९१) €तवा्म8 2 ष. 9. 189९ 16 । 
16840779 चेषिमः 88 ६10४९ ( ^. 23. ) १. 8. (0.8. 8. ) ^. 21. ४.8 (प. 8.) | 11 | 
{116 ५ 0. 8, 1188 {116 16840 बेषिमः-(२. 110 ). 1108 18 8 1016 106111&1016 
1644118. -4010111858द्प]५ € पुभ०8 1४ 88 जतुसिक्थादिना वेष्टस्तेन निर्वृत्तो 
वेष्टिमः । ?.110. 2 ५ 410 पाद्रहिता चतुः । 3 ^0 पादौ । 4 ^9० पूरवैस्वा° । 








॥ ¶्ककष्कावक क्क्व क च 


हदस्तप्रचाराः करणानि च ] न्रु° र० को०-उह्टास ९, परीक्षण ४ 


प्रसन्नश्च तथा रक्तः इयामश्चैव चतुर्थकः । 
खाभाविको यथार्थस्तु भावेनाविष्ट इष्यते ॥ 


॥ इति स्वाभाविकः ॥ १ ॥ 


खङ्गाराद्तदास्येषु प्रसन्नो निर्मलो मतः । 


॥ इति प्रसन्नः ॥ २॥ 


रक्तं स्यादरुणो रौद्रे करुणेऽद्धतवीययोः । 
॥ इति रक्तः ॥ ३ ॥ 


इयामो यथार्थो विज्ञेयो बीभत्से च भयानके ॥ 


॥ इति इयाम: ॥ ४॥ 
॥ इति चतुधोयु ( ? मुख ) रागः ॥ 


| हस्तप्रचाराः । | 
हस्तप्रचरणाधीनं सवे त्यं यतस्ततः । 
अतो नानामतैक्येन तानहं वच्मि तत्वतः ॥ 
उत्तानश्च ततः पाश्वेगोऽग्रमोऽधस्तलस्तथा । 
खसंसुखतलश्चोर्ध्वसुखोऽधोवदनस्तथा ॥ 
पराञ्चखः पाश्वेतलः संसुखश्चाग्रतस्तलः । 
ऊरध्वंगोऽधोगतः पाश्वंगतोऽन्यः पार्श्वतो सुखः ॥ 
एते पश्चददोवाच्र प्रचाराः करसं्याः । 


नान्नैव व्यक्तलक्ष्माणो न ततो लक्षिताः पथक्‌ ॥ 
॥ इति पञ्चदशा हस्तपचाराः ॥ 


[ करणानि । | 
निरपेक्लो यथा सर्वोऽभिनयः सर्वमरच्छति । 
क्रियाविरोषो हस्तस्य सर्वसाधारणस्तथा ॥ 
क्रियते ब्रत्यविद्धियेस्तद्धस्तकरणं मतम्‌ । 
आवेष्टितोद्रेष्टिते च व्यावर्तितमतः परम्‌ ॥ 
परिवतिंतमित्येतचतुधा परिकीर्तितम्‌ । 


तजेन्यादयङ्घलीनां यत्तलसंखुखतः कमात्‌ ॥ 


आवेष्टितं स्यादागच्छेदावक्चः पाश्वैतः करः । 
१४ च्रुन्रन्नम 





१०५ 








२.५ 











10 


१९ 
३० 15 
३९ 


३२ 
0 


२२ 


३ धै 25 





१०६ य° र० को०-उल्छास १, परीक्षण ४ [ करकर्माणि 


करस्य करणं नाम तदावेितमीरितम्‌ ॥ ३ 
॥ इति अवेष्टितम्‌ ॥ १॥ 
नैः 


अङ्खर्योऽलुक्रमेणैव निगेच्छन्ति तलाद्रहिः । 


वश्चस्तोऽपि करस्तद्रत्‌ तदुद्रेितमीरितम्‌ ॥ २७ 
5 ॥ इति उदधेषितम्‌ ॥ २॥ 


आवर्तितकनिष्ठायमेवमेव परकीतितम्‌ ॥ ३८ 
॥ इत्यावतिंतम्‌ ॥ २॥ 


तथेव कनिष्ठा शि)[का)]यसुद्रे्टित बदीरितम्‌ । 
परिवर्तितनानैतत्‌ करणं करसंभितम्‌ ॥ ३९ 
10 ॥ इति परिवतितम्‌ ॥ ४॥ 
॥ इति चत्वारि करणानि ॥ 


[ करक्माणि । ] 
विंरातिः करकमोणि नामलक्ष्माणि बस्यतः() । 
धूननं छेषविछेषौ क्षेपो रक्षणमोक्षणे । 
5 परिग्रहो निग्रहो दुत्कख्य!*कृष्टिविकृषटयः ॥ द 
ताडनं तोलनं छेद मेदौ स्फतोटनमोटने । 


विसर्जनमथाह्वानं तजन चेति विंरातिः ॥ ४१ 
॥ इति विंश्चतिः करक्माणि ॥ 


[ हस्तक्षत्राणि । | 
% पारश्वदरयं पुरस्ताच पश्चादृध्वमधः शिरः । 
ललारकरणस्कन्धोरोनाभयः कटि षीषेके । 


ऊरद्रथं च हस्तानां क्षेत्राणीति योदा ॥ धेर 
॥ इति जयोद शा हस्तक्षेजाणि ॥ 
४. 


येनाहायं जगति जगतीनाथसर्वखसुवीं 
% धाया पाया" समग्रा वितरणस्रणि; कायैमायोनुरूपम्‌ । 
स्म्य रामालचरितमनिरदा दायमार समच्र 


_ तेनाहाया'भिनयनिगमो ऽकायशेषः द्वितीयाः ॥ क्षितीराः' ॥ ४३ 
1 90 उद्धेषटितम्‌ । £ ^ यदिव । ° ^» ग्रहयोत्छृ° । 4 ०0 पर्या । 5 ४० 


"प्रारस° । 6 ४० शहाया । 7 ४ निगमे । 8 ^ क्षितीशा । 





7 + क ना वा शा "कः = कनक व क क दु क", , _ क्क, 
# ५ 


न° र० को०-उद्ास १, परीक्षण ४ १०७ 


इति सरस्तीरससयुद्धतकेरवोद्याननायकेन अभिनवभरताचार्येण माख्वाम्भोधि- 
माथमन्थमदहीधरेण योगिनीप्रसादासादितयोगिनीपुरेण मण्डलदुगों द्रणोद्ध॒तसकलर्मण्ड- 
खाधीश्वरेण अजयमेरुजयाजयविभवेन यवनकुखाकाङकाटराच्रिरूपेण शाकम्भरीरमणपरि- 
रीखनपयपराप्रशाकम्भरीतोषितदाकम्भरीप्रमुखराक्तित्रयेण नागपुरोदधूनधर्षितनागपुरेण 
अवदाचलग्रहणसंदरदिताचलाद्धुतप्रतापेण गूजैराधीशधीरत्वोन्मूलनप्रचण्डपवनेन श्रीमत्कु- 
म्भलमेरुनवीननिर्मितपराजितसुमेरुणा श्रीचित्रकूटभोमखर्मतयथार्थीकरणचारुतरपथेन मेद- 
पाटसमुद्रसंभवरोहिणीरमणेन अरिराजमत्तमातङ्गपच्वाननेन प्ररूढपत्रयवनदवददनदवा- 
नलेन प्रयर्थिप्रथिवीपतितिमिरततिनिराकरणप्रढप्रतापमार्वण्डेन बेरिनितावेधन्यदीश्चा- 
दानदटोदण्डकोदण्डद्ण्डमण्डिताखण्डयुजादण्डेन भूमण्डखाखण्डलेन श्रीचित्रक्रूटविभुना 
अध्युष्टतमनरेश्वरेण गजनरुरगाधीरराज त्रितयतोढरमहेन वेदमारीसापनचतुराननेन 10 
याचककस्पनाकल्पद्रुमेण वसुन्धरोद्धरणादिवराहेण परमभागवतेन जगदीश्वरीचरणकरिङकरेण 
भवानीपतिप्रसादाप्रापसाद्षरप्रसादेन राजगार्वादि विरुदावलीविराजमानेन राजाधिराज- 
महाराणा-श्रीमोकटेन्द्रनन्दनेन राजाधिराज-श्रीकुम्भकर्मेन विरचिते संगीतराजे पोडश- 
साहर्यां संगीतमीमांसायां यूयरन्रकोरो अङ्गोलासे आहायौभिनयपरीक्षणं चतुर्थं समाप्तम्‌ । 


छ 





10. इति सरसतीरससयुद्ूतकेरवोद्याननायकेन अभिनवभरताचार्येण माखवांभोधि-15 
माथमेथमहीधरेण योगिनीप्रसादासादितयोगिनीपुरेण मण्डलदुर्गोद्धरणोद्धतसकलमण्डला- 
धीश्वरेण अजयमेरुजयाजयविभवेन यवनक्कुखाकार्काटरात्िरूपेण शाकंमरीरमणपरिशीट- 
नपरिप्राप्तशाकभरीतो षितशाकंमरीप्रमुखशक्तित्रयेण नागपुरोदधूलनधर्षितनागपुरेण अ्बुदा- 
चखग्रहणसंदरिताचलाद्भुतप्रतापेण गूजैराधीकधीरतोन्मूढनभ्रचण्डपवनेन श्रीभतुभरमेर्‌- 
नवीननिर्भितपराजितसुमेरुणा श्रीचि[त्रक्ूटभौमखवर्गतयथार्थीकरणचारुतरपभेन मेदपाट- 9 
समुद्रसंभवरोदिणीरमणेन अरिराजमत्तमातंगयवनेन प्ररूढपत्रयवनदवदृहनदवानलेन प्रय- 
थिषएथिवीपतितिमिरततिनिराकरणप्रो ट्र (10 8 वालिना 181 ० &0्राला' [08९९ ) 
इति श्रीजगदीशवनदेवनिजगणेन ॥ १ ॥ जगदीश्वरीकामेश्वरीचरणकिङ्करेण ॥ २ ॥ 
कामाक्षागिरिविभुना ॥ ३ ॥ अध्युषटतमनरेश्वरेण ॥ ४ ॥ भीष्मपुरजयानीतानेकराज- 
कन्यारतनेन ॥ ५ ॥ श्रीपुरम्रहणसंवरद्वितयजोभरेण ॥ ६ ॥ वारिकाचलगब्रहणजनितकीर्ि- १» 
पुरपराजिताचकनायकेन ॥ ७ ॥ संगमनीरदुरगोद्धरणोद्रूतसकलमण्डलाधी्वरेण ॥ ८ ॥ 
दमनपुरविध्वं सनवेदीकृतयवनीनिचयेन ॥ ९ ॥ महिषमेरुजयाजेयविभवेन ॥ १० ॥ 
शाकमरीरमणपरिरी रनपरिप्राप्रशाकंभरीपरितोषितकाकंभरीप्रमुखराक्तित्रयेण ॥ ११ ॥ 
अष्टादशगिरिशिखरपरिवारितांजनाद्विविजयविख्यातवीरयगर्वेण ।। १२ ॥ मह दंबमादृकापुरो- 
दूलनधर्षितमहोरगपुरेण ॥ १३ ॥ श्रीवनदेवखामिप्र(१प्रा) सादरचनापरपरमेश्वरेण ।। १४।। ५ 
शरीच्यवकेश्वरसननिधिकीर्निस्तंमोन्नतजयस्तंमेन ॥ १५ ॥ श्रीब्रह्मगिरिमोमसगैतायथार्थी. 
करणरचितचारुपथेन ॥ १६ ॥ श्रीकामक्षागिरिनवीननिर्भितिपराजितसुमेरुणा ॥ १७ ॥ 


1 ऋ , 1 


~ ~ नका कनकः 





१०८ ° र० को०-उ्टास ९, परीक्षण ४ 


श्रीमहिषाचरोपरिश्रीहरिशरणरविताचख्दुर्गेण ।॥ १८ ॥ अभिनवभरताचार्येण ॥ १९॥ 
वीणाबादनग्रवीणेन ॥ २० ॥ यवनकुखाकाल्कालरात्रिरूपेण ॥ २१ ॥ त्रिसंध्यक्षेत्र- 
समुद्रसंभवरोहिणीरमणेन ॥ २२ ॥ परमभागवतेन ॥ २३ ॥ महायजाधिराजमहाराणा 
श्री[श्गाङ्क]नामराजेनद्रनन्दनेन ॥ २४ ॥ महाराज्ञीसोभाग्यवतीज समां विकाहृद्यनन्दनेन 

5 ॥ २५ ॥ सकरसीमतिनी शिरोमणिनिकुभराजन्यवंशावतं समहाराज्ञीश्रीक्मवती-लघुमा- 
देवीहटदयाधिनाथेन ॥ २६ ॥ इति महाराजा धिराजकारसेनमहीन्द्रेण विरचिते सङ्गीतराजे 
पोडशसाह ख्यां सङ्गीतमीमां सायां चयरत्नकोशे अङ्गो्ठासे आहार्याभिनयलक्षणम्‌ । चतुर्थं 
परीक्षण समाप्नम्‌ । उल्ासश्च प्रथमः समाप्तः । 


द्वितीयो्छासे प्रथमं परीक्षणम्‌ । 
| मङ्गलम्‌ । | 
एकं निधाय सममस्य च' जानीषे पादं परं रचितकुश्चितखुद्धतं च । 


# 


वन्दे रिव सवरदाभयदानहस्तं नेत्राश्धतैः सतत'साध८(? स्थान )- 


कमाप्रवन्तम्‌ ॥ ९ 
नैः 

[ स्थानकानि ।] 8 
अथ स्थानानि “वक्ष्यामो मागदेरीविमेदतः। 
चारी चरणमाख्यातं स्थित्वा तद्यवतिष्ठते ॥ २ 
यतश्चायोदिकं सव स्थाने स्थाने "कृतं भवेत्‌ । 
अतः स्थानं प्रधानत्वात्‌ सर्वस्यादौ प्रपञ्च्यते ॥ ३ 
वैष्णवं समपादं च वै्राखं मण्डलं भवेत्‌ । 10 
आलीढप्रलयालीढे च स्थानषद्ं चणामिति ॥ ्े 
आयात चावहित्थ च तथाभश्वक्रान्तमिलयपि । 
गतागतं च वलितं मोटितं विनिवर्तितम्‌ ॥ ५९ 
इत्याचायेमते ख्यातं खीणां स्ानकसप्तकम्‌ । 
खस्तिकं बधेमानाख्यं 'नन्यावर्त च संहतम्‌ ॥ दे 15 
समपादं चैकपादं प्टोत्तानतटं तथा । | 
चतुरस पाष्णिविद्धं पाष्णिपाश्वेगतं तथा ॥ ७ 
एकपाभ्वेगत तस्मादेकजान्ुनतं ततः । 
पराव्त्तं समसूचि तथा विषमसुच्यपि ॥ ८ 
खण्डसूचि ततो ब्राह्यं वैष्णवं रौवगारुडे । %0 
करूमोसनं नागबन्धं च्रषभासनमिल्यपि ॥ ९ 
इति देरीस्थानकानां विंरातिख्यधिका स्ता । 
खस्थं मदालसं कान्तं स्या द्विष्कम्मितसुत्कटम्‌ ॥ १० 
खस्तालसं जालगतं सुक्तजानुविसुक्तकम्‌ । 
उपविष्टस्थानकानां नवक भारते मते ॥ ११४ 
सममाकुशितं स्थानं प्रसारितविवरतिते । 
उद्राहितं नतं चेति सप्तस्थानानि षण्डणाम्‌ ॥ १२ 


1 6 १0]08 च 8 001] {6 [०८68 । 2 ^ तत्रा । 8 ५ ततयाधिक । 4 ^ 


वक्ष्यामागं । 5 ^» कृतेभवत्‌ । 6 ? सक्चमम्‌। 7 2 नाद्य । 8 ^? विष्छुभित । 9 ^8 
“लश्च । ० “छक । एप €ग0])श6€ 108 १९४९]0४०0 ए, 82 











10 


20 


29 


न° २० को०-उल्छास २, परीक्षण १ [ पुरुषस्थानकानि 


एवं समासतः पुंसां षट्‌ ख्ीणां तु सप्त च । 
'देरीयस्थानकानां च योविंदातिरिलयथ ॥ 
नवासने च षट्‌ सुक्षौ सवाणि मिलितानि तु । 
एकपश्चारादाचष् पश्चादात्कोटि भूपतिः । 
अथ लक्षणमेतेषां वक्ष्ये लक्ष्मविदां सुद्‌ ॥ 


[ पुरुषसानकानि । | 


एकः पादः समो यच्र खपश्षे ज्यसितः परः । 
सादधद्वितालान्तरितो जङ्घा किञचिन्नता स्थिता ॥ 
विष्णुदेवतमेतत्‌ स्याद्‌ वेष्णवं सो्टवाितम्‌' । 
उत्ततैर्मध्यमेः पुंभिः प्रयोज्यं सुनिसंमतात्‌ ॥ 
प्रकरतिस्थस्य “संल पेऽनेककायोन्तरान्विते । 
प्रयोज्यं प्रतिरीर्षेण विष्णोश्चेयपरेऽभ्यधुः ॥ 
अपरे नाटयकर्जति सूच्रधारादिना जगुः । 
पादः पक्चस्थितः सोऽत्र यः पाश्वाभिसुखाङ्कलछिः ॥ 
स एव त्यस्रः किचिचेत्‌ पुरोदेखाभिसुख्य भाक्‌ । 
अन्तरालं यदच्र स्यात्‌ प्रखताङ्गषछमध्ययोः ॥ 
तदेव तालसंज्ञे स्यादिति खत्यविदो विदुः । 
उरः समुन्नतं यत्र कूषरां सशिरः समम्‌ ॥ 
कटीजानसमासन्न गाच्र तत्‌ सौष्ठवं मतम्‌ । 
अङ्ग खस्थान विश्रान्तं सन्नमियभिधीयते ॥ 
अचलस्थितिसंयुक्तं निषप्णमिति कील्यते । 
सौषटवेऽङ्गमनत्युचमचश्वलमङकुञ्जकम्‌ ॥ 
चलपादं च तत्‌ काये खभिरुत्तममध्यमेः । 
वैष्णवं स्थानमेतच चतुरस्रस्य जीवनम्‌ ॥ 
परथक्रटीनाभि चरौ करौ वक्षः समुन्नतम्‌ । 
वैणवं स्थानकं यत्र चतुरस्र तदुच्यते ॥ 

॥ इति वैष्णवं स्थानम्‌ ॥ १ ॥ 


नैः 


९२ 


१४ 


१५ 
९८ 
१९ 
२० 
२१ 
९२ 
२३ 


र्ये 


1 ^90 &1?€ ५16 16 पएकपञ्चारादायण्र €1९; + ^ 188 11811ए8 0 ५९॥- 
४0. 2 ४ दीञ्चीय० । 3 ^9५ सोष्ठवाच्छितम्‌ । ४०४ भ. को. सोष्ठबाश्चितम्‌ पृ. ६७६. 
4 40 संलेपनेक ° संखापे नानाकार्यान्तरान्विते सं. र. अ. ७ च्छो. १०३२. 





समपादम्‌ | च० र० को०-उद्टास २, परीक्षण ९ 


एकतालान्तरौ पादो समावङ्के च सौष्ठवम्‌ । 
समपादं च तद्‌ ज्ञेयं चतुराननदे वतम्‌ ॥ 
एतचोर्ध्वनिरीक्ायां खीकारे णा चा)रिषां तथा । 
लिगि ज्गि)त्रतिविमानस्थस्यन्दनयस्थेषु युज्यते । 
मध्यमानां विहङ्गानां कन्यावरङुतुले ॥ 


॥ इति समपादम्‌ ॥ २ ॥ 
न 


न भस्यूरू निषण्णौ चेत्‌ साधतालच्रयान्तरे । 
भूमेरूध्वं चरणयोस्तावदेवान्तरं ुवि ॥ 
व्यख्रपक्षस्थयोयेच्र वैदाखं स्थानकं तु तत्‌ । 
वैराखदैवतं स्थूलपक्षिणां वीक्षणे मतम्‌ । 
अश्वानां वाहने वेगदाने पेरणकर्मणि ॥ 

॥ इति वैराखम्‌ ॥ २॥ 


एकतालान्तरौ च्यस्रौ पादौ पक्षस्थितौ सुवि । 
कटीजान॒समावृरू साधेतालद्रयान्तरे ॥ 

निषण्णौ गगने तत्‌ स्यान्मण्डलं राक्रदैवतम्‌ । 
चतुस्ताखान्तरौ केचिन्मण्डटे चरणं (एणौ ) जयुः ॥ 
वीक्षणे गरुडादीनां नियोज्य गरूडवाहने । 
घनुर्वजञादिराख्राणां मोक्षणे च सुनेर्म॑तात्‌ ॥ 


॥ इति मण्डलम्‌ ॥ ४॥ 


व्यो्चि वामो निषण्णोरः पूर्वमानेन दक्षिणः । 

अग्रे प्रसारितः पश्चतालं' च्य च तद्द्रयम्‌ ॥ 

आलीढं स्थानकं तत्तु विज्ञेयं सुद्रदैवतम्‌ । 

ईष्योक्रोधक्रतो जस्पः कार्थस्तनोत्तरोत्तरः ॥ 

वीररोद्रक्रते मह्संघषौस्फोटमादिकम्‌ । 

अस्मिन्‌ संधाय राखाणि प्रलयालीटं समाभ्रयेत ॥ 
॥ इत्याटीटढम्‌ ॥ ५॥ 


११९१ 


२५ 


ह. 


२.५ 


10 


२८ 


२९ 


३२० 


३१ 


20 


२२ 


२३ 


३४८ ‰ 





1 480 ° तारां ५ पञ्चतां परसारितः। सं. र. अ. ७ श्छोक १०४९. 2 ^90 


काया नेतो० ५. कायैस्तेनोत्तरोत्तरः । सं, र, अ. ७ श्छ. १०५०. 








११२ 





न° २० को०-उल्छास २, परीक्षण ९ [ खरीस्थानकानि 


एतद्विपर्थयात्मयालीढं रुद्राधिदेवतम्‌ । 
संघानीकृूतराखरस्य परत्यालीडेन मोचनम्‌ ॥ ३५ 
॥ इति प्रत्यारीढम्‌ ॥ ६ ॥ 


प्राचां चतुणणीमेतेषां प्रयोगो नाव्यदत्तयोः । 

नास्यैकगोचरस्तज्ज्ञैरन्तययोः परिदृदयते । | 

नर्तने स्थानषद्भस्य केचित्‌ पञ्चविधेऽभ्य घुः ॥ ३९ 
॥ इति षट्‌पुरुषस्थानकानि ॥ 


[ खीस्थानकानि । | 


आयतं स्थानकं तत्तु यत्र तालान्तरे स्थितः। | 


वामङ्यसरो दक्षिणश्च समो वक्षः ससुन्नतम्‌ ॥ ३७ 
प्रसन्नं वदनं हस्तो नितम्बे दक्षिणोऽपरः । 
समः समुन्नता चात्र कटी पद्माधिदैवतम्‌ ॥ ३८ 
एतदा भाषणे काये सखीप्रियतमादिभिः। 


कत समीह(१ि )ताखु स्यात्‌ कर(१ क्त )ताख च गतिष्विदम्‌॥ ३९ 


क 


रङ्ावतरणारम्मे पुष्पाञ्जलिविसप(१जे ने । 

आवाहने विसर्गे च तजेने प्रतिषेधने ॥ ० 
मानावलम्बने गर्वे गाम्मीर्येऽमषंकर्मणि । 

ईष्यौभिलाषप्र भवे खीणामङ्गलिमोटने ॥ ४१ 
एतत्‌ खरीस्थानकं कां परवेद पुरुषैरपि । 

केचनोचुः' स्रीभिरेव पूर्वरङ्ग पयुञ्यते ॥ र्‌ 
प्विद्धेष्वपि पा्रेषु त्वभिनेयानभि८ ति)कमात्‌ । 

एतत्‌ स्थानं प्रयोक्तव्यमिति केचन मन्वते ॥ े३ 
इदं स्थानं प्रयुज्याथ रङ्गावतरणाद्यः । 

कर्तव्या हस्तपादादिप्रचारे र्चिरैयताः ॥ चे 


॥ इत्यायतम्‌ ॥ ९ ॥ 
न 


एतत्पादविपयोसखषद वहित्थे भ्रक्ितितम्‌ \ 


दुरोधिदेवते चेतदवदित्थस्य सूचकम्‌ \\ २५५ 


खाभाविके च संलापे तुष्टौ चिन्ताविचारयो; । 
क 
1 ^50 केचनोप्यू° । 








अश्वक्रान्तम्‌ ] ख० र० को०-उलास २, परीक्षण १ 


विस्मये च विलासे च वरभायीवलोकने । 
रीरायां भूरिसो भाग्यगवजे खाङ्वीक्षणे ॥ 


॥ इत्यवहित्थम्‌ ॥ २ ॥ 
>} 


एकः पादः समस्तस्य पाष्णिदेरां गतोऽपरः । 
सूचीतालान्तरे चाथ समः पाश्वं खके स्थितः ॥ 
अश्वक्रान्ते तदा ज्ञेयं भारती चास्य दैवतम्‌ । 
अश्वस्यारोहणारम्मे स्वलिते गोप्यगोपने ॥ 
प्रसूनस्तबकादाने तरुदराखावलम्बने । 
खाभाविके च संलापे विगट्द्रुख्रधारणे । 
विश्रमे ललिते चेव प्रयोक्तव्यमिदं स्ख्रतम्‌ ॥ 


॥ इत्यश्वक्रान्तम्‌ ॥ ३ ॥ 


गति कतु सुदता यन्नोदयैव नर्तकी । 
एकं पादसुदास्ते तदगतं न ¢ च)गतं तथा । 
गतिस्थिव्योरनिंरोषेन स्थानकं स्याद्रतागतम्‌ ॥ 


॥ इति गतागतम्‌ ॥ ४॥ 


। किञिद्विवलितं गाञ्च तदिश्चु चरणो यदा। 
कनिष्टाश्िष्ट भूष््ठो मूलम्नाङ्गलिकापरः । 
तदेतद्रलितं ज्ञेयं साभिराषविलोकने ॥ 

। ॥ इति बकितम्‌ ॥ ५॥ 





एकः पादः समस्त्वन्यः कुशितो्ध्वतलाङ्कलिः। 
अग्रे तथोर्ध्वगो हस्तो ककंटो मोहि टि)ताभिषे८ धम्‌) । 
कामावस्था सवौखु बिनियोगोऽस्य कीर्तितः ॥ 
॥ इति मोटितम्‌ ॥ ६॥ 


परिवर्तनतोऽङ्ानां प्रष्टतो विनिवर्तते तितम्‌) ॥ 
॥ इति विनिवतिंतम्‌ ॥ ७ ॥ 
॥ इति सप्त सखरीस्थानकानि ॥ 


1 80 ५10] स्य । 
१५ चृ° र्‌० 





११३ 


दे 


दै9 5 


ठ 


2९.10 





10 


15 


20 


2 








न° र० को० -उल्टास २, परीक्षण ९ 


[ देशीख्थानकानि । ] 


मिथः श्छिष्टकनिष्टौ च चरणौ कुशचितो यदा । 


खस्तिकौ संहतस्थाने खस्तिकं कीर्तितं तदा ॥ 
॥ इति स्वस्तिकम्‌ ॥ २ ॥ 


तिर्यञ्चौ चरणौ पार्ष्णिसंगतौ वधेमानके ॥ 
॥ इति वधेमानम्‌ ॥ २॥ 
नैः 


चरणौ वधमानस्थौ वितस्त्यन्तरितो यदा । 
करः 
षडङ्कलान्तरौ यद्वा नन्दयावते तदोदितम्‌ ॥ 
॥ इति नन्यावतेम्‌॥ २॥ 
नः 


अङ्कौ च तथा गुल्फौ पादयोश्चेन्मिथो युतौ । 


देहे खाभाविके तत्‌ स्यात्‌ संहत स्थानकं वरम्‌ । 


विनियोगोऽस्य कथितः पुष्पाञ्जछिविसजने ॥ 
॥ इति संहतम्‌ ॥ ४॥ 


देहः खाभाविको यच्र वितस्त्यन्तरितो समौ । 
पादौ तत्‌ समपादाख्यं समान्नातं महीभता ॥ 
 ॥ इति समपादम्‌ ॥ ५॥ 
नैः 


समस्यैकस्य पादस्य जालुमूधि यदीतरः । 
बाद्यपार््वेन लम्रोऽद्धिबाद्यपार्श्व तदादिरात्‌ । 
एकपादं सुनिभ्रष्ठः स्थानकं स्थानवित्तमः ॥ 
॥ इत्येकपादम्‌ ॥ ६॥ 
५ | 


भूमिलमप्राङ्गरीषृष्ठः पश्चात्पादस्तथेककः। 
परापरः समो यच्र पृष्टोत्तानतलं हि तत्‌ ॥ 
॥ इति पृष्टोत्तानतलम्‌ ॥ ७॥ 

नैः 
अश्टाद राङ्क यत्र वधेमानस्थपादयोः । 
अन्तरं चतुरे; पोक्तं चतुरखं मनोहरम्‌ ॥ 

॥ इति चतुरस्रम्‌ ॥ ८ ॥ 
नैः 





क स्वस्तिकम्‌ 


५ 


५७५ 


५९ 


५9 


५८ 


५९ 


३१ 


श 1 भरु° र० को०~उल्छास २, परीश्चण १ 


पाष्णिविद्धे भवेत्पाष्णिरङ्खष्टशछेषिणी सदा ॥ 
॥ इति पाष्णिविद्धम्‌ ॥ ९ ॥ 


नैः 
पाष्णिः पाश्वोन्तरस्थान्तः पार्षणिपा्वगते भवेत्‌ ॥ 


॥ इति पाष्णिपाश्वेगतम्‌ ॥ १० ॥ 
नैः 


समपादागमतः किखिदपरश्चरणौ यदा । 


वाद्यपाश्वेतस्ति्यक स्यादेकपा्वगतं तथा ॥ 
॥ इ्येकपाश्वेगतम्‌' ॥ ११ ॥ 
नैः 


समस्य चरणस्य।न्यश्चतुरङ्कलमानतः। 
तियेकुञ्चितजानुः स्यादेकजालुनते भवेत्‌ ॥ 


॥ इत्येकजायुनतम्‌ ॥ १२॥ 
नैः 


पाष्ण्यो समौ पराघत्ते कनि्ठाङ्ग्टकौ मतौ ॥ 
॥ इति परावृत्तम्‌ ॥ १२॥ 
नैः 


दरावृङ्गी पाष्णिजङ्कोरुश्छिष्ट भूमी प्रसारितौ । 
तियेग्‌ भवेतां चेत्‌ स्थाने समसूचि [त]वोदितम्‌ ॥ 
॥ इति समसूचि ॥ १४॥ 


युगपत्‌ पुरतः पश्चात्‌ सूचीपादौ प्रसारितौ । 

पथग्वा कथितं स्थानं प्राज्ञेविषमसूचि तत्‌ । 

चरणौ भूमिसंलग्रजानुगाल्पौ कचिन्मतो ॥ 
॥ इति विषमसूचि ॥ १५॥ 


भूसंलम्रोरुपाष्णिः स्यादेकस्तियक प्रसारितः । 
अन्योऽङ्धिः कुञ्चितो यत्र खण्डसूचि मतं तदा ॥ 
॥ इति खण्डसूष्ि ॥ १६॥ 


समस्याङ्ः परः पादः कुितीकरलय प्ष्ठलः । 
जाजुसंधिसमत्वेनोर्क्षप्स्तद्‌ ब्राद्यसुच्यते ॥ 
॥ इति ब्राह्मम्‌ ॥ १७॥ 


एकं कृत्वा समे पादमीषदन्यस्तु कुञ्चितः । 
पुरः प्रसारितस्तियेगेतत्‌ स्याद्रैष्णवं तदा ॥ 
॥ इति वैष्णवम्‌ ॥ १८ ॥ 
ध. 








1 ^+56 “तकम्‌ | 


यावक्यं 





११६ न° र० को०~उल्वास २, परीक्षण १ [ उपविष्ठस्थानानि 


समस्या्गस्तु सव्यस्य जालुकीषंसमः परः । 
उद्धतो दक्षिणः पादः कुख्ितः दौवमत्र तत्‌ ॥ ७२ 
 , ॥ इति रौवम्‌ ॥ १९ ॥ 
नैः 





वामोऽग्रे कुखितः पश्चादन्यः पादस्तु जालना । 
5 पृथिवीं संभितो यच्र गारुडं स्यात्तदासनम्‌ ॥ ७३ 
॥ इति गारुडम्‌ ॥ २० ॥ 


वामः समः परो जालवबाद्यगुल्फमिलस्क्षितिः। 
चरणो वियते यच तत्‌ कूमोसनमीरितम्‌॥ ` ७ 
॥ इति कूर्मासनम्‌ ॥ २१ ॥ 


10 दक्षिणां तु यदा जङ्घां वामोरो; एृषठदेरागाम्‌ । 
विद धात्युपविष्टः सन्‌ नागबन्ध तदादिरदोत्‌ ॥ ७५५ 
॥ इति नागवन्धम्‌ ॥ २२ ॥ 
मः 


जानुनी भूमिसंलम्रे संयुते वियुते तथा । 
सोषटवाधिष्ठितं चाङ्गं तदा स्याद्रुष भासनम्‌ ॥ ७दे 


18 ॥ इति बृषभासनम्‌॥ २३ ॥ 
॥ इति अयोविरातिदेशी स्थानकानि ॥ 


[ उपविष्टखानानि । | 


हस्तावृरू कटिन्यस्तौ हृदयं किंचिद न्नतम्‌ । 
विस्तारिताशितौ पादौ स्थानं तत्‌ खस्थसुच्यते ॥ ७9 । 
8 ॥ इति स्वस्थम्‌ ॥ १॥ | । 
आसन संभितस्त्वेकः* परः किशित्परसारितः। 4 
हिरः पाश्वगतं यच्र तन्मदालसमीरितम्‌ । | 
विषदीत्सुक्यनिर्वेदमदेषु बिररेषु तत्‌ \\ ७८ 
॥ इति मदारुसम्‌॥ २॥ 


किञिद्ाष्पकटे नेते बाहिरी शिरः) 


1 0 °तिदे० । 2 480 एकपरः ्. एकः प्रसारितः किश्िदन्योऽ ब्रिस्त्वासना- 
धितः । सं, र, अ ७. छो १०९६ 


29 








= ] च र० को० उदास २, परीक्षण १ ११७ 


चिवुकक्षे्रगौ हस्तौ क्रान्तमेतददीरितम्‌ । 
रोके ग्लाने निर्जिते च विगृहीते नियुज्यते ॥ ७९ 
॥ इति कान्तम्‌ ॥ ३ ॥ 


नेत्रे निमीलिते पादौ यच्र विस्तारिताश्चिती । 

शजो विस्तारितावृर्वोर्विंष्कम्िः तमिदं मतम्‌ । 6 

भटा(द्रा)सने त्वनाब्रष्टेनियुक्तं ध्यानयोगयोः' ॥ ८० 
॥ इति विष्कम्भितम्‌ ॥ ४॥ 


समौ पादावासनं च सममस्प््टभूतटम्‌ । 
स्थानं तदुत्कटं योगध्यानसंध्याजपादिषु ॥ ८१ 
॥ इत्युत्कटम्‌ ॥ ५ ॥ 10 
1 - 





दारीरमरसं नेतरे मन्थराकारधारिणी । | 
हस्तौ स्रस्त विखुक्तो च तदा स्रस्तासं मतम्‌ । 
व्याधिमृच्छोमदग्लानिहानिभीतिषु तन्मतम्‌ ॥ ८२ 


॥ इति सख्रस्ताटसम्‌ ॥ ६॥ 
भ 


जानुनी भूमिसंस्थे चेत्‌ स्थान जागत तदा । 15 

होमे देवाचैने दीनयाचने खगद रोने । 

द्धपसादने चैतत्‌ कुसक्वत्रासने तथा ॥ ८३ 
॥ इति जाचगतम्‌ ॥ ७॥ 

सुक्तजानृत्करस्यैव जान्वेकं भूमिष्षठगम्‌ । 

हवने सान्त्वने चैव सज्नने साधुकतेके । 

प्रसादने मानिनीनां विनियुक्तं महषिंभिः॥ ८ये 
॥ इति सुक्तजाञु ॥ < ॥ 


भूमिपातो विखुक्तं स्याद्धानि(१ व )ऋन्दादिषु स्सरतम्‌ ॥ ८५ 
॥ इति विमुक्तकम्‌ ॥ ९ ॥ 
॥ इति नवोपविष्स्थानानि ॥ | ५ 








1 ^80 विष्कुम्भितम्‌ । ४ 866 ₹९786 10 81 +€ {00४0#6. 2 ^80 
धान्य । ण. योगे ध्याने भवेदेतत्‌ स्वभावेन यदासने । सं. र. अ. ७ छो. ११००. 





10 


20 








११८ न° र० को०~उल्ास २, परीक्षण १ [ सखुक्तस्थानकानि 


४ 


[ सुप्तथानकानि । ] 


उत्तानवदनं खुं खरस्तसुक्तकरं समम्‌ ॥ ८६ 
॥ इति समम्‌ ॥ १॥ 
>: 


आकुितं स्यादाविद्धजालु चाकुथिताङ्गकम्‌ । 
 छीतातीभिनये तस्य विनियोगः स्तो बुधैः ॥ ८७ 


॥ इत्याकुञ्चितम्‌ ॥ २॥ 
४ 


प्रसारिते सुजामेकासुपधाय प्रसारिते । 
सुं जानुनि तत्स्थानं सुखसुसे परकीतितम्‌ ॥ ८८ 
॥ इति प्रसारितम्‌ ॥ २॥ 


राखक्षतादिके सुप्रमधोवक्रं विवतिंतम्‌ ॥ ८९ 
॥ इति विवर्तितम्‌ ॥४॥ 


कूषैराधिष्ठितक्षोणि स्कन्ध न्यस्तरिरस्तथा । 
सुप्रसुद्राहितं परोक्तं प्र भो्लीरायवस्थितौ ॥ ९० 


॥ इत्युद्धाहितम्‌ ॥ ५॥ 
नैः 


सपं खस्तकरद्रद्रमीषत्प्रखतजङ्ककम्‌ । 
तत्‌ स्थानकं नतं खेदश्रमालस्यादिषु स्तम्‌ ॥ ९१ 
॥ इति नतम्‌ ॥ ६ ॥ 
॥ इति षट्‌ सुप्तस्थानकानि ॥ 
नैः 


ध्यानं वैष्णव मन्वहं प्रकुरुते रों तदा पूजनं 

ब्राह्यं धर्ममधिष्ठिते८ तोन कुरुतेऽन्यस्मै नतं खं रिरः। 

यत्‌ खस्थं च मदालसं गतमतः कान्त दुहृन्मण्डलं 

सोऽय सां प्रतसुत्कटं वितनुते तन्नागबन्धं सुधीः ॥ ९२ 
इति श्रीराजाधिराजश्रीङ्कम्भकर्णमहीमहेन्दरेण विरचिते संगीतराजे षोडशसादख्यां 
सङ्गीतमीमां सायां न्रयरल्नकोशे चारिकोहासे स्थानकपरीक्षणं प्रथमं समाप्तम्‌ । 





1 80 स्कन्ध च्य । 60711816 स्कन्घन्यस्तशिरः \ सं र, अ, ७ च्छो, १९०९. 
0 १०ु)8 ४06 गो\016 २९४३०, प 


















$ |] न° र० को०-उल्ास २, परीक्षण २ ११९ 


दवितीयोष्छासे द्वितीयं परीक्षणम्‌ । 
विशिष्टा हरिणड्तानि दधती तियञ्जुखा कातरा 
जकङ्ालङ्कनिकां गति प्रकुरुते तन्मन्द्रिणा ताडिता । 
विदयुद्धान्तिवदोन वैरिवनिता यस्योस्वेणीयुतेः 


सत्रासं शुजगोवचितं विदधती नो कस्य हास्यारस्पदम्‌ ॥ १५ 
| चारी । ] 

चारीपदं तत्र चरे धातोरियं ततो ङीषि च भाव इष्टम्‌ । 

कराश्चितस्तचरणप्रदिष्टस्तत्साधकत्वेऽतिदायेन धीरैः ॥. २ 


विचिच्रजङ्ाचरणोरुकयव्यञिताक्रियाज्ञेगेदिताच्र चारी । 
भेदास्तदीयानभिदध्महेऽतो सुनिपरणीतं निगमं निरीक्ष्य ॥ ३10 
तच्राङ्गिणैकेन हि जायमाना चारीति चार्यैव तु कथ्यतेऽत्र । 
सेवाच्र पादद्रयनिर्भिता चेच्चारी प्रदिष्टा करणं सनीन्द्रैः ॥ ४ 
चत्तस्य चोक्तं कर णात्प्थत्तवेनेतद्यतोऽदश्चरणप्रधानम्‌। 
सैवेह धाचा)रीकरणच्रये[ण] विनिर्मिता खण्डमिति प्रसिद्धा ॥ ५ 
नैवा चतुर्भिखिभिरेव साध्या चारी स(म)ता मण्डल मन्न खण्डेः । 15 
उ्यस्रे भव८वे)व्या चिभिरत्र खण्डेः खण्डे[अतुर्भि]अतु[रासख्के तु ॥ ९ 
सेयं प्रदिष्टा द्विविधेह भोमील्याकारिकीयव च मार्गजाताः । 
प्रयेकराः षोडदा भसिजाता आकाराजा' देराभवाद्विधाच॥ ७ 
चिरात्सपश्चाः किल मोम्य इष्टा एकोनिता विंरातिरभ्रजाताः । 
पश्चारादुक्ता अधिकाथ्चतुभिरुभय्य एवं मिकितास्तु जाताः ॥ ८२0 
तन्मा्मजा देचाभवा मित्वा जाताश्च चार्यः षडरीतिसंख्याः । 
हस्ते तथा चाभिनये च गयां पादो यदा यो नरकेष्सितः स्यात्‌ ॥ ९ 
तदीयसंपत््युवितात्र चारी कायो परा तुचितमादधाना । 
अन्योन्यमेवं नियमादियं तु व्यायामवाच्या भवतीह चारी॥ १०. 
अथोदि्ामः खल ताः समस्ता वि भज्य चारीखनिसंमतेन । 
तछ्छक्षणं चाभिदधे निरीक्ष्य खुनिप्रणीतान्निखिलान्निबन्धान्‌ ॥ ११ 


नै 


29 


1 80 म्र । 111 ^ 116 &पप्रऽए्18 18 8०.80९} €0. 2 426 आकाद्ाजाता- 
देदाभवा द्विधा व च । 











न क = 
~ न्म जानकर सय ~ या ~ न्वः - - --अ्-~ ~ 
षि 


१२० 


19 


15 


20 


2 


नर र० को०-उद्ास २, परीक्षण २ 


[ मागेचायैः। ] 
समपादा स्थितावतो राकटास्या च विच्यवा । 
अध्यर्धिकछा चाषगतिरेलकाक्रीडिता तथा ॥ 
समोत्सरितमत्तह्टीमत्तल्युत्खण्डिताडता । 
स्पन्दितापस्पन्दिताख्या बद्धा च जनिताभिधा ॥ 
उरूढृत्ते्यथ ब्रूमः षोडराकादिकीरिमाः । 
अतिक्रान्ताप्यपक्रान्ता पाश्वक्रान्ता खगष्टुता ॥ 
ऊर्ध्वजान॒रलाता च सूची नृपुरपादिका। 
दोलापादा दण्डपादा वियुद्धान्ता भ्रमयेपि ॥ 
ुजङ्त्रासिता क्षिप्त! विद्धो ्ृत्तेति कीर्तिता । 
मरताभिमताश्नार्यो दरा्चिार्मिलितास्तु ताः ॥ 
ध 

[ मोम्यश्चायैः। ] 
स्थानेन समपादेन कृत्वा पादौ निरन्तरो । 
नटः समनसौ तिष्ठेत्‌ समपादा तदोदिता ॥ 


[ मागैचायैः 


९२ 


९२ 


मल्‌ सा त) चारी चरणतो( तः ) प्रोक्ता कथमियं तथा । 


यतः स्थानसमा नैवं प्रचारस्य तु योग्यताम्‌ । 


अङ्गीकृत्य प्रवर्तेय चारीस्थानेऽप्यसौ ततः ॥ 
॥ इति समपादा ॥ १॥ 


चरणान्तरपार्श्वं चेन्नीत्वाग्रतटसश्चरः । 
अन्तजगील॒ खस्तिकत्वं प्राप्यते च तथेतरः ॥ 
खपाश्वं नीयते पादो विकरुष्येतेन चेत्तदा । 


स्थितावता भवेचारी, 
॥ इति स्थितावर्ता ॥ २ ॥ 


क्करास्या पुनयेथा \\ 
प्रसारितो भवेद्यत्र पादोऽग्रतलसञ्चरः । 
उद्वाहितसुरो देदपर्व भागः ससुन्नतः। 
हाकटक्ेषणे चास्या विनियोगः प्रकीतितः ॥ 


॥ इति शकटास्या ॥ २॥ 
नैः 


२० 


२१ 


= 
1 96 ज्ञानेन; ५. स्थानकं समपादाख्यमास्थाय धरणो क्रमात्‌ । बेमः †" भ. को. 
पु. ७०२. 





विच्यवा |] न° र० को०-उ्टास २, परीक्षण २ १२१ 


विच्युतौ समपादात( या)अरणौ चेत्तलाग्रतः। 
निकुदयेतां धरिणीं विच्यवा प्रोच्यते तदा ॥ २२ 


॥ इति विच्यवा ॥ ४॥ 


नद 
वामः पादो दक्षिणांहेः पारश्वदेदो निपाल्यते । 
ततोऽपखलय दक्षः खे पार्श्वे उ्यसखतया स्थितः ॥ २३ 5 
साधतालान्तरत्वेन वामे पार्श्वे तथैव चेत्‌ । 
दक्षिणो जायते ज्यस्रस्तदा साध्यर्धिका भवेत्‌ ॥ रथे 
॥ इत्यभ्यधिका ॥ ५॥ 


दक्षिणे८ णा्गिं तालमात्रं पुरः स्म( कर)त्वा द्वितालिकाम्‌ । 

पृष्टे याते समं पादावीषदुत्पुतिपूर्वकम्‌ ॥ २५.10 

दरतोत्छ्तोऽपखयेव चरणावुपस्षतः। 

पुनरुत््लयोऽपखत्य कुयोतासुपसर्पणम्‌ । 

सं्रासादिव यत्रेयं वुधैश्याषगतिः स्थता ॥ रदे 

॥ इति चाषगतिः ॥ ६ ॥ 

कि्चिदुत्ष्लय पततो यतच्राग्रतलसश्वरौ । 15 

कमेण चरणो सेयमेलकाक्रीडितोदिता ॥ २७ 
॥ इत्येटकाक्रीडिता ॥ ७॥ 


निहितेऽन्यस्य पादस्य मध्येऽग्रतलसश्चरे । 

क्रते जङ्घा खस्तिकेऽन्यपादेऽग्रतलसश्चरे ॥ २८ 

घूरणन्तौ यत्र कुवोतिऽपखति चोपसर्षणम्‌ । 20 

समोत्सरितमत्तल्टी चारी मध्यमे भदे ॥ २९ 
॥ इति समोत्सरितमत्तट्टी ॥ ८ ॥ 


> 
अधेत्यस्रौ यत्र पादौ जक्घाखस्तिकमागतो । 
भूमिश्छि्टाखिलतलो पूर्णन्तौ वोपसर्पतः। 
अथापसपेतः सोक्ता मतष्टी तरुणे मदे ॥ ३० % 
॥ इति मती ॥ ९ ॥ 
ध. 


अंहिः कनिष्ठयाङ्गल्या तथाङ्ग्टेन च कमात्‌ । 
१६ च्रृ° रन्न 





१२२ 


[1 
111 
न सा 


त > = ~> दक 


10 


25 





च ० र० को०-उल्टास २, परीक्षण २ 


रेचकस्यानुसारेण चानैः कुयोद्धतागतम्‌ । 
यच्र सोत्खण्डिता हस्तो रेचितोऽत्रेति केचन ॥ 
॥ इत्युत्खण्डिता ॥ १० ॥ 


अग्रेण चाथ पेन यच्नाग्रतलसश्चरम्‌ । 


ताडयेच्चरण पादः समः सोक्ताड़तिएभिधा ॥ 
॥ इत्यड़िता ॥ ११॥ 
> 


पश्चतालान्तरं ति्गह्किदेक्तः प्रसारितः । 
निषण्णोरुसमो वामः स्पन्दिता सोच्यते उुधेः ॥ 
॥ इति स्पन्दिता ॥ १२॥ 
८ 


एवैवाङ्विपयासाचायपरपन्दिता मता ॥ 
॥ इत्यपस्पन्दिता ॥ १२ ॥ 
> 


खस्तिकीक्रलय जङ्घ दे उव्विलनमाचरेन | 


भङ्न्त्वाथ खस्ति्कं पादौ क्रियेतां मण्डलश्रमम्‌ । 
ततः पार्श्वं गते ख खं यन्न ब्द्धेति सा मता॥ 
॥ इति बद्धा ॥ १४॥ 


नैः 
वक्षःस्थो सु्िको हस्तः पादोऽग्रतलसश्वरः । 
अन्यकरा यथाचरो भ चारी सा जनितोच्यते ॥ 
सुख्या पाद्क्रिया चास्यामितिकर्तव्यतेतरा । 
एतां देरी विदः केचिदाहुसुखल पादिकाम्‌ ॥ 

॥ इति जनिता ॥ १५ ॥ 
पार्णिरङ्करग्रतलसश्चरस्य यदा भवेत्‌ । 
अन्याङ्किष्छाभिसखखी जङ्का च विता यदा ॥ 
एतद्विपययाद्राथ जङ्घा च नतजानुका । 
स्यादन्यजङ्खाभिखुखी लल्ञष्योदौ नियोजिता 


ऊरूद्त्ताभिधा चारी चारीविद्धिस्तदोदिता । 
॥ इति ऊरूढत्ता ॥ १६ ॥ 


नैः 


1 ^580 अन्यक्यरा । 


[ उत्खण्डिता 


३१ 


२२ 


र 


र्ये 


२५. 


रदे 


३७ 


३८ 


३९. 








इ ] नर र० को०-उल्ास २, परीक्षण २ १२३ 


नियुद्धयुद्धयोरेता अङ्गहारेषु च स्मृताः ॥ ४० 
॥ इति षोडशा भोम्यश्चार्यः ॥ 


[ आकाशिक्यश्चायैः | ] 
अथ व्योमभवा चार्यो लश््यन्तेऽनु क्रमेण हि । 
एकस्याङ्ेशैल्फदेदो पादमुद्धुल्य ऊु्चितम्‌ ॥ ४१४ 
पुरः किचित्‌ प्रसायौथोत्क्षिप्य प्रकरतिलोखतिी)कचव,त्‌ । 
चतुस्तालान्तरेणाथो पुनरग्रे निपातयेत्‌ । 


अतिक्रान्ताभिधा चारी यत्र सोक्ता मनीषिभिः ॥ धेर 
 ॥ इत्यतिक्रान्ता ॥ २॥ 
विधाय बद्धुं चारीं चेत्‌ कुशितं पादसुरिक्षपेत्‌ । 10 
तमेव निःक्षिपेत्‌ पाश्वे तदापक्रान्तिका भवेत्‌ ॥ ४३ 
॥ इत्यपक्रान्ता ॥ २ ॥ 


कुशितं पादमानीयोद्ध सवपा तत्परम्‌ । 


भूमौ चेत्‌ पातयेत्‌ पाषण्या' पा््वक्रान्ता तदोदिता ॥ भ 
सा पाश्वेदण्डपादेति प्रसिद्धा तद्धिदामियम्‌ । 15 
अन्योरुक्चेत्रपथेन्तसुतिक्षप्य चरणं ततः । 

पृथ्व्याखुद्धदितं न्यस्येद्धिरोषं केचनाभ्यधुः ॥ ये५, 


॥ इति पाश्वैक्रान्ता ॥ ३॥ 
तैः 


उरिक्षण्य कुश्ितं पादसुत्छलयाधो निपाद तं । 

पराश्चितां च जङ्घां च पृष्ठदेरो क्षिपेदययदा । % 

खगष्धता तदा चारी ज्ञेया कश्चकिकतका ॥ छदे 
॥ इति स्रग्ता ॥ ४॥ 


उत्क्षघकुशितस्याङ्गनान स्तनसम नयेत्‌ । 

स्तन्ध कुयोदन्यमङ्किमनैव मङ्पयन्तरेऽपि चेत्‌ । 

कुयोत्तो्ध्वजानुः स्यादिति चारीविदां मतम्‌ ॥ ४७ % 
॥ इत्युध्वेजानुः ॥ ५॥ 


1 ४0 °वित्‌ । % ^ पाष्ण्यो पार्श्व । ०. पातयेत्‌ पाष्णिना भूमौ पाश्वक्रान्ता 
प्रकीर्तिता । वेमः 1. भ, को. पृ. ३६७. 

















१२४ चर र० को०-उल्ास २, परीक्षण २ ि अलाता 


| पृष्ठं प्रखतपादस्य परोवभिसुखं तलम्‌ । | 
क्रत्वा पारणि; खपाश्वं क्ष्मान्यस्त्व८ स्ता)लाता तदोदिता ॥ ४ 
॥ ॥ इत्यटाता ॥ £ ॥ 


कुश्चितं पादसुरिक्षप्यास्यैव जङ्घां प्रसाये च । 
¢ जान्वन्तां वोरूपयेन्तां तं पादं पातयेद्धुवि । 

अग्रयोगेन यस्यां सा चारी सूचीति कीतिता ॥ ४९ 
| ॥ इति सूचि ॥ ७॥ 


अश्चित चरणं नीत्वा पृष्ठतः पाष्णिना स्फिजम्‌ । 
स्पततं पाद८त)येदग्रतदेन धरणीतले । 


| 10 यत्र सा चारिका पोक्ता बुधैनपुरपादिका ॥ ५० 
॥ इति नृपुरपादिका ॥ ८ ॥ 
नः 


। 
| 
कुितं पादसुरिक्षप्य पाश्वेयोर्दोलयेत्‌ खानैः । 
पाष्ण्यौ न्यस्येत्‌ खपाष्ण्यौत (खपाश्वौन्तं) ' दोलापादा तदोदिता ॥ ५१ 
॥ इति दोखापादा ॥ ९॥ 


>: 
15 अन्यस्य पार्णिदेो चेन्नपुरं चरण नयेत्‌ । 
खदेहदेराभिमुखं जान्वग्रत्वेन वेगतः । 
अग्रे प्रसार्यते दण्डपादचारी तदोदिता ॥ ५२ 
॥ इति दण्डपादा ॥ १० ॥ 


>< 
पृष्ठतो वलितं रीष स्पष्टा भ्रान्त्वा च सपेतः। 
%0 पादः प्रसार्यते यस्यां विद्यद्धान्ता तदोदिता ॥ ५३ 
॥ इति विदयुद्धान्ता ॥ ११॥ 
नः 


अतिक्रान्तां विधायासुं पादं यसं विवतंयेत्‌। 
उयस्रपादतलभ्रान्लया भ्राम्यते सकलं वपुः । 


यच्र तां भ्रमरीं चारीमाह चारीबिदग्रणीः॥ ५ 
25 ॥ इति भ्रमरी ॥ १२॥ 


नै 


1 0 (दृक्षिणक्षेत्रान्तं स्वपार्श्वं निनीय ततोऽपि स्वपाश्वं दोख्येदिति 
दोखाकारेण नयेत्‌, ततः स्वपाश्च पाष्ण्यो निपातयेत्‌ । अ. गु. ०) ९३6 ३६. 


न भि भि क 


4 
व ~ | 





भुजङ्गत्रासिता ] चर° र० को०-उद्वास २, परीक्षण २ १२५ 


कुञ्चितं पादमन्योरुमूलदेरान्तसुल्क्लिपेत्‌ । 
पाष्णि नितम्बाभिखुखीं जानु कुयौत्‌ खपा््वगम्‌ ॥ ५५१ 
कटीजालुविंवर्तेनोत्तान पादतटं तथा । 


शखजङ्त्रासगमका खजङ्त्रासिता तु सा ॥ ५६ 
॥ इति भुजङ्गासिता ॥ १३ ॥ 4 
ग 


अन्यपाश्वे नयेत्पादं कुञ्चितीक्रलय यच्र च । 
तालत्रयान्तरोर्क्षि्च जङ्कयोः खस्तिकं ततः ॥ ५७ 
क्रत्वा तं पातयेद्धूमो पाष्णिभागेन यत्र सा । 

आक्िक्षा नाम चारी स्यादिति चत्यविदो विदुः ॥ ५८ 


॥ इत्याक्षिप्ता ॥ १४ ॥ 10 


नैः 
खस्तिकीक्रुलय विशिष्टे जङ्कृऽङ्गिं कुथितं ततः । 
प्रसाये पातयेत्‌ पाष्ण्यां परपार्ष्णिसमीपतः। 
खपार्श्वे वाथ तां चारीमाविद्धामभणन्‌ बुधाः ॥ ५९ 
॥ इत्याविद्धा ॥ १५॥ 


पादमाविद्धचारीकमन्योरूस्थितपार्णिकम्‌ । 16 
विधायोत्ष्वनं करत्वा ततो भ्रमरकं चरेत्‌ ॥ ६० 
तन्नि पात्य ततो भूमौ तथान्येन समाचरेत्‌ । 
अंहिणा यत्र तां चारीमुद्भत्तां मेनिरे बुधाः ॥ द 

॥ इत्युटत्ता॥ १६॥ 











नैः 
आसां रोषस्तु विज्ञेयः परि माषापरीक्षणे ॥ ६२२ 
॥ इति द्वातिशान्मागेचारीलक्षणम्‌ ॥ 


इति भरतमतेन मागेचारी- 
चेपदपतिर्निरदीषरत्‌ समस्ताः । 
रदनपरिमिता विलोक्य धीमा- 
नभिनवभारतिकासुखान्नितम्बा(बन्धा)न्‌ ॥ ६३ 
इति श्रीराजाधिराजश्रीुम्भकरणंमहीमहेनदरेण विरचिते संगीतराजे न्य[रत्र]कोशे 
चारीकोललासे छद्धचारीपरीक्षणं द्वितीयं [ समाप्तम्‌ | ॥ 











29 


१२६ 


ज्र ° र० को०-उद्ासं २, परीक्षण , 


दितीयोह्छासे ततीय परीक्चषणम्‌ । 


| मङ्गलम्‌ । ] 
नानादेरोषु य देवमेककालसुपासकाः । 
परयन्ति सदराकारं तस्मै सवोत्मने नमः ॥ 


[ देशीचायः । ] 
अव4थ)देरी(र)स्यचारीणाषुदेखः प्रतिपाद्यते । 
रथचक्रा पराव्रत्ततला नृपुरविद्धिका ॥ 
ति्यङ््रखा मराला च करिहस्ता कुलीरिका । 
विशिष्टा कातरा पार्णिरेचिताप्यूरुताडिता ॥ 
ऊरूवेणी तलोड्ृत्ता हरिणच्रासिका परा । 
अर्धमण्डलिका तियेद्कशचिता च मदालसा ॥ 
सश्वारितोत्कुिता च स्तस्भक्रीडनिका ततः । 
चारी लङ्कितजङ्काख्या स्फुरिताप्यपकुिता ॥ 
अपि संघद्िता खत्ता खस्तिका तलदर्दिनी । 
पुराव्यधैपुरादी च सरिका स्फुरिका ततः ॥ 
निकुट्का रताक्षेषाप्यडस्खछितिका परा । 
समस्खछितिका भोम्यः पश्च्चिरादितीरिताः॥ 
विद्युद्धान्ता पुरशक्षेपा विक्षेपा हरिणड्धता । 
अपक्षेपा च उमरी दण्डपादाद्धिताडिता ॥ 
जङ्कालङ्गनिकालाता जङ्कावतो च वेष्टनम्‌ । 
उद्वेष्टनमथोत्क्षेपः प्रषटोत्छेपश्च सूचिका ॥ 
विद्धा प्राव्रतसुद्धालः इलयचरैकोनविरातिः। 
आकारिक्य उ मय्यस्तु चतुःपश्वारादीरिताः । 
अथोदेरानरोधेन लक्ष्यन्ते कमतस्त्विमाः ॥ 


[ देदयो भोमचार्यः। ] 


चतुरसखं समे करत्वा संलभ्रौ चेत्‌ प्रदरोयेत्‌ । 
पादावग्रेऽ्य पृष्टे वा रथचक्रा तदा स्मरता ॥ 
॥ इति रथचक्रा ॥ १॥ 


1 ^50 उदास, प ९९186 60 &1₹68 उदारः । 








पराचृत्ततला नृ० र० वो०-उद्टाख २, परीक्षण ३ 


बहिश्चत्‌ प्ररत; पाद उन्तानिततल; पुन; \ 
पश्चादेरो तदा चारी चरावृत्ततला स्यृता \ 
॥ इति पराचत्ततखा ॥ २ ॥ 
नै 


चरणो खस्तिकीकरल् पाष्ण्यो; पादाग्रयोस्तथा । 
रेचितौ यत्र सा ज्ञेया चारी नूपुरविद्धिका ॥ 
॥ इति नृपुरविद्धिका ॥ २॥ 


वधेमानं समास्थाय पादौ चेद्‌ दरतमानतः। 


सव्यापसंन्य सरतस्तदा तियञ्चुखा भवेत्‌ ॥ 
॥ इति तियेड्घखा ॥ ४॥ 


नन्दयावतांसनाङ्गी चेत्‌ पाष्णिप्रपदरे चितौ । 


पुरः प्रसारितो चारी मराला साभिधीयते ॥ 
॥ इति मराखा ॥ ५॥ 


संहतं स्थानमास्थाय चरणौ यच्र घर्षति । 
धरणि पाश्वेदेशाभ्यां करिदस्ता तु सा स्मता ॥ 
॥ इति करिहस्ता ॥ ६ ॥ 


नन्दयावर्तस्थितावङ्घी तियेग्यस्यां प्रसपेतः । 


कुरीरिकेति सा प्रोक्ता चारी चलयविरारदैः ॥ 
॥ इति कुःलीरिका ॥ ७॥ 


विशिष्य पाष्णिविद्धायाश्चरणावुपसपतः 


यद्रापसपतः सोक्ता विशि चारिका बुधैः ॥ 
॥ इति विशिष्टा ॥ < ॥ 


नन्यावर्तस्थपादौ चत्‌ सरतः पृष्ठतो यदा । 
कातरा नाम सा चारी, 
॥ इति कातरा ॥ ९ ॥ 


सा चोक्ता पार्षिणरेचिता । 
यस्यां पाष्णिपाश्वेगते स्थाने स्थित्वाथ रेचयेत्‌ ॥ 
॥ इति पाष्णिरेचिता ॥ १०॥ 


२.७ 


९२ 


१३४ 


१ 


९५ 


९ 


12 


१.५ 


१८ 90 


25 


4: 





10 


20 


25 





2 7) 
र नि $ ९ । "गकर 
# च क 
१. रा 


च ° र० को०-उल्टास २, परीक्षण २ [ ऊखुताडिता 
पारस्णिरेकपदे स्थाने स्थितो भूम्याद्गिणाच्र चेत्‌ । 
ऊरु ताडयति प्रोक्ता तदोरुताडिता बुधैः ॥ २० 


॥ इत्यूरुताडिता ॥ ११ ॥ 
नः 


पाश्वोभ्यां यत्र चरणावूरूस्थसखस्तिकाक्रती । 
क्षितिसंघषेतश्चारीमूरूवेणीं तदादिरोत्‌ ॥ २१ 
॥ इत्यूरूबेणी ॥ १२ ॥ 


पादावग्रेऽङ्कली पृष्ठ भागेन सरतो द्रुतम्‌ । 
पुरतश्चेत्तदा चारी तलोदरुत्तेति संमता ॥ २२ 
॥ इति तरोद्रत्ता ॥ १३ ॥ 


 तचेऽङ्कयोः खस्तिकीक्रुत्य कुधिते वलितान्तके । 


उतष्लय निपतेतां चेद्धरिणच्नासिका तदा ॥ २३ 
॥ इति हरिणत्रासिका ॥ १४ ॥ 


नै 
पादौ यदा बहिनीतौ मूमिघषेणत ¦ चानैः । 
आवर्तेते' तदा प्राहुरधमण्डलिकां बुधाः ॥ रथै 


॥ इत्यधेमण्डलिका ॥ १५॥ 
नै 


तियेश्वं पादमाङ्कश्य यत्र तं परक्षिपेन्सुहुः । 
सा तियेक्कुश्िता चारी गदिता दल्यकोविदैः ॥ २५ 
॥ इति ति्यक्कुञचिता ॥ ६६ ॥ 


मत्तवद्यत्र चरणावितश्चेतश्च विहलौ । 
स्थाप्येते यत्र तामाहुञ्ारीमेतां मदारसाम्‌ ॥ २९ 
॥ इति मदारखसा ॥ १७ ॥ 


यदान्येनांहिणाऽन्यांऽहिरुतिक्षप्योतिक्षप्य कुःखितः। 
युज्यते तियगन्यस्तु सर्पेत्‌ सश्चारिता तदा ॥ २७ 
॥ इति स्चारिता ॥ १८॥ 


 एकैकमग्रतः पादौ न्यस्येदुलिक्षिप्य कुशिती । 


1 490 आवव्येते. ५. बहिर्नीतावावतंते । सं. र. अ. ७. छो. ९८५. 


सस्िखिका\ ० २० को०-उलस २, परीश्षण ३ ॐ 
यस्यां सोत्कुशिता नाम, 


॥ इत्युत्कुञ्चिता ॥ १९ ॥ 
नैः 


स्तम्भक्ीडनिका तथा । 
तिथक प्रखतपादस्य यदा पाश्वं स्प्रोन्सुहुः ॥ २८ 
तेन चान्यपादस्या,- 5 
॥ इति स्तम्भङ्ीडनिका ॥ २० ॥ 
नैः 


-थ स्याह्टक्कितजक्किका । 
खण्डसूच्यभिषे स्थाने तिष्ठन्नहिस्तु वेगतः । 
आकृष्य लङ्कथतेऽन्येन चरणेन तदा तु सा ॥ २९ 
इति छङ्कितजङ्घा ॥ २१॥ 10 


भूस्एरी पादपा्वौ चेत्‌ सरतो बेगतोऽग्रतः। 


स्फुरिता, 
॥ इति स्फुरिता ॥ २२॥ 
नः 


करमतोंऽदहिभ्यां कुचिताभ्यां तु पृष्ठतः ॥ ३० 
गव्यापङुचिता ज्ञेया, 15 
॥ इत्यपकु्चिता ॥ २३ ॥ 
नैः 


स्थाने विषमसूचिके । 
स्थित्वोत्ष्टल पतन्‌ प्रथ्व्यामही संघद्येयदा ॥ ३१ 
सोक्ता संघदटिता [ ग ०१2१ ] 

॥ इति संघट्टिता ॥ २४ ॥ %0 


भूम्यां चरणाग्रेण घाततः खत्ता निगद्यते ॥ ३२ 
॥ इति खुत्ता ॥ २५॥ 


नः 
पादोऽथ खस्तिकाकारकारितः खसिको मतः ॥ ३३ 
॥ इति स्वस्तिकः ॥ २६ ॥ 


, - 
सखस्तिकी चरणौ यत्र संहतस्थानके स्थितो । 8 
तियक पएथग्गतो वा्यपाश्वीभ्यां भूतल यद्‌] । 
सण्रातस्तत्र सा पोक्ता चारिका तलद्धिनी ॥ ३४ 
॥ इति तखददिनी ॥ २७॥ 
नैः 


१४७ त° रन्ने° 


`न 


१३० न° र० को०-उछ्वास २, परीक्षण २ 





पुराटिका मिथोंऽहिभ्यामुद्त्ताभ्यां निकुदृनात्‌ ॥ ३५. 
॥ इति पुराटी ॥ २८ ॥ | 


उदृचृत्तस्यैकपादस्य चरणेन निकुटनम्‌ । 
उदृचृत्तेन निकुटेन सा स्यादधपुरारिका ॥ ३६ 
४ ॥ इत्यधेपुरारी ॥ २९ ॥ 


सारिका सा सरयेकश्चरणोऽगरेः यदा तदा ॥ ३७ 
॥ इति सारिका ॥ ३० ॥ 
नै 


समाभ्यां चरणाभ्यां तु स्फुरिका सरणं पुर; ॥ ३८ 
॥ इति स्फुरिका ॥ २१॥ 


10 अग्रेणांहेः कुञ्चितेन स्थितिः प्रोक्तो निकुटकः ॥ ३९ 
॥ इति निकुटकः ॥ ३२॥ 


पञ्चाद्रयस्य पुरस्ताच चरण्येत्‌ परसायेते । 


भूमिं निकुदयेत्तेन लता्षेपस्तदा भवेत्‌ ॥ ० 
॥ इति रताक्षेपः ॥ ३३॥ 


1; = अदकुसखकितिका तियेक्‌ स्खलिते चरणे भवेत्‌ ॥ धे 
॥ इति अड्स्खकितिका ॥ ३४॥ 


युगपच्चरणौ यत्र पुरतः एृष्ठतोऽपि च । 


तिर्यक च स्खलितः भोक्ता समस्खलितिका तदा ॥ ४२ 
॥ इति समस्खि{तका ॥ २३५ ॥ 
‰0 ॥ इति पञ्चनिराद्धौमचायैः ॥ 
> 


[ देश्य आकाशचायः । ] 


पुरस्तादंहिखुल्क्षिप्य भ्रामयित्वाचिके द्रुतम्‌ । 
॥ भूमौ चेत्यस्यते परोक्ता वि्यद्धान्ता तदा बुधैः ॥ ण्डे 
॥ इति विदयुद्धान्ता ॥ १॥ 


% कुञ्चितं पादसुलिक्लप्य वेगाद्विस्तायं चेत्‌ पुरः । 

| विन्यस्येदवनौ सोक्ता पुरःसषेपाभिधा वुधैः ॥ दे 
| | ॥ इति पुरःक्षेपा ॥ २॥ 

| ^ न 


1 + पकाश्चरणोग्रे । ४० एकाश्च रोभ्र । 





विक्षेप ) च° २० को०-उद्छास २, परीक्षण ३ ९३९१ 


हुः प्रसाये चरणमग्रतो गगनाङ्गणे । 
आङुश्येत्तदा षोक्ता विक्षेपा नाम चारिका ॥ 2९९ 
॥ इति विश्षेपा ॥ २॥ 
भैः 


निपतेतां सखुरिक्षप्य यत्रांही संहतौ सुवि । 


हरिणीव तदा चारी विज्ञेया हरिणडता ॥ धद 5 
॥ इति हरिणद्ता ॥ ४॥ 


ऊरुर्ठ स्परोदं हिबाद्यपार््वेन यात्य । 
अन्यो नितम्बं निकटमपक्चेपा तदा स्मता। 9 
॥ इत्यपश्चेपा ॥ ५ ॥ 


कुश्चितश्चरणो यच्र वामतो दक्चतो भ्रमेत्‌ । 10 


डमरी स्यात्तदा, 
॥ इति उमरी ॥.६॥ 


1 
दण्डपादाचारी तदोदिता । 


पादौ खस्तिकमाव््यं ति्गररध्वं यदोरिक्षपेत्‌ ॥ ४८ 


॥ इति दण्डपादा ॥ ७ ॥ 15 
५ | 


यत्र विस्तारितावही तं कूत्वा परस्परम्‌ । 
गगने ताडयेत्तं चेत्‌ तदेनाचाङ्खिताडिता ॥ | ४९ 
॥ इत्यङ्गिताडिता ॥ ८ ॥ 
नः 


ईषदाकुितं पादमन्यपादेन लङ्कयेत्‌ । 
गगने चेत्तदा पोक्ता जङ्खा लङ्गनिका बुधैः ॥ ५० 20 
॥ इति जङ्गालङ्गनिका ॥ ९ ॥ 


अद्रिणा लङ्खयतेऽन्येन चरणः पृष्ठतो गतः । 
तदालाता विनिर्दिष्टा चारीनर्तनको विदेः ॥ ५१ 


॥ इत्यखाता ॥ १० ॥ 


नैः 
वहिभ्रेमणस्य चरणस्याङ्केरन्तभ्रमस्य च । %5 
तलं कमाजालुपाश्वे जालुप्ष्े च निःक्षिपेत्‌ । 
जङ्घावतौ तदा भोक्ता चारीनर्तनचश्चना ॥ ५२ 
॥ इति जङ्गावर्ता ॥ १९ ॥ 
नै 





10 


20 





त्र० र० को०-उद्ास २, परीक्षण ३ 


एकमन्येन पादेन वेष्येद्रेष्टन तदा । 


तदेव चलनं प्राहैलयवगणकार्मटाः ॥ 
॥ इति वेष्टनम्‌ ॥ १२॥ 


उद्वेष्टन वेष्टयित्वा पृष्ठतोंऽद्ौ प्रसारिते ॥ 
॥ इत्युदधे ष्टनम्‌ ॥ १२ ॥ 


पादमाकुखितं पृष्ठे पुरतो वा क्िपेदयदि । 
जानुपयेन्तसुत्क्षेपस्तदा चारी प्रकीतिता ॥ 
॥ इत्युत्क्चेपः ॥ १४॥ 


पष्ठतोऽस्मिन्‌ प्रयुक्ते च प्रषटोतक्षेपो भवेदयम्‌ ॥ 
॥ इति पृष्ठोत्क्षेपः ॥ १५॥ 


यस्यां विन्यस्य चरणं क्षितौ पाश्वं नतं पुनः । 
प्रसारयति तीक्ष्णाग्रं सा सूची गदिता बुधैः ॥ 
॥ इति सूची ॥ १६॥ 


चरणो खस्तिकीक्रयेकं किञ्िदोखयेत्‌ पुरः । 
कुतं चरणं यच्र सा विद्धा परिकीतिता ॥ 
॥ इति विद्धा ॥ १७ ॥ 


उदवत्तश्चरणो मूतिंरंठिता बलिता भवेत्‌ । 
यत्र तत्‌ प्राचतं ज्ञेय कामकेटिविवधेनम्‌ ॥ 

॥ इति प्रातम्‌ ॥ १८ ॥ 
ऋमेणोह्धाल्येदयच्र चरणौ गगने नटः । 
उद्यालः स तु विज्ञेयश्चारिकामूधेखु स्थितः॥ 

॥ इत्युद्खाखः ॥ ६९ ॥ 


इत्येकोनविदातिराकाशचायः । इत्युभय्यश्च तुःपश्चाशादे शीचायैः ॥ 
इति षडशीतिर्मागदेदी चायः । 


देरो देरोषु यत्कीतिरमला सर्वसङ्धिनी । 
विचरव्यत्र तेनेयं चारीपद्ध तिरीरिता ॥ 


तृतीयं परीक्षण [ समाप्तम्‌ | । 


[ वेष्टनम्‌ 


५२ 


यै 


५८५ 


द्‌ 


(५.9 


७५८ 


५९ 


29 


द६ 


इति श्रीराजाधिराजङकम्भकर्णमहीमहेन्द्रेण विरचिते संगीतराजे षोडशसाहरूयां 
संगीतमीमांसायां नृयरल्नकोदो चारिकोहासे देशीचारीटक्षण नाम 














रेचकलक्षणम्‌ ] ० र० को०-उद्टास २, परीक्षण ३ १३२ 
 [ कानिधेरुदृतं रेचकदेरीचायौदिविषयकं प्रकरणम्‌ ] 


[ रेचकानथ वक्ष्यामश्चतुरो सरनोिनान्‌ 


पादयोः करयोः कट्या ग्रीवायाश्च भवन्ति ते ॥ 

पाष्प्येङ्गष्टाग्रयोरन्तवहिश्च सलतं गतिः । | 

नमनोन्नमनोपेता घोच्यते पादरेचकः ॥ 6 ` 

परितो श्रमणं तुणे हस्तयो सपक्षयोः । 

यत्पयोयेण रचितं स भवेत्कररेचकः ॥ 

विरलप्रखताङ्गषटाङ्गटेस्तिथेरभ्रमेण च । 

सर्वतो भ्रमणं कव्याः कटीरेचकमूचिरे ॥ 

ग्रीवाया विधुतश्रान्तिः कथ्यते कण्ठरेचकः । | 10 

अङ्गहाराङ्गमप्येते जनयन्ति प्रथक्‌ फलम्‌ ॥ । 
॥ इति रेचकरुक्षणम्‌ ॥ | 


तत्र पादरेचक लक्षयति । पाष्ण्यङ्कषटथोरिव्यादि । 
'नमनोन्नमनोपेता अन्तगैतिभैवति तदा पाष्णीसन्नमनोपेता बहि- 
गेति भवतीति द्रष्टव्यम्‌ ॥ १ ॥ कररेचवः लक्षयति । परितो भ्रमण-1 
भियादि हंसपक्षयोहैस्तयोः पययेण रचितं तूर्णी पुरतो यद्धमणं 
अन्तवेहिश्चेलयर्थे वामदक्षिणहस्तयोरेकस्मिन्‌ हंसपक्षे अन्तश्र॑म्णं 
कुवंति तदन्यो वा भ्रमणं करोति एवं पययेण क्रियते चेत्‌ स कर- 


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11616 13 & 7060001 10 20 गं कलानिधि, २ ८०160 {कए 0) सं. र, 0 
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10 


19 


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22 





१३४ न° र० को०-उद्ास २, परीक्षण २ [ देशीचायः 


रेचको भवेत्‌ ॥ २॥ कटिरेचक लक्षयति सर्वो भ्रमणमिति' । तच 

ग्रमरीमेदेष्वलुगतं द्रष्टव्यम्‌ ॥ २॥ कण्ठरेचकं लक्षयति ग्रीवाया इति॥ 
अथवा ॥ ४ ॥-- 

कलानिधेभंध्यात्‌ ॥ मरतानुक्रमे सति कोदलाद्यक्तत्वाद्‌ द्रष्टव्यम्‌ । 
लोके सुडपःसंज्ञकाश्चारीविरोषा अपि देदीचारीष्वेवान्त भरता 


मन्तव्या । यथा 


[ देरीचायेः | 
अथ पादनिकुदाख्यचारीणां लक्षणं ब्रुवे । 


पादकुटटनचारी तु लोके खुड़पसंक्ञिका ॥ १ 
तस्यास्तु बहवो भेदा दात्र चोच्यते मया । 
सन्यापसन्यवलनं पादचारीषु चोच्यते ॥ २ 
निकुदनं तु पादेन ताडनं स्यान्महीतले । 

उदेाः क्रियतेऽन्वर्थञ्चारीणां सखो चितो मतः ॥ ३ 
पुरःपश्चात्सरा नाम पञ्चात्पुरःसरा तथा । 

चिकतोणचारी पश्चाच्च तथैकपादङटिता ॥ धे 
पादद्रयनिकुटराख्या पाद्स्थिति*निकुद्िता। 

करमपादनिकुटा च पाश्वेद्धयचरी तथा ॥ ५ 
चारी डमरूङुदाख्या उमसुद्रयकुटिता । 

पुरःश्चेपनिटा च पश्चात्कषेपनिकुटिता ॥ दे 
पा्वप्नेपनिकुहा च चतुष्कोणाख्यकुटिता । 

मध्यस्थापनकुटरा च तिरश्ीनाख्यकुटिता ॥ ७ 
चारी च पृष्ठल्टुलि(ठि)ता पुरस्ताह्टुलि(िता तथा । 
अलरोभविलोमाख्या प्रतिलोमानलोमिका ॥ ८ 
समपादनिकुटा च चक्रकुटनिका ततः । 

मध्यचक्रा ततो मध्यत्छटिता चक्र '(एवक्च्र)कुटिता ॥ ९ 
पञ्चविदातिसंख्या[ञ] कीर्तिता दयर्थयोगतः । 

एवमन्याश्च कर्तव्याश्चायेशान्वर्थलक्षणाः ॥ १० 


2८14 

] ० श्रमण कलानिधेर्मध्यात्‌ मिति । ^ 148 ५५ 81९ 1684410 0५ 
{11616 18 8 श्प ग तवनृल्मो 0) ;{ 176 चऽ: "कलानिधेर्मध्यात्‌"' । 
2 48० मधुपः कलानिधि सं. र. पृ. ३१३ । > ^^ सोचितो ०. खोचितो । क. नि. 
पृ. ३१३. (सं. र.) । 4 पाद्स्थिति । क. नि. पर ३९२ (सं, र.) । 5 ण. वक्च्रकुदटिता । 
क. नि. पृ. ३१३ (सं. र.) 








[व = ] न° र० को०-उल्टास २, परीक्षण ३ १३५ 


। पादशिक्ाख कर्तव्याः कर्तव्या याश्च नर्तने! । 


निकुट्य च तलेनादौ पुरःपश्चाद्धिधीयते ॥ ११ 

पादश्चाङ्कलिष्षठेन खस्थाने चापि कुटिः । 

पुरःपश्चात्सरा नाम सान्वथो परिकीर्तिता ॥ १२ 
॥ इति पुरःपश्चात्सरा ॥ १॥ ¢ 

सेव पश्चात्‌ पुरःक्षेपात्‌ परोक्ता पश्चात्पुरःसरा ॥ १३ 


॥ इति पञ्चात्पुरःसरा ॥ २॥ 


निवेदय८वेशि)तो ख८त्व)धः पादः स्थापितोऽङ्गरिणष््तः। 
निकुदितः पुरस्ताच पार्श्वे प्ष्े निवेरितः ॥ १४ 
चरणाङ्कलि्रषठेन तथा स्थाने च कुटितः। 10 


तरिकोणचारी सोदिष्ा चारी चान्वर्थसंज्ञिता ॥ १५ 
॥ इति जिकोणचारी ॥ २ ॥ 


कुटितश्च खपाश्वं च स्थापितोऽङ्गलिपृष्ठतः। 
पुननिकुटितः स्थाने सा चैकपादकुटिता ॥ १९ 
॥ इत्येकपादकुट्िता ॥ ४॥ 15 


एषं पादद्वयकरता सा पादद्रयङ्कदिता । 
॥ इति पाद द्वयङ्दिता ॥ ५॥ 


कुटितः प्रथमं पादः स्थितश्चाङ्गलिपृष्ठतः ॥ १७ 
अन्यस्ततः कुदितश्चेत्पादस्थितिनिकुटिता । 

॥ इति पादस्थितिनिकुद्टिता ॥ ६ ॥ ‰0 
पादद्रयक्रता सैव कमपादनिकुटिता ॥ १८ 


॥ इति कमपादनिकुट्टिता ॥ ७ ॥ 


कुष्टितोऽङ्गलिष्ष्े च सितः पादोऽपरस्ततः । 

खस्तिकस्थापितः पूर्वः खपा््वे स्यलकुदितः। 

एवं पादद्रयेनापि सा पाश्वद्रयचारिणी ॥ १९ % 
॥ इति पाश्वैद्रयचारी ॥ ८ ॥ 


न 


1 80 नतैके । 2 ^+ पादध्यं कृता । ?0 दर्यं कृत्वा । 


+“ अ 
^= 
> 
“+ 
` अ ^ $? च 
~ * न 











१३६ न° र० को०-उदल्ास २, परीक्चषण २ [ डमरुकुट्िता 


कुटितश्चरणः पूवं लटठितोऽङ्गलिष्रष्ठतः । 
पश्चान्निकुटितस्थाने भवेडमरुकुटिता ॥ २० 
॥ इति उमरुकुट्टिता ॥ ९ ॥ 
पादहरयक्रता सा चेडमरुद्रयकुट्िता ॥ २१ 
5 ॥ इति डमरुद्यकुट्िता ॥ १० ॥ 
कुटितश्चरणः पूर्वं पुरतोऽङ्कलिष्रषठतः । 
स्थापितः कुदितः स्थाने पुरक्षेपनिकुटिता ॥ २२ 
॥ इति पुरःश्ेपनिकुट्टिता ॥ ११ ॥ 
पञ्चात्‌ क्षेपाच सा पोक्ता पश्चात्क्षेपनिकुटिता ॥ २३ 
10 ॥ इति पश्चाटश्षेपनिकुट्टिता ॥ १२॥ 
पार्श्वतश्च पुनःस्लेपात्पाश्वेक्षेपाख्यकुटिता ॥ रे 


॥ इति पाश्वेक्षेपकुट्िता ॥ १३॥ 
कुटितश्चरणः पूवं पुरःपश्चान्निवेरितः। 


=यस्र भावात्‌ पुनश्चापि पुरःपञ्चात्तदन्यथा । 
18 कुटितश्च ततः स्थाने चतुष्कोणाख्यङुटिता ॥ २५ 
॥ इति चतुष्कोणङुद्िताः ॥ १४ ॥ 
नः 


कुटितः प्रथम पादः पुरःपञ्चान्निवेरितः। 
मध्ये निवेरितश्चायं पुनस्तत्रैव कुट्टितः । 


मध्यस्थापनङ्कटहाख्या चारी चान्वर्थलक्षणा ॥ २दे 
0 ॥ इति मध्यस्थापनङुट्ा ॥ १५ ॥ 
नः 
कुटितश्चरणः पूर्व क्षिप्त ापि खपाभ्वेके । 
निक्षिप्रश्चापि मध्ये च तत्रापि च निङुटितः | 
सा तिरश्चीनकुटहाख्या पोक्ता 'साधेप्रसारिका ॥ २७ 


॥ इति तिरश्चीनकुटा अधेप्रसारिका वा ॥ १६॥ 


नैः 


1०५ चतुरकोणाख्य । ^? चतुष्कोणाख्य । 2 0 १०] 707 श्चापि-इति .. 
तिर” । 3 सार्थग्रचारिका । क. नि. पर. ३१६ (सं.र.) 


| 
| 








पृष्टित } ` न° र० को०-उल्लास २, परीक्षण ३ 


कुशि( ? टि )तश्चरणः एृषठे लृटितोऽङ्गलिग्र्ठतः । 


` पुनश्च कुटितस्थाने सा पृरष्टलटिताभिधा ॥ 


॥ इति प्ृष्ठदुठिता ॥ १७॥ 
ध 
पुरस्ताच्च कृता सेव पुरस्ताह्टुटिताभिधा ॥ 


॥ इति पुरस्ताद्ुठिता ॥ १८ ॥ 


त्रिकोणचारी या चारी त्वनुलोमविलोमगा । 
खस्थाने स्थापितपदा ततस्तत्रापि कुटिता । 


सान॒लोमविलोमाख्या चारीं परिकीर्तिता ॥ 
॥ इत्ययुटखोमविरोमा ॥ १९ ॥ 


विपरीतप्रचारा सा प्रतिलोमविलोमिक्षा ॥ 
॥ इति प्रतिखोमविरोमिका ॥ २० ॥ 


निकुदिती समौ पादौ स्थितौ चाङ्गलिष््योः । 
समपादनिकुह्य च कीर्तिता त्वर्थलक्षणा ॥ 
॥ इति समपादनिकुद्टिता ॥ २१ ॥ 


कितं चरणं पञ्चाद्धामयित्वा च विन्यसेत्‌ । 
कुद्येच ततः स्थाने चक्रकुटनिका मता ॥ 
॥ इति चक्रकुट्टनिका ॥ २२॥ 


कुष्टयित्वा च विन्यस्य टित निकुदितः। 
सा मध्यल्टुठिता चेति कीर्तितान्वर्थनामका ॥ 
॥ इति;मध्यल्ुटिता ॥ २३ ॥ 


कुदटयित्वा च विन्यस्य भ्रामितो लटितस्ततः । 
कुटितः स पुनः स्थाने वक्व्रकुदटटनिकाभिधा ॥ 
॥ इति वक्घकुटनिकाः ॥ २४॥ 


कुटयित्वा च विन्यस्य भ्रामयित्वा न्यसेत्ततः । 


: निङ्कद्येत्ततः स्थाने मध्यचक्रा प्रकीर्तिता ॥ 


॥ इति मभ्यचक्रा ॥ २५॥ 
1: 


१८ च्रररज्नर 


९ 


१३७ 


१८ 


३१ 1८ 
३२ 
15 
३३ 
३४ 


३५ 


ड है 25 


'1 480 चक्रङ्ट्निका, थ वक्त्रकुडनिका । क. नि. पृ. ३१७ (सं. र. ). 
























































| ` न कारा 





१३८ न° ₹० को०~उल्छास २, परीश्चषण ७ [ मण्डकलक्षणम्‌ 


रवं प्रकीर्तिताश्चा्यः पञ्चविरातिः संख्यया। 
एवमन्याश्च विज्ञेयाश्चार्योऽप्युद्या मनीषिभिः॥ : ` `` ३७ 


इति प्रसङ्गान्मुड़पसंक्ञकाश्चायो ददिताः । भररृतमजुसरामः' ॥ 
ध 


द्वितीयोह्छासे चतुर्थं परीक्षणम्‌ । 
5 यन्मण्डलं भूशैवः खः प्रकााय प्रवतेते । + 
वरेण्यं सवितुस्तन्मे व्याधिनाचाय कल्पताम्‌ ॥ १ 


[ मण्डललक्षणम्‌ । | 
लक्ष्मप्रकरणे पूर्थै मण्डलं रक्षितं मया । 
 : . तद्वेदानधुना वच्मि भ्रमरास्कन्दिते ततः ॥ क] २ 
0 आवर्त !दाकटास्याख्यं तथा चैवाडतं परम्‌। 
समोत्सरितमध्यधेमेलकाक्रीडितं ततः ॥ | 
पृष्ठकुटं चाषगतं गोमानीति दा कमात्‌ । ~ 
अतिक्रान्तं दण्डपादं कान्तं लछितसश्रम्‌ ॥ ` `: ४ 
सूचीविद्धं वामविद्धं विचित्र विहृतं ततः । 
18 अखातं ललितं चेति दराकाराभवानि च ॥ कअ ~. 
` भौमाकादिकचारीणां कायत्वान्मण्डलान्यपि। ` 
कारणान॒यणत्वेन भौमान्याकारिकान्यपि॥ ` १ 
प्रायेषषां नियोगस्तु विज्ञेयः रा खरमोक्षणे । 
युद्धे चाकारिकानां तु प्राधान्यं खनयोऽवदन्‌ ॥ 
> 


1 


%0 ` [ भोममण्डटानि । ] 

चारीविवक्षया ज्ञेयश्चरणोंऽत् विजानतः । 

न न्यूनाधिकता दुष्या मण्डटे चारिकागता॥ `` `` ८ 

दक्षिणे जनितां कयीद्‌ वामेऽथ स्पन्दितां तथा । ` 

दश्चिणे दाकटास्यां च वामेऽपस्पन्दितां तथा ॥ ९ 
5 दक्षिणे भ्रमरीं वामे स्पन्दितामितरे पुनः। 

चाकटास्यां चाषगति वामे भ्रमरिकां तथा। ` 

दक्षिणे स्पन्दितां वामे बिदध्याद्धमरे बुधः ॥ ` १५ 

॥ इति ्रमरम्‌ ॥ १॥ 


बर 
1 966 शणए९पकाड 1 07 006 ४6३४ ग {६.215010}. £ «9५ 'सक्रखा  । 











` आस्कन्दितम्‌ ] 
दक्षिणो भ्रमरो बामोऽड़तोऽथ ज्रमरः स चेत्‌ । ` 


न° र० को०~उ्ांस २, परीकश्चषण 


राकटास्यो भवन्दक्ष ऊरूद्ृत्तो भवेत्ततः ॥ 
अध्यर्धिको भवन्वामो भ्रमरः स्यात्तथेतरः । 
स्पन्दितः चाकटास्यस्तु वामः सोऽप्येव भूतलम्‌ । 
स्फुटमास्फोदयेयत्र तदास्कन्दितसुच्यते ॥ 
॥ इत्यास्कन्दितम्‌ ॥ २॥ 
नेः 


दक्षिणो जनितो वामः स्थितावर्तस्ततः परम्‌ । 
हाकटास्यत्वमप्यैवमेटकाक्रीडितां रयेत्‌ ॥ 
ऊरूदरुत्ताडिति चार्यो जनितामाश्रयेत्ततः। 
समोत्सरितमत्त्धिः कमादद्धिस्तु दक्षिणः ॥ 
राकटास्यां भजन्‌. चारीमूरूढधत्तस्तथेतरः । 
अ्धिश्चाषगतिद्धि; स्यादक्षिणस्पन्दितस्ततः ॥ 
चाकटास्यो भवेद्भामो दक्षिणो भ्रमरो भवेत्‌ । 


वामश्चाषगतियेच्र तदावतै स्मतं वुधैः॥ 
॥ इद्यावर्तम्‌ ॥ ३ ॥ 


नैः 

दक्षिणो जनितो भृत्वा `स्थितावतों भवेत्ततः । 
समोत्सरितमत्तद्धिः राकटास्यस्ततः परम्‌ ॥ 
वामस्तु सपन्दितो भूत्वा यावन्मण्डलपूरणम्‌ । 

भवेद्यत्र शाकटास्याभिधं तु तत्‌ ॥ 

॥ इति दाकटास्यम्‌ ॥ ४॥ 
उद्घाटितस्ततो बद्धः समोत्सरितपूर्वकः । 
"मत्तद्िरमत्तदिरपक्रान्ताभिधस्ततः ॥ 
उद्रत्तो विद्युद्धान्तश्च भ्रमरः स्पन्दितस्तथा । 
दक्षिणो बाभपादस्तु शाकटास्यः परः पुनः ॥ 
द्विः स्याचाषगतिवांमोऽडितोऽध्यंर्धिकतां गतः । 
तथा चाषगतिदंक्षः समोत्सरितमत्त्टिः ॥ 
मत्तद्धिभ्रेमरश्चैव वामोऽथो दक्षिणः पुनः । 
स्पन्दितां चारिकां करत्वा भूतटास्फोटनं यदा । 
कुरुते पाहुराचायोस्तदा मण्डलमडतम्‌ ॥ 
[ ॥ इत्यङ़तम्‌ ॥ ५॥ | 


१३९ 


१९ 


१२०४ 


१३ 
१४10 
९५ 
९द 


15 
,\ 


१७ 


१८ 
20 


१९ 


२० 
26 
२१ 


२२ 


30 


जिया 
` + 80 गणा४ 7) स्थितावतो' (० भूत्वा । 2 450 मतद्धिरथ ५ मत्तलिरधं- 


भम्चलिर° सं. र. अ. ७, ष्छो. ११६०. 





"म त 


० २० को०-उल्लास २, परीक्षण ४ { समोत्छरिलम्‌ 


समपादं समास्थाय स्थानं हस्तौ निरन्तरौ । | 
प्रसाचैवाप्यवेचयोद्रेटय च क्षिपेत्‌ ॥ ` २३ 
करटीतटे ततः पादौ कमादश्चिणवामकौ । ` र 
भ्रामयच्च ततो वाम पुरः पादं प्रसारयेत्‌ ॥ रथे 
ऋमादेवं नटो श्रान्त्वा मण्डलभ्रमणं भजेत्‌) 
चतुर्दिक्ं तदा पोक्तं समोत्सरितसंज्ञकम्‌ ॥ २७. 
॥ इति समोत्सरितम्‌ ॥ ६ ॥ 


४. 
अनितः रपन्दितश्चैकदक्षिणश्चरणो भवेत्‌। 
वाभोऽथाध्यर्धिको भूत्वा कमाचाषगति भवेत्‌ ॥ द्द 
मत्तद्िभ्रमरश्चैव दक्षिणः राकटास्यताम्‌ । 
प्राप्य चान्ते चतुदिक्ठं मण्डलश्रमणं यदा । 
तदा नियुद्धबिषयमध्यधं मण्डलं भवेत्‌ ॥ जाक = १9 
॥ इत्यध्यधेम्‌ ॥ ७ ॥ 


पदै मियुतैः सूचीविद्धाख्यं करणं भितैः । 

सूचीचारीयुतैर्बिद्धा परयोगैरेलकादिकैः ॥ 9. . 

क्रीडिते; पूर्णभ्रमरे[अ ] सुचीविद्धाभिस्तथा । 

पूर्ववत्‌ संपरयुक्तेश्च तथाक्षितेः पदक्रमैः ॥ : ३९ 

दिकचतुश्टयसंयुक्तमण्डलभ्रान्तिसंयुतः । सकर 

कटिरेचितकैश्चैवमेलकाकीडिताहयम्‌ ॥ ३० 
॥ इत्येखकाक्रीडितम्‌ ॥ < ॥ 


सूचीदशक्िणपादः स्यात्‌ वामोऽपक्रान्तया यत्तः । 

बहुरो दक्षवामौ च ुजङ्च्रासिताभिधौ । 

अन्ते च मण्डलभ्रान्तिः प्टकुटं तदा भवेत्‌ ॥ कः. 
॥ इति पृष्ठकम्‌ ॥ ९ ॥ 





बहुराश्चाषग तिभिञअरणैः सकलेयेदा । 
मण्डलश्रमणं कुयोदन्ते चाषगतं तदा । क 
नियुद्धविषयं छयतत्‌ प्रयुक्तं भरतादिभिः ॥ द, . 
॥ इति चाषगतम्‌ ॥ १० ॥ | 
॥ इति दशभोममण्डलरानि ॥ 
नै 





1 80 "वायवे । 2 ० इत्येखकाकीक्रीडितम्‌ 1 


7 = # > ईक ॐ 














जकाशिकमण्डलानि ] ० र० को०-उलाख २, परीक्षण ४ -&४१ 


[ आकाशिकमण्डखानि । ] 
दक्षिणो जनितां कुयोत्‌ चाकटास्यां कमाद्यदा । 


वामोऽलातो दक्षिणस्तु पाश्वेक्रान्तस्तु वाभकः॥ ` ३३ 
सची च भ्रमरश्चैव दक्ष उदृत्ततां व्रजेत्‌ । ( 
वामस्त्वालातिकोऽथाङ्गी छिन्न करणमाभितौ ॥ ३४७ 


बाह्यभ्रमरकं यच्र वामसङ् च रेचितम्‌ । 
अतिक्रान्तायुतो वामो दण्डपादायुतः परः । 


अतिक्रान्तं तदा ज्ञेयं मण्डठं दाङ्करप्रियम्‌ ॥ , ३५. 
॥ इत्यतिक्रान्तम्‌ ॥ १॥ | 

दक्षिणे जनितां कृत्वा दण्डपादां मजेदथ । ० 

सूचीं च भ्रमरीं वामे उदत्तां दक्षिणे पुनः ॥ =-= 

वामेऽलातां तदा दक्षे पाश्वेक्रान्तां ` परे पुनः । ॑ 

सुजङ्च्रासितां कुयाद्रामोऽतिक्रान्ततां भजेत्‌ ॥ ३७ 

दक्षिणो दण्डपादोऽथ सूचीं च भ्रमरीं परे । 


यत्र तदण्डपादाख्यं मण्डलं भणितं बुधैः ॥ ३८15 
॥ इति दण्डपादम्‌ ॥ २॥ | 


प. 
सूचीदक्षस्तथा वामोऽपक्रान्तो दक्षिणः पुनः। 


पाश्वेकान्तस्ततो वामः स्मतान्मण्डलश्रमम्‌ ॥ =. 

क्रत्वा सूची भवन्‌ दक्ोऽपकान्तो यच्र मण्ड्े । 

तदुक्तं कविभिः कान्तं खाभाविकगतौ स्तम्‌ ॥ ` ० 
॥ इति कान्तम्‌ ॥ ३॥ | 

सोऽधजालुः स सूचीको दक्षिणश्चरणस्ततः। 

अपक्रान्तीभवेद्रामः पाश्वेकान्तस्तु दक्षिणः ॥ ८१ 

पाश्वेक्रान्तस्ततो वामोऽतिक्रान्लो दक्षिणः पुनः। ` ` 

सूचीबामस्त्वपक्रान्तः पाश्वेक्रान्तस्तु दक्षिणः ॥ ` ४२ 


अतिक्रान्तस्ततो वामश्चरणद्धितय ततः। 

चिन्न करणमाभिलय बाद्यभ्रमरकं ततः । ॑ 

वामश्ेद्युटितं कुयोत्तदा लटलितसश्चरम्‌ ॥ ४३ 
॥ इति ठलितसश्चरम्‌ ॥ ४ ॥ | 


न 


1 50 पुरे पुनः । 2 ४० करमाभिल्य । | 1 





१४२ न्र° र० को०~उद्टास २, परीक्षण ४ [ सचीषिद्ध॑म्‌ 


मात्‌ सूची च भ्रमरः पाश्वेक्रान्तस्तु दक्षिणः । 

अतिक्रान्तो भवेद्भामो दश्लः सूचीं समाश्रयेत्‌ ॥ धे 

अपक्रान्तस्ततो वामः पाश्वेक्रान्तस्तु दक्षिणः । 

सूचीविद्धं तदाख्यातं मण्डलं मण्डलेश्वरेः ॥ 2५९ 
6 ॥ इति सूचीविद्धम्‌ ॥ ५॥ 


सुचीदक्चस्तथा वामोऽपक्रान्तो दक्षिणः पुनः । 
दण्डपादोऽथ वामस्तु सूचीं च भ्रमरीं रयेत्‌ ॥ ४६ 
पार््वक्रान्तो दक्षिणः स्यादाक्षिप्तो दक्षिणे ततः। 
दण्डपादस्ततश्चोरूढत्तः स्यादक्षिणः कमात्‌ ॥ ७ 
19 वामः सूची च भ्रमरोऽलातश्च क्रमतो भवेत्‌ । 
 वपाश्वक्रान्तां "भजेदक्षो वामोऽतिक्रान्ततां बजेत्‌ । 
वामविद्धं तदाख्यातं मण्डलटं मण्डलाथिभिः॥ ४८ 
॥ इति वामविद्धम्‌ ॥ ६ ॥ 
>: 


चारीं च जनितां कृत्वोरूढुत्तेशचैव विच्यवः । 
` 8 स्थितावर्तः इाकटास्य एलकाक्रीडितस्ततः॥ ४९ 
ऊरूदत्तोऽडतश्चव जनितस्तदनन्तरम्‌ । 
समोत्सरितमत्तद्िः कमादद्विस्तु दक्षिणः ॥ ५० 
वामस्तु स्पन्दितं कुयात्‌ पाश्वेक्रान्तां तु दक्षिणः । 
शुजङ्गत्रासितां वामो दश्चोऽतिक्रान्ततां बजेत्‌॥ ` ५१ 
::%0 ` उदृत्तत्वं चेष *वामोऽलातः स्यादक्षिणः पुनः । 
पार््वक्रान्तः पुनः सूची वामो दक्षं च विक्षिपेत्‌ । 


अपक्रान्तां "मजेद्रामस्तद्विचिच्रसुदाहतम्‌ ॥ ५२ 
[ ॥ इति बिचिन्नम्‌ ॥ ७॥ | 


“विच्यवोत्खण्डिते कुर्वन्‌ पाश्वेक्रान्तोऽच्र दक्षिणः । ` 
“ह स्पन्दितो वाभपादः स्यादुद्रत्तो दक्षिणो भवेत्‌ ॥ ५३ 
| वामोऽलातो दक्षिणस्तु चारीं सृचीसखुपाश्रयेत्‌ । 
| पार््वक्रान्तस्तु वामोऽद्विराक्षिघीभूय दक्षिणः ॥ ५४ 
` ` सन्यापसव्य भ्रमणात्‌ दण्डपादां भजेत्ततः । 
[ वामः रमेण सूची स्याद्‌ ्रमरश्चाथ दल्िणः । 


ज 
1-0-भवेदक्षो । 2 ० मालोखातः। 3 ० भवेद्धाम । 4 20 ५70 ५6 ७0०७ 
$ 8868. 








, ¢>. ` 


॥ 4 [प । क १ क 
के ष 


अर्तम्‌ | ` न्रुण र० को०~उल्टास २, परीश्चण ४ 
..  : ञुजङ्गत्रासितो वामोऽतिक्रान्तो विह्ताभिषे ॥ 


॥ इति विहतम्‌ ॥ ८ ॥ 


चीं च भ्रमरीं वामे कमात्पादे तु दक्षिणे । ] 


सुजङ्गत्रासितः पश्ादलातो दकषिणेतरः ॥ 
आघ्रत्तिभिः सप्तभिवो षद्धिवो क्रमतस्त्विमाः 
चारी; कृत्वा चतुर्दिश्चु भ्रान्त्वा मण्डलवद्रतम्‌ ॥ 
अपक्रान्ता दक्षिणे तु वामे तु चरणे पुनः। 
अतिक्रान्ता भ्रमरिके लटलितैश्चरणक्रतैः । 


कुयोदलातं तं प्राहुर्मण्डलटं चिच्रमण्डलम्‌ ॥ 
॥ इत्यलातम्‌ ॥ ९॥ 


दक्षिणश्रणः सूचीं वामोऽपक्रान्ततां भजेत्‌ । 
पाश्वेक्रान्ती भवन्‌ दक्षो सुजङ्गत्रासितो भवेत्‌ ॥ 
अतिक्रान्तां चरेद्राम आ्षिपो दक्षिणो भवेत्‌ । 
वामक्रमादतिक्रान्तो खढृत्ताटातकी भवेत्‌ ॥ 
पाश्वेकरान्तो दक्षिणस्तु सुचीवामोऽथ वक्षिणः 
अपक्रान्तो व।मपादस्त्व [ तिक्रान्तो ] भवेद्यदा । 
तदुक्तं कलितं यच्र संचरेष्लितं नटः ॥ 

॥ इति खुकितम्‌ ॥ १० ॥ 


॥ इति दराकारिकमण्डखानि ॥ 
॥ इति मण्डटलटक्षणम्‌ ॥ 


विचित्रर्विहतैर्थेनातिक्रान्तं वैरिमण्डलम्‌ 
उल्ासितं जगययेन पादैलंलितसश्वरैः । 
एकलिङ्प्रसादेन मण्डर यस्य निलयाः 


नेतयस्तेन राज्ञेदं कृतं मण्डललक्षणम्‌ ॥ 


१४३ 
९११, 


५९ 


दै9 
16. 


६१. 


29 


द२ 


` इति श्रीसरस्वतीरससमुद्धतकेरबो्याननायकेन अभिनवभरताचार्यैण मालबाम्भो- % 





धिमाथमन्धमहीधरेण योगिनीप्रसादासादितयोगिनीपुरेण मण्डखदुरगोद्धरणोद्ध॒तसकड 
मण्डलाधीश्वरेण अजयमेरुजयाजेयविभवेन यवनकुलाकार्काररा त्रिरूपेण शाकंभरीरमण- 
परिशीरनपरिप्राप्रराकंभरीतोपितशाकभरीप्रमुखराक्तित्रयेण नागपुरोदधुतप्रचण्डपवनेन 

1 # 61868 06661 {1118 0180र्प् ] 816 ९6868 10-1198-99 


(४ ) ४867 {00 9. 2. 44. 7. 88 106 &16 8817 17 पाः 088. % 80 
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1 न ककाकाका्कन्कान्डकककनयक = = कच ~ त 





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१७७४. न° र० को०-उष्टास २, परीक्षण ७ 


श्रीमतेकंभ[ख ]मेरुनवीननिर्मितसुमेरुणा श्रीचिचकूटभौमस्गतातच्वीकरणरचितचारुतर- 
पथेन मेदपाटसयुद्रसंभवरोहिणीरमणेन अरिराजमत्तमातङ्गपच्वाननेन प्ररूढ पत्रयवनदब्‌- 
दहनदवानठेन प्रयर्थिप्रथिवीपतितिमिरततिनिराकरणप्रोढभ्रतापमार्तण्डेन वैरिबनितावेध- 
व्यदीक्षादानदक्षोदण्डकोदण्डद्ण्डमण्डिताखण्डभुजादण्डेन भूमण्डकाखण्डलेन श्रीचित्र- 
£ कूटविभुना अध्युष्टतमनरेश्वरेण गजनरतुरगाधीरराज त्रितयतोडरमदेन वेद मागैस्थापन- 
चतुराननेन याचककल्पनाकलपदुमेण वसुंधरोद्धरणादिवराहेण परमभागवतेन जगदीश्वरी- 
चरणकिङकरेण भवानीपतिप्रसादाप्तापसादेन राजगुवा दिविरुदावलीविराजमानेन राजाधि- 
राजमहाराणाश्रीमोकलेन्द्रनन्दनेन राजाधिराजश्रीङ्घम्भकर्णमहीमहेन्द्रेण विरचिते संगीतराजे 
षोडरासाहस्यां संगीतमीमांसायां नृयरल्रकोशे चारिको्ासे मण्डरुलक्षणं नाम चतुथं 
10 परीक्षणम्‌ ॥ उह्ठासश्च समाप्निं समगादिति विततमतीनामभिमतसिद्धिरस्त' ॥ 


© 








॥ इति चयरलकोशे चारिकोष्टासे चतथ परीक्षणं समाप्तम्‌ ॥ 
॥ समाप्तश्चायं दितीय उद्ासः ॥ 


10 विचित्रिते तैर्यनातिक्रान्तं वै रिमण्डटं । उद्वासितं जगयेन पादेरलितसच्छरैः । 

` कामेश्वरीप्रसादेन मण्डले यस्य निलयश्च; नेतयस्तन राज्ञेदं कृतं मण्डरखलक्षणम्‌ ॥! 

15 इति श्रीजगदीशवनदेबनिजगणेन ॥ १॥ जगदीश्वरी-कामेश्वरीचरणकिङ्करेण ॥२॥ 
श्रीब्रह्माद्विविभुना ।॥ ३॥ अध्युष्तमनरेश्वरेण ।॥ ४ ॥ भीष्मपुरजयानीतानेकराजकन्या- 
र्नेन ॥५॥ श्रीपुरप्रहणसंवद्धितयदोभरेण ।।६॥ बाटिकाचखग्रहणजनितकीर्सिपूरपराजिता- 
चटनायकेन ॥७॥ संगमनीरदुर्गोद्धरणोद्ध तसकलमण्डलाधीश्वरेण ॥८॥ मद नपुरविध्वं 
सनबेदीकृतयवनीनिचयेन ॥९।॥ महिषमेरुजयाजेयविभवेन ॥१०। शाकम्भरीरमणपरि- 
20 शीरनपरिप्राप्रशाकम्भरीपरितोषितशाकम्भरीप्रमुखशक्तित्रयेण ।॥११। अष्टादशगिरि- 
रिखरपरिवारितांजना द्विविजयविख्यातवीयेगर्वेण । १२॥ महदंवमाद्कापूरोद्धूकनधर्षित- 
महोरगपुरेण ॥१३॥ श्रीवनदेवस्ामिध्र[1 सादरचनापरपरमेश्वरेण ॥१४॥ यम्बकेश्वर- 
सन्निधिकीर्तिस्तमोन्नतजयस्तंभेन ।॥१५॥ श्रीव्रह्यगिरिभोमस्व्गतायथार्थीकरणरचितचास्‌- 
पथेन ॥१६॥ श्रीकामाक्षागिरिनवीननिर्भिंतिपराजितसुमेसणा ।॥ १५॥ श्रीमहिषाचरोपरि 
35 भीह रि्षरणरचिताचर्दुर्गेण ॥१८॥ अभिनवभरताचार्थेण ॥१९॥ बीणावाद्नप्रवीणेन 
॥[२.०॥ , यबनकुलाकार्काररात्रिरूपेण ॥२१॥ त्रिसंध्यक्षेत्रसमुद्रसंभवरोहिणीरमणेन 
॥२२॥ ` परमभागवतेन ॥ २३ ॥ महाराजाधिराजमहाराणाश्रीमगाङ्नामराजेन्द्रनन्दनेन 
॥(२४॥ महाराज्ञीश्री सो भाग्यवतीजसमाम्बिकाहृदयनदनेन ।॥ २५ ।॥ सकरुसीमतिनी- 
शिरोमणिनिङुभराजन्यवंशावतं समहाराज्ञीश्रीकर्मवती-रुषुमादेवी.-हृदया धिनाथेन ॥ २६ ॥ 
30 रांजाधिराजकारुसेनमहीमहेनद्रेण विरचिते सङ्गीतराजे षोडशसादरूयां सङ्गीतमीमां सायां 
गूयरन्नकोरो चारिकोह्ासे मण्डललशक्षणं नाम चतुर्थं परीक्षणं समाप्तम्‌ उल्ासन्ध द्वितीयः 
































राजस्थान यपुरातच्च मन्दिर 
की 
कायं पवत्ति 


नैः 
न > 


१. राजस्थानमें ओर राजस्थानसे संल प्रदेशों प्राचीन साहि. 
त्यकी, अर्थात्‌ संस्कृत, प्रारुत, अपश्चंश् ओर राजस्थानी 
आदि भाषाओमें ग्रथित वाङ्मयकी शोध करना ओर उसको 
प्रकादामें खाना । 

र 

२. राजस्थानकी पाचीन संस्छृतिकी आधारभूत स्थापत्य, चित्र, 
शिस्प, शिखालेख, ताश्नपञ्च, सिक्ते, दस्तावेज आदि साधन- 
सामम्रीका संग्रह, संरक्षण, संकटन पव पर्यवेश्षण 
आदि करना । 


३. पराचीन हस्तङिखित ध्रन्थोका संग्रह करना, उनकी प्रति- 
किपियां करवाना, फोटो, मारक्रोप्पिस्म आदि बनवाना । 


न 


9. राजस्थानकी प्राचीन संस्छृतिके अध्ययन, अन्वेषण, 
संशोधन आदि कायैमें अत्यावश्यक उत्तम प्रकारका पुस्तक- 
भण्डार (ग्रन्थाख्य ) स्थापित करना ओर उसमें देदा - षिदेदामें 
मुद्वित अरभ्य - दुकभ्य भ्रन्थोका संग्रह करना । 


५. राजस्थानके खोकजीवन पर प्रकाश डालने वाले विविध 
विषयक लोकगीत, सांप्रदायिक भजन -पदादि स्वरूप भक्ति- 
साहित्य पव सामाजिक संस्कार, धार्मिक व्यवहार ओर 
लौकिक आचार - विचार आदि से संबन्धित स्वै पकारकी 
सामभ्रीकी खोज करना ओर उस पर प्रकादा डालना । 


नैः 


न १०१०१११. ॥ + + + 0 | 
प्रकाशक - देवराज उपाध्याय, उपसंचालक~राजस्थानपुरातत्वान्वेषण मन्दिर, जयपुर ( राजस्थान ) 


मुदक ~ लक्ष्मीबाई नारायण चौधरी, निणैयसागर प्रेस, २६।२८, कोलभार स््रीट, बम्बर न॑. २